नई दिल्ली। देश के प्रमुख न्यूज पब्लिशर्स के एक बड़े समूह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार के डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन (डीपीडीपी) एक्ट, 2023 और संबंधित नियमों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। रॉयटर्स की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन (डीएनपीए) के 21 सदस्यों ने 6 अक्टूबर को यह याचिका दायर की है, जिसकी सुनवाई मंगलवार (27 अक्टूबर) को होनी है।
इस समूह में मुकेश अंबानी के नेटवर्क18 (जिसके सात डिजिटल न्यूज प्लेटफॉर्म हैं) और गौतम अडानी के एनडीटीवी शामिल हैं। इसके अलावा इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स इंटरनेट (टाइम्स ऑफ इंडिया ग्रुप का हिस्सा) जैसे बड़े मीडिया हाउस भी इसमें शामिल हैं। यह याचिका अब तक डीपीडीपी कानून के खिलाफ सबसे हाई-प्रोफाइल चुनौती मानी जा रही है। पहले केवल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के कार्यकर्ता और कुछ छोटे न्यूज आउटलेट्स ही इसे चुनौती दे चुके थे।
मुख्य आपत्तियां क्या हैं?
698 पेज की याचिका में प्रकाशकों ने तर्क दिया है कि यह कानून जांच पत्रकारिता को “निर्दोष और निष्प्रभाव घटना-रिकॉर्डर” बना देगा। उनके अनुसार:
पत्रकारों को किसी व्यक्ति की जांच करने से पहले उसकी पूर्व सहमति लेनी पड़ सकती है।
प्रकाशकों को कहानियां मिटाने के लिए मजबूर किया जा सकता है।
कानून के तहत सूचना मांगने की शक्तियां रिपोर्टरों के सोर्स उजागर कर सकती हैं।
डीएनपीए ने अपनी गोपनीय फाइलिंग में कहा कि अगस्त में सरकार के साथ बैठक में मीडिया कंपनियों को प्रेस फ्रीडम की सुरक्षा का आश्वासन दिया गया था, लेकिन यूरोपीय संघ, सिंगापुर और ब्रिटेन की तरह पत्रकारों के लिए लिखित छूट (carve-out) न होने से चिंता बढ़ी है।
असामान्य चुनौती
यह चुनौती इसलिए भी उल्लेखनीय है क्योंकि अंबानी और अडानी के व्यवसाय विपक्षी दलों द्वारा मोदी सरकार के करीबी बताए जाते रहे हैं। विपक्ष उन पर अनुकूल व्यवहार का आरोप लगाता रहा है, जबकि व्यवसाय और सरकार इन आरोपों का खंडन करते हैं। भारत सरकार का कहना है कि वह प्रेस की स्वतंत्रता का सम्मान करती है।
पृष्ठभूमि और अन्य चुनौतियां
डीपीडीपी एक्ट 2023 में पारित हुआ था और 2025 में इसके नियम अधिसूचित हुए। कानून व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा का दावा करता है, लेकिन आलोचक कहते हैं कि इसमें पत्रकारिता के लिए पर्याप्त छूट नहीं है। पत्रकारों को “डेटा फिड्यूशियरी” माना जा सकता है, जिससे सहमति की अनिवार्यता और अन्य बाध्यताएं लग सकती हैं। इसके अलावा आरटीआई अधिनियम में संशोधन (सेक्शन 44(3)) से व्यक्तिगत जानकारी का खुलासा और भी सीमित हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट में पहले से कई याचिकाएं लंबित हैं, जिनमें रिपोर्टर्स कलेक्टिव, नेशनल कैंपेन फॉर पीपल्स राइट टू इंफॉर्मेशन, पत्रकार गीता शेषू और सॉफ्टवेयर फ्रीडम लॉ सेंटर जैसी याचिकाएं शामिल हैं। कोर्ट ने इनमें नोटिस जारी किए हैं और कुछ मुद्दों को बड़ी बेंच के लिए रेफर किया है। दिल्ली हाई कोर्ट में भी डीपीडीपी प्रावधानों को चुनौती दी गई है।
मीडिया संगठनों का कहना है कि बिना उचित छूट के यह कानून सार्वजनिक हित की जांच रिपोर्टिंग, सोर्स की गोपनीयता और सूचना के अधिकार पर नकारात्मक असर डाल सकता है। सरकार का पक्ष है कि कानून नागरिकों की प्राइवेसी की रक्षा करता है और प्रेस फ्रीडम के साथ संतुलन बनाता है। याचिका की सुनवाई मंगलवार को होने वाली है। इस मामले का नतीजा न केवल मीडिया उद्योग बल्कि भारत में जांच पत्रकारिता और डिजिटल प्राइवेसी नियमों के भविष्य को प्रभावित कर सकता है।

