ईंधन की मार: हॉर्मुज़ संकट से भारत बेहाल, 20 दिन में चार बार बढ़े दाम , अभी और महंगाई का डर

मध्य-पूर्व में जारी युद्ध और होर्मुज़ जलडमरूमध्य के बंद रहने से उत्पन्न वैश्विक तेल संकट का सबसे भारी बोझ अब आम भारतीय उपभोक्ता की जेब पर पड़ रहा है। पिछले 20 दिनों में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में चार बार बढ़ोतरी हो चुकी है, जिससे दोनों ईंधनों के दाम कुल मिलाकर लगभग 7.50 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ चुके हैं। आज 4 जून को भले ही तेल कंपनियों ने कोई नई बढ़ोतरी नहीं की, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह राहत अस्थायी है।

आज के ताज़ा भाव: शहर-दर-शहर स्थिति

आज दिल्ली में पेट्रोल 102.12 रुपये और डीजल 95.20 रुपये प्रति लीटर पर बिक रहा है। मुंबई में डीजल 97.83 रुपये, कोलकाता में 99.82 रुपये, चेन्नई में 99.66 रुपये, हैदराबाद में 103.82 रुपये और बेंगलुरु में पेट्रोल 110.89 रुपये प्रति लीटर है। मध्य प्रदेश के भोपाल में पेट्रोल 114.45 रुपये और डीजल 99.33 रुपये प्रति लीटर पर पहुंच चुका है। दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जैसे बड़े शहरों में पेट्रोल के दाम आज स्थिर रहे, हालांकि चेन्नई और पटना में मामूली गिरावट आई, वहीं गुरुग्राम और लखनऊ में कुछ पैसे की बढ़त दर्ज की गई।

हॉर्मुज़ संकट — भारत के लिए सबसे बड़ा ऊर्जा झटका

28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इज़राइल के संयुक्त हवाई हमलों के बाद होर्मुज़ जलडमरूमध्य बंद हो गया, जिसके ज़रिए दुनिया का एक-पांचवां समुद्री कच्चा तेल और एलएनजी गुज़रता था। अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने इसे वैश्विक तेल बाज़ार के इतिहास की सबसे बड़ी आपूर्ति बाधा करार दिया है।  होर्मुज़ जलडमरूमध्य से भारत के कुल कच्चे तेल आयात का लगभग 41 प्रतिशत, एलएनजी आयात का 55 प्रतिशत और एलपीजी आयात का 88 प्रतिशत आता था। संकट की गहराई का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि भारत ने अपने कुल कच्चे तेल के प्रवाह का 40 प्रतिशत से अधिक खो दिया है और सरकार द्वारा पंप कीमतें कृत्रिम रूप से नीचे रखने के कारण तेल विपणन कंपनियां प्रतिदिन 1,000 करोड़ रुपये तक का घाटा उठा रही हैं। इसके अलावा, रुपया एक नई ऐतिहासिक निचली सतह पर पहुंच चुका है और विदेशी निवेशक 2026 के पहले चार महीनों में भारतीय शेयर बाज़ार से 20 अरब डॉलर से अधिक निकाल चुके हैं, जो पिछले पूरे साल की तुलना में अधिक है।

कच्चे तेल का हाल — मामूली राहत, पर ख़तरा बरकरार

4 जून 2026 को ब्रेंट क्रूड की कीमत 96.97 डॉलर प्रति बैरल रही, जो पिछले दिन से 0.86 प्रतिशत कम है। पिछले एक महीने में ब्रेंट की कीमत 11.74 प्रतिशत गिरी है, लेकिन यह एक साल पहले की तुलना में अभी भी 48.41 प्रतिशत अधिक है। आज सुबह ब्रेंट क्रूड 97.95 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचा, जो लगभग डेढ़ साल पहले की तुलना में करीब 32.50 डॉलर अधिक है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन (EIA) के अनुसार, ब्रेंट की कीमतें मई-जून में 106 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बनी रह सकती हैं। हालांकि मध्य-पूर्व में उत्पादन बढ़ने की स्थिति में वर्ष की चौथी तिमाही में यह गिरकर 89 डॉलर और 2027 में 79 डॉलर तक आ सकती है।

तेल कंपनियों की मुश्किल — घाटे की गर्त में OMCs

इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी सरकारी तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को प्रतिदिन पेट्रोल-डीजल की कीमतों में संशोधन करने का अधिकार है, लेकिन इन कंपनियों के समक्ष वैश्विक कीमतों और घरेलू बोझ के बीच संतुलन बनाने की बड़ी चुनौती है। स्रोत दस्तावेज़ में उल्लिखित क्रिसिल रिपोर्ट के अनुसार, घाटे की भरपाई के लिए आगामी महीनों में पेट्रोल-डीजल में 2.5 से 10 रुपये प्रति लीटर तक की और बढ़ोतरी की आवश्यकता पड़ सकती है। यदि 7.5 रुपये की बढ़ोतरी हुई तो खुदरा मूल्य सूचकांक (CPI) पर 36 आधार अंकों का असर पड़ेगा, जबकि 10 रुपये की बढ़ोतरी से यह 48 आधार अंक तक जा सकता है।

वैकल्पिक आपूर्ति की राह, मुश्किल लेकिन ज़रूरी

भारतीय रिफाइनरियाँ सामान्य उत्पादन स्तर बनाए रखते हुए अमेरिका, रूस और पश्चिम अफ्रीका से अतिरिक्त कच्चे तेल की खरीद के लिए बातचीत कर रही हैं, ताकि मध्य-पूर्व संघर्ष लंबा खिंचने पर आपूर्ति सुनिश्चित रहे। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि विकल्प अपनाने से लागत ढांचा तेज़ी से बिगड़ेगा क्योंकि खरीद मूल्य, माल-भाड़ा, बीमा और लंबे शिपिंग मार्गों की लागत बहुत अधिक होगी।

पड़ोसी देशों में और भी बुरे हाल

भारत की स्थिति तुलनात्मक रूप से पड़ोसियों से बेहतर है। पाकिस्तान में पेट्रोल 414 पाकिस्तानी रुपये (भारतीय रुपये में करीब 140 रुपये) प्रति लीटर के पार है, जबकि श्रीलंका में यह 120 से 147 रुपये (भारतीय मूल्य में) के बीच है। बांग्लादेश में भी कीमतें ऊंची हैं। भारत ने संकट के दौरान भी पेट्रोल में केवल 7.4 प्रतिशत और डीजल में 8.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी की, जो क्षेत्रीय औसत से काफी कम है।

RBI की चेतावनी और आर्थिक दबाव

भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने स्पष्ट किया है कि यदि होर्मुज़ जलडमरूमध्य और महीनों बंद रहा, तो केंद्रीय बैंक को मौद्रिक नीति में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है और भारत को अंततः पेट्रोल-डीजल की कीमतें बढ़ानी पड़ सकती हैं। वैश्विक स्तर पर तेल की मांग में भी गिरावट आ रही है, मार्च में वैश्विक तेल खपत साल-दर-साल 0.8 मिलियन बैरल प्रतिदिन घटी है और दूसरी तिमाही में इसके 1.5 मिलियन बैरल और घटने का अनुमान है। भारतीय कच्चे तेल की टोकरी फरवरी में 69 डॉलर प्रति बैरल से उछलकर मार्च में 126 डॉलर और अपने चरम पर 157 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थी। हालांकि अब कीमतें उस शिखर से नीचे आई हैं, फिर भी स्थिति नाज़ुक बनी हुई है।

आगे क्या?

ईरान के साथ जारी परमाणु वार्ता में अभी सफलता नहीं मिली है — ईरानी मीडिया ने बातचीत की प्रगति पर संदेह जताया है, जबकि राष्ट्रपति ट्रम्प का कहना है कि चर्चा जारी है। परमाणु कार्यक्रम पर ठोस प्रतिबद्धताओं के बिना किसी समझौते की संभावना नहीं दिख रही, जिससे वैश्विक कच्चे तेल भंडार में और कमी आने की आशंका है। होर्मुज़ से गुज़रने वाले जहाज़ों की संख्या पिछले दो सप्ताह में बढ़ी है और कुछ जहाज़ अमेरिकी सेना के साथ तालमेल में काम कर रहे हैं, लेकिन यातायात संकट से पहले के स्तर से कहीं नीचे बना हुआ है। ऐसे में सरकार और तेल कंपनियाँ कठिन विकल्पों के बीच फँसी हैं, या तो उपभोक्ताओं पर बोझ डालें या OMCs को और घाटे में धकेलें। आने वाले हफ्ते निर्णायक होंगे। आम उपभोक्ता को उम्मीद है कि होर्मुज़ खुले, वार्ता सफल हो और कच्चा तेल फिर से 70-80 डॉलर के दायरे में लौटे — तभी असली राहत संभव है।

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