भारतीय अरबपति गौतम अडानी पर लगे अमेरिकी आपराधिक आरोपों को लेकर एक महत्वपूर्ण अदालती सुनवाई में ब्रुकलिन की यूएस डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज निकोलस गारौफिस ने शुक्रवार को न्याय विभाग को अपना फैसला बदलने का औचित्य साबित करने का आदेश दिया है। जज ने अडानी के वकीलों की तुरंत मामले को खारिज करने की मांग पर अभी फैसला देने से इनकार कर दिया।
यह घटनाक्रम अडानी ग्रुप के लिए राहत और चुनौती दोनों लेकर आया है। नवंबर 2024 में अमेरिकी न्याय विभाग ने गौतम अडानी, उनके भतीजे सागर अडानी और अन्य अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए पांच सूत्री इंडिक्टमेंट दायर किया था। आरोप था कि अडानी ग्रुप की एक सहायक कंपनी को भारत में सोलर प्लांट विकसित करने की मंजूरी दिलाने के लिए भारतीय सरकारी अधिकारियों को सैकड़ों मिलियन डॉलर की रिश्वत दी गई और अमेरिकी निवेशकों को कंपनी की एंटी-करप्शन प्रैक्टिसेस के बारे में गुमराह किया गया। मई 2026 में अमेरिकी न्याय विभाग ने अचानक फैसला बदला और आपराधिक मुकदमे को आगे न बढ़ाने का ऐलान किया। इस फैसले के पीछे ‘प्रॉसीक्यूटोरियल डिस्क्रिशन’ यानी अभियोजन संबंधी विवेक का हवाला दिया गया। अडानी ग्रुप ने इस पूरे मामले को ‘बेबुनियाद’ बताते हुए लगातार इनकार किया है। इसके साथ ही अडानी एंटरप्राइजेज ने ईरान पर लगे अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन करने के अलग मामले में 275 मिलियन डॉलर का सेटलमेंट भी किया और अमेरिका में 10 बिलियन डॉलर निवेश का वादा किया था। 24 जून को अडानी के वकील रॉबर्ट गिउफ्रा ने जज गारौफिस को पत्र लिखकर मामले को ‘प्रिज्यूडिस’ (दोबारा खोलने की गुंजाइश के बिना) खारिज करने की मांग की। उन्होंने तर्क दिया कि मामला अमेरिकी कानून की पहुंच से बाहर है और भारत में कथित रिश्वतखोरी साबित करना संभव नहीं। लेकिन शुक्रवार को जज ने तुरंत फैसला देने के बजाय न्याय विभाग से अपना रुख बदलने का कारण स्पष्ट करने को कहा।
पृष्ठभूमि और प्रभाव
यह मामला अडानी ग्रुप की वैश्विक प्रतिष्ठा पर गहरा असर डालने वाला था। आरोपों के बाद कंपनी के शेयरों में भारी गिरावट आई थी, हालांकि बाद में रिकवरी भी हुई। अडानी ग्रुप ने हमेशा आरोपों से इनकार किया और कहा कि वे कानूनी प्रक्रिया का सम्मान करते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि न्याय विभाग का केस ड्रॉप करने का फैसला ट्रंप प्रशासन के तहत व्यावसायिक संबंधों और निवेश को प्रोत्साहित करने की दिशा में हो सकता है। हालांकि, कुछ डेमोक्रेटिक सीनेटर्स ने इस फैसले पर सवाल उठाए और इसे ‘क्विड प्रो क्वो’ (सौदेबाजी) बताया।
अभी तक जज गारौफिस को न्याय विभाग का जवाब मिलना बाकी है। अगर केस आखिरकार खारिज हो गया तो अडानी ग्रुप को बड़ी राहत मिलेगी। लेकिन प्रक्रिया में देरी से कंपनी की छवि और भविष्य की योजनाओं पर असर पड़ सकता है। अडानी ग्रुप के प्रवक्ता ने कहा, “हम कानून का सम्मान करते हैं और विश्वास करते हैं कि सच्चाई सामने आएगी।”यह मामला न केवल भारत-अमेरिका आर्थिक संबंधों बल्कि वैश्विक कारोबार में भ्रष्टाचार के आरोपों और राजनीतिक प्रभाव की जटिलताओं को भी उजागर करता है। आगे की सुनवाई पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।

