टाटा ट्रस्ट्स में खुली जंग, नोएल टाटा और साथी ट्रस्टियों ने श्रीनिवासन-सिंह को घेरा

मुंबई। टाटा ट्रस्ट्स के भीतर चल रहा आंतरिक टकराव अब सार्वजनिक रूप ले चुका है। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट (SDTT) के चार ट्रस्टियों ने वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह पर तीखा हमला बोला है। इन चार ट्रस्टियों में चेयरमैन नोएल टाटा, दारियस खंबाटा, नेविल एन टाटा (नोएल टाटा के पुत्र) और भास्कर भट शामिल हैं। इन्होंने श्रीनिवासन और सिंह पर सामूहिक निर्णयों से पीछे हटने, मीडिया में निजी राय जाहिर करने और फिड्यूशियरी ड्यूटी (न्यासी दायित्व) के उल्लंघन का आरोप लगाया है।

क्या है पूरा विवाद

चार ट्रस्टियों द्वारा लिखे गए तीखे पत्र में साफ कहा गया है कि श्रीनिवासन और सिंह पहले टाटा सन्स को अनलिस्टेड रखने के सर्वसम्मत फैसलों में शामिल रहे, लेकिन बाद में अचानक लिस्टिंग का समर्थन करने लगे, वह भी बिना इस मुद्दे को ट्रस्टियों के सामने दोबारा रखे। पत्र में दोनों के अप्रैल 2026 में बदले रुख को तंज भरे अंदाज़ में “एपिफेनी” (अचानक हुआ ज्ञानोदय) कहा गया है।

पत्र के अनुसार, मार्च 2024 में टाटा सन्स बोर्ड ने, जिसमें श्रीनिवासन और सिंह भी टाटा ट्रस्ट की ओर से नामित निदेशक के रूप में शामिल थे, सर्वसम्मति से तय किया था कि कंपनी अनलिस्टेड ही रहेगी। इसके बाद टाटा सन्स ने करीब 20,000 करोड़ रुपए का कर्ज चुकाया और प्रेफरेंस शेयर भुनाए, साथ ही रिज़र्व बैंक (RBI) से अपना रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने की अनुमति मांगी। मई 2025 और जुलाई 2025 में भी दोनों ट्रस्टों ने, श्रीनिवासन और सिंह की भागीदारी के साथ, दोबारा अनलिस्टेड दर्जा बनाए रखने का प्रस्ताव पारित किया था। ट्रस्टियों का सवाल है कि जब ये प्रस्ताव अब तक रद्द नहीं हुए, तो दोनों वाइस चेयरमैन अचानक इनके विरोध में कैसे आ गए।

चैरिटी कमिश्नर के पास शिकायत पर भी विवाद

पत्र में सबसे तीखा हमला श्रीनिवासन और सिंह के चैरिटी कमिश्नर के समक्ष दायर शिकायत को लेकर है। ट्रस्टियों का आरोप है कि दोनों ने एक ओर सामूहिक चर्चा की मांग की, वहीं दूसरी ओर 25 सितंबर को चैरिटी कमिश्नर से SDTT की बैठकें रोकने और सर्कुलर प्रस्तावों पर रोक लगाने की मांग कर दी। ट्रस्टियों ने इसे विरोधाभासी रवैया बताते हुए उम्मीद जताई कि दोनों अपनी शिकायतें वापस लेंगे।

श्रीनिवासन के बोर्ड वोट पर भी सवाल

पत्र के अनुसार, 16 सितंबर को SDTT ने सर्कुलर प्रस्ताव पारित कर श्रीनिवासन से टाटा सन्स की लिस्टिंग से जुड़े किसी भी एजेंडे पर वोट न करने को कहा था, लेकिन उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि ट्रस्ट उनके निदेशक के तौर पर स्वतंत्र निर्णय में दखल नहीं दे सकता। इसके बाद 17 सितंबर की बोर्ड बैठक में श्रीनिवासन ने एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन पद पर दोबारा नियुक्त करने के पक्ष में वोट दिया, जबकि सेलेक्शन कमेटी की सिफारिश मौजूद नहीं थी और ट्रस्ट चेयरमैन ने इसके विरोध में वोट डाला था।

ट्रस्टियों का रुख: टाटा सन्स अनलिस्टेड ही रहे

ट्रस्टियों ने स्पष्ट किया कि 28 सितंबर का प्रस्ताव टाटा सन्स बोर्ड की शक्तियों को कमजोर करने के लिए नहीं, बल्कि बोर्ड के ही अनुरोध पर लाया गया था, क्योंकि RBI ने कंपनी के रजिस्ट्रेशन सरेंडर करने के आवेदन को अस्वीकार कर दिया था। उनका कहना है कि RBI ने लिस्टिंग को अनिवार्य नहीं बताया, बल्कि सिर्फ सरेंडर का आवेदन खारिज किया है, इसलिए कंपनी को अनलिस्टेड रखने के वैकल्पिक रास्ते तलाशे जाने चाहिए। ट्रस्टियों ने यह भी कहा कि टाटा सन्स ट्रस्ट्स की सबसे बड़ी संपत्ति है, जिससे होने वाली आय परोपकारी कार्यों में खर्च होती है, इसलिए इसकी सुरक्षा करना न्यासी दायित्व का हिस्सा है, न कि कोई व्यावसायिक हस्तक्षेप।

पत्र के अंत में चुनौती

पत्र के अंत में चार ट्रस्टियों ने श्रीनिवासन और सिंह को खुली चुनौती देते हुए कहा कि यदि उनके पास लिस्टिंग के अलावा कोई बेहतर और ठोस सुझाव है, तो वे उसे सामने रखें। यह विवाद अब सिर्फ टाटा सन्स की लिस्टिंग तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सवाल बन गया है कि टाटा ट्रस्ट्स के भविष्य का फैसला लेने का अधिकार आखिर किसके पास है और न्यासी दायित्व किसके प्रति सबसे पहले है।

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