Video call funeral: सोनीपत (हरियाणा), जलती हुई चिता, आसपास खड़े चंद लोग और मोबाइल स्क्रीन पर वीडियो कॉल के जरिए अंतिम संस्कार देखती एक महिला। यह दृश्य सिर्फ एक वीडियो नहीं, बल्कि आज के समाज और बदलते रिश्तों की एक कड़वी तस्वीर है। हरियाणा के सोनीपत स्थित समाज कल्याण शिक्षा समिति के वृद्धाश्रम (वेस्ट रामनगर) में रहने वाले मुंबई के पूर्व कपड़ा व्यापारी शिवचरण रामरत्न गुप्ता (74 वर्ष) की 4 अगस्त 2026 तड़के करीब 3:30 बजे मौत हो गई। उनकी तीनों बेटियों में से कोई भी अंतिम संस्कार में शामिल होने नहीं पहुंची। बेटियों ने ऑनलाइन ₹5100 भेजकर कहा कि सोनीपत में ही अंतिम संस्कार कर दिया जाए और पूरी प्रक्रिया वीडियो कॉल पर दिखा दी जाए।
व्यापारी से वृद्धाश्रम तक का सफर
शिवचरण रामरत्न गुप्ता एक समय मुंबई में कपड़े के बड़े व्यापारियों में गिने जाते थे। परिवार में पत्नी मीना गुप्ता और तीन बेटियां—अनिता (बड़ी, नेपाल में अध्यापिका), निशा (मझली, उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में) और प्रिया (छोटी, मुंबई में)—हैं। शिवचरण और उनकी पत्नी ने बेटियों को बेटों की तरह पाला। अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उनकी शिक्षा पर खर्च किया, ग्रेजुएशन तक पढ़ाया और धूमधाम से उनकी शादी कर दी। दो बेटियां टीचर बनीं।
समय के साथ व्यापार में भारी नुकसान हुआ। आर्थिक संकट और पारिवारिक परिस्थितियों के कारण करीब डेढ़ से तीन साल पहले शिवचरण अपनी पत्नी के साथ महाराष्ट्र छोड़कर सोनीपत आ गए और वृद्धाश्रम में रहने लगे। आश्रम में आने के कुछ समय बाद ही पत्नी मीना का निधन हो गया। इसके बाद शिवचरण और भी अकेले पड़ गए। बाद में वे रामनगर के समाज कल्याण शिक्षा समिति के आश्रम में रहने चले गए, जहां करीब दो दर्जन बुजुर्ग रहते हैं।
बीमारी और अंतिम सांस
आश्रम संचालक आनंद कुमार के अनुसार, शिवचरण समय-समय पर बेटियों से फोन पर बात करते थे। करीब 15-20 दिन पहले पेट में तेज दर्द की शिकायत हुई। उन्हें सिविल अस्पताल ले जाया गया, जहां पेट में इंफेक्शन मिला। इलाज के बाद कुछ सुधार हुआ, लेकिन 2 अगस्त को फिर गैस की समस्या उठी। डॉक्टरों ने दवा देकर घर भेज दिया। 3 अगस्त की रात उन्होंने अच्छे से खाना खाया और सोने चले गए। 4 अगस्त सुबह करीब 3:30 बजे जब केयरटेकर शिवकुमार उन्हें देखने पहुंचे तो वे अचेत अवस्था में मिले। जांच में मौत की पुष्टि हुई। आनंद कुमार ने बताया कि बीमारी की सूचना 20 दिन पहले ही तीनों बेटियों को दे दी गई थी और आने की गुजारिश भी की गई, लेकिन कोई नहीं आया। शिवचरण अपनी बेटियों से मिलना चाहते थे, लेकिन यह इच्छा अधूरी रह गई।
बेटियों का जवाब और वीडियो कॉल पर अंतिम विदाई
मौत की खबर सुनाने के बाद भी तीनों बेटियों ने आने की इच्छा नहीं जताई।
बड़ी बेटी अनिता (नेपाल) ने कहा—“बहुत दूर हूं, आना संभव नहीं।” मझली बेटी निशा (आजमगढ़) ने कहा—“मैं नहीं पहुंच सकती।” छोटी बेटी प्रिया (मुंबई) का सबसे चौंकाने वाला जवाब था—“हम इतनी जल्दी नहीं आ सकते, आप फोन पर ही अंतिम संस्कार दिखा दीजिए।”
बेटियों ने ऑनलाइन ₹5100 भेजकर अंतिम संस्कार सोनीपत में ही कराने को कहा। बिना किसी परिवार वाले के, आश्रम के सदस्यों और स्थानीय समुदाय के लोगों ने मिलकर शिवचरण का अंतिम संस्कार किया। वीडियो कॉल पर बेटियां पूरी प्रक्रिया देखती रहीं। जब मुखाग्नि दी गई तो छोटी बेटी ने पूछा “अभी और कितना समय लगेगा?” जवाब मिला कि 10-15 मिनट में प्रक्रिया पूरी हो जाएगी। इसके बाद बेटी का जवाब आया “सारा काम अच्छे से हो गया ना, मुझे सारी वीडियो भेज दीजिएगा।” कुछ रिपोर्टों में एक बेटी के मुंह से “हमें खाना-नहाना भी है” जैसे शब्द भी सुनाई दिए। संस्कार के बाद आनंद कुमार ने बेटियों से कहा कि 20 तारीख से पहले आकर अस्थियां ले जाएं। छोटी बेटी का जवाब था “देखते हैं।” बाद में बेटियों ने कहा कि समय नहीं है, आश्रम ही गंगा में अस्थियां प्रवाहित कर दे। कुछ रिपोर्टों के अनुसार शिवचरण की आंखें भी दान कर दी गईं।
बेटी से बातचीत में ठंडक
दैनिक भास्कर सहित कई मीडिया रिपोर्टों में छोटी बेटी प्रिया से बातचीत का जिक्र है। उन्होंने कहा—“पापा का बिजनेस डूब गया था, हम बहुत गरीब हो गए थे। आज दुख का दिन है कि पापा नहीं रहे, दो साल पहले मां भी चली गई थीं।” जब अस्थियां चुनकर गंगा में प्रवाहित करने आने के बारे में पूछा गया तो जवाब आया—“अब तो पिताजी दुनिया में ही नहीं रहे, तो अब आकर क्या करेंगे? अब कुछ भी बचा नहीं है।”
समाज की प्रतिक्रिया
समाजसेवी मंजीत तिहाड़ा ने कहा—“आज समाज किस दिशा में जा रहा है, यह सोचकर ही रूह कांप जाती है। औलादें अपने जन्मदाता के प्रति इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती हैं? जो मां-बाप बच्चों को पालने में अपनी पूरी जिंदगी लगा देते हैं, उन्हें अंतिम विदाई देने भी कोई न आए, यह पूरे समाज के माथे पर कलंक जैसा है।” यह घटना सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुई और रिश्तों, बुजुर्गों की देखभाल तथा बदलते पारिवारिक मूल्यों पर व्यापक चर्चा छिड़ गई। आश्रम प्रबंधन और स्थानीय लोगों ने अंतिम संस्कार की पूरी जिम्मेदारी निभाई, जबकि बेटियां स्क्रीन पर ही मौजूद रहीं। यह कहानी सिर्फ एक परिवार की नहीं, बल्कि आज के समय में कई बुजुर्गों की अकेली जिंदगी और रिश्तों की बदलती परिभाषा की तस्वीर पेश करती है।

