ममता की पार्टी में भूचाल: फ़िरहाद हाकिम ने छोड़ी मेयर की कुर्सी, ऋतब्रत बने विपक्ष के नेता, TMC टूट की कगार पर

58 बागी विधायकों ने पहुंचाया स्पीकर को पत्र, ममता ने भंग कर दीं पार्टी की सभी समितियां

पश्चिम बंगाल की राजनीति में बुधवार का दिन ऐतिहासिक उथल-पुथल का गवाह बना। 2026 विधानसभा चुनाव में करारी हार के महज चार हफ्ते के भीतर तृणमूल कांग्रेस (TMC) की नींव हिलती नजर आई। एक तरफ कोलकाता के वरिष्ठ मेयर फ़िरहाद हाकिम ने ममता बनर्जी की मंजूरी से मेयर पद से इस्तीफा दे दिया, तो दूसरी तरफ पार्टी से निष्कासित विधायक ऋतब्रत बनर्जी ने 58 बागी विधायकों के समर्थन के साथ विपक्ष के नेता (Leader of Opposition) पद पर दावा ठोक दिया। इस विद्रोह ने बुधवार को निर्णायक मोड़ ले लिया, जब 58 असंतुष्ट विधायकों ने निष्कासित नेता ऋतब्रत बनर्जी को विधानमंडल दल का नेता घोषित करते हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा के स्पीकर को पत्र सौंपा। हाकिम का इस्तीफा: ममता की रणनीति या मजबूरी?

TMC ने विधानसभा में अपनी व्यवस्था का ब्यौरा देते हुए स्पीकर को लिखित सूचना दी, जिसमें सोवनदेब चटर्जी को विपक्ष का नेता, अशिमा पात्रा और नयना बंदोपाध्याय को उप-नेता नियुक्त किया गया जबकि कोलकाता के मेयर फ़िरहाद हाकिम को विधानसभा में मुख्य सचेतक (Chief Whip) नामित किया गया।  हाकिम के मेयर पद से इस्तीफे की खबरें पहले से ही सुर्खियां बटोर रही थीं। आजतक बांग्ला के अनुसार, हाकिम काफी समय से मेयर पद छोड़ने की इच्छा जता रहे थे। 22 मई को KMC की बैठक में हाकिम समेत TMC पार्षदों ने मुख्य सभागार के बाहर अलग सत्र बुलाया, जब उन्होंने आरोप लगाया कि सभागार को बंद रखा गया। हाकिम ने इसे चुने हुए प्रतिनिधियों का “गंभीर अपमान” बताया था।

ऋतब्रत बनर्जी: पहली बार के विधायक से ‘एकनाथ शिंदे’ तक का सफर

ऋतब्रत बनर्जी ने अपनी राजनीतिक यात्रा CPI(M) की छात्र इकाई SFI से शुरू की थी और 2008 में इसके अखिल भारतीय महासचिव बने। 2014 में CPI(M) ने उन्हें राज्यसभा में भेजा।  बाद में वे TMC में शामिल हुए और 2026 के चुनाव में पहली बार विधायक बने। TMC ने सोमवार को ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा को तत्काल प्रभाव से पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से निष्कासित कर दिया।  लेकिन निष्कासन के बावजूद ऋतब्रत ने हार नहीं मानी। ऋतब्रत बनर्जी ने बुधवार को कहा, “TMC ने मुझे निष्कासित किया है, लेकिन मेरा मानना है कि मैं अभी भी पार्टी के साथ हूं। अगर विधायक मेरी बात सुन रहे हैं, तो मैं बहुत ताकतवर हूं।” उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि बागी गुट ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष मानता है और उन्हें TMC विधानमंडल दल के “मुख्य सलाहकार” की भूमिका में देखना चाहता है — लेकिन अभिषेक बनर्जी के नेतृत्व को स्वीकार करने से साफ इनकार है।

दो-तिहाई का जादुई आंकड़ा और दल-बदल कानून

TMC के कुल 80 विधायकों में से दल-विभाजन की मान्यता के लिए कम से कम दो-तिहाई यानी 54 विधायकों की जरूरत है। यदि 60 विधायक ममता के खिलाफ जाकर अलग गुट बनाते हैं, तो उन पर दल-बदल विरोधी कानून लागू नहीं होगा और वे अपनी विधानसभा सदस्यता बरकरार रखेंगे।  इससे भी बड़ी बात यह है कि ऐसा गुट पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न पर भी दावा कर सकता है — ठीक वैसे ही जैसे 2022 में एकनाथ शिंदे ने महाराष्ट्र में शिवसेना के नाम और तीर-धनुष चिह्न पर कब्जा किया था। स्पीकर रथींद्रनाथ बोस को सौंपे गए पत्र में ऋतब्रत बनर्जी के लिए LoP पद की मांग की गई है। संदीपन साहा, जावेद अहमद खान, सेउली साहा और सबीना यासमीन को उप-नेता के रूप में नामित किया गया है। स्पीकर ने पत्र स्वीकार कर लिया है और मामला अनुमोदन की प्रक्रिया में है।

ममता की जवाबी कार्रवाई: सभी समितियां भंग

बागियों के इस कदम के जवाब में ममता शिविर ने भी पलटवार किया। ममता बनर्जी खेमे ने सत्ता संघर्ष के बीच पश्चिम बंगाल में TMC की सभी संगठनात्मक समितियों को भंग कर दिया। पार्टी ने आधिकारिक बयान में कहा: “सावधानीपूर्वक विचार के बाद यह निर्णय लिया गया है कि पश्चिम बंगाल में अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस की सभी समितियां और इसके सभी मोर्चा संगठन तत्काल प्रभाव से भंग माने जाएंगे। पार्टी एक व्यापक आत्ममंथन अभियान शुरू करेगी।”

पृष्ठभूमि: कैसे शुरू हुई यह बगावत?

यह सारा विवाद तब गहराया जब ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन साहा ने 27 मई को स्पीकर को सूचित किया कि 6 मई की पार्टी बैठक में LoP के चुनाव से संबंधित कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ था जबकि पार्टी के आधिकारिक पत्र में इसका दावा किया गया था। दोनों विधायकों ने आरोप लगाया कि 6 मई का प्रस्ताव “बनावटी और मनगढ़ंत” था और बताया कि 70 में से 14 हस्ताक्षर “ब्लॉक लेटर” में थे। ममता बनर्जी ने BJP सरकार पर आरोप लगाया कि वह डराने-धमकाने के जरिए उनकी पार्टी को कमजोर कर रही है। उन्होंने फेसबुक लाइव सत्र में दावा किया कि कम से कम चार TMC विधायकों ने उन्हें बताया कि उन्हें पुलिस की धमकियां मिल रही हैं और पार्टी गतिविधियों से दूर रहने का दबाव डाला जा रहा है।

चुनावी हार का संदर्भ

2026 के विधानसभा चुनाव में TMC की बुरी हार हुई और ममता बनर्जी खुद भवानीपुर सीट पर BJP के सुवेंदु अधिकारी से हार गईं। ममता ने चुनाव को “धांधली” करार देते हुए इस्तीफा देने से मना कर दिया था, लेकिन 7 मई 2026 को विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने पर उनका मुख्यमंत्री पद स्वतः समाप्त हो गया।

आगे क्या?

अब सारी निगाहें विधानसभा स्पीकर रथींद्रनाथ बोस के फैसले पर टिकी हैं  कि वे किस गुट को आधिकारिक विपक्ष का दर्जा देते हैं। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ऋतब्रत गुट को मान्यता मिलती है, तो TMC का वही हश्र हो सकता है जो 2022 में उद्धव ठाकरे की शिवसेना का हुआ था। ममता बनर्जी की 28 वर्षों की मेहनत से खड़ी की गई पार्टी अपने सबसे गहरे संकट के दौर से गुजर रही है।

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