नगर निगम नहीं, लोकतंत्र नदारद; जनता पूछ रही है — टैक्स किसके लिए?
नोएडा प्राधिकरण: देश के सबसे समृद्ध शहरी विकास प्राधिकरणों में शुमार नोएडा प्राधिकरण एक बार फिर विवादों के घेरे में है। जमीन आवंटन, भवन नक्शा स्वीकृति, लीज शुल्क और अन्य विकास शुल्कों से हर साल हजारों करोड़ रुपये की कमाई करने वाला यह प्राधिकरण जब शहर की बुनियादी समस्याओं के समाधान की बारी आती है, तो जिम्मेदारी से मुँह मोड़ लेता है। जनता की शिकायतों का अंबार लगा है, लेकिन जवाब देने वाला कोई नहीं। सड़कों पर जलभराव, सीवर जाम, टूटी गलियाँ, बिजली की अनियमित आपूर्ति और फ्लैट-प्लॉट की रजिस्ट्री में अड़चनें ये समस्याएँ नोएडा के हजारों निवासियों की रोज़मर्रा की पीड़ा बन चुकी हैं। इसके बावजूद अधिकारियों का एक ही जवाब होता है “मामला शासन स्तर पर विचाराधीन है।”
‘लाभ कमाने वाली कंपनी’ बन गया है प्राधिकरण
नोएडा प्राधिकरण पर आरोप लग रहे हैं कि यह एक ‘लाभ कमाने वाली कंपनी’ में तब्दील हो गया है, जहाँ निवासियों का शोषण हो रहा है। स्थानीय निवासियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि प्राधिकरण की नीतियाँ आम नागरिकों के बजाय बड़े उद्योगपतियों और बिल्डर लॉबी के हितों की पोषक बन चुकी हैं। समाजवादी पार्टी के महानगर अध्यक्ष डॉ. आश्रय गुप्ता ने प्राधिकरण की कार्यप्रणाली पर सीधा निशाना साधते हुए कहा कि शहर की आम जनता सड़क, पानी, सीवर, बिजली और रजिस्ट्री जैसी बुनियादी समस्याओं से जूझ रही है। उन्होंने आरोप लगाया कि कई सेक्टरों में जलभराव, टूटी सड़कें और सीवर जाम की समस्याएँ लगातार बनी हुई हैं, लेकिन अधिकारी इन पर गंभीरता नहीं दिखाते।
स्वयं वित्त पोषित, फिर भी लखनऊ का मुँह ताकना
प्रशासनिक विशेषज्ञ इस पूरे ढाँचे पर सवाल उठा रहे हैं। उनका तर्क है कि नोएडा प्राधिकरण आर्थिक रूप से पूरी तरह आत्मनिर्भर है — उसे राज्य सरकार के अनुदान की कोई आवश्यकता नहीं। फिर भी हर बड़े फैसले के लिए फाइलें महीनों तक शासन स्तर पर धूल फाँकती रहती हैं। विशेषज्ञों के अनुसार यह व्यवस्था जानबूझकर बनाई गई है, ताकि स्थानीय जवाबदेही से बचा जा सके।
नगर निगम नहीं — लोकतंत्र का सबसे बड़ा सूनापन
नोएडा में स्थानीय लोकतांत्रिक संरचना का पूरी तरह अभाव है। दिल्ली, गाजियाबाद या मेरठ जैसे शहरों में नगर निगम, मेयर और पार्षद की व्यवस्था है — जहाँ जनता अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से सीधे प्रशासन तक पहुँच सकती है। नोएडा में ऐसा कुछ नहीं। यहाँ सारा अधिकार आईएएस अधिकारियों और प्राधिकरण के सीईओ के हाथ में केंद्रित है। स्थानीय विधायक और सांसद केवल बोर्ड बैठकों में सुझाव दे सकते हैं, निर्णय लेने का अधिकार उनके पास नहीं है। नगर निकाय न होने के कारण यहाँ के नागरिकों को स्मार्ट सिटी, प्रधानमंत्री आवास योजना, अटल मिशन और राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन जैसी महत्वाकांक्षी केंद्रीय योजनाओं का लाभ भी नहीं मिल पा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट भी जता चुका है चिंता, SIT जाँच का आदेश
यह मामला अब न्यायपालिका तक पहुँच चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा प्राधिकरण के कामकाज पर सवाल उठाते हुए नई एसआईटी के गठन का आदेश दिया था। पुरानी एसआईटी रिपोर्ट में नोएडा प्राधिकरण की जगह महानगर निगम के गठन की सिफारिश की गई थी। यह सिफारिश अब भी ठंडे बस्ते में पड़ी है।
विकास कार्यों में भी लापरवाही उजागर
नोएडा प्राधिकरण की अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी वंदना त्रिपाठी को हाल ही में उद्यान विभाग के निर्माण एवं सौंदर्यीकरण कार्यों में हो रही देरी पर नाराजगी जताते हुए संबंधित अधिकारियों को कड़े निर्देश देने पड़े और स्पष्टीकरण भी माँगा गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि प्राधिकरण के भीतर भी जवाबदेही का संकट गहरा है।
74वें संवैधानिक संशोधन की भावना का उल्लंघन
प्रशासनिक मामलों के जानकार इस पूरे ढाँचे को भारतीय संविधान के 74वें संशोधन की मूल भावना के विरुद्ध बताते हैं। इस संशोधन में शहरी निकायों को स्वायत्तता और स्थानीय लोकतांत्रिक अधिकार देने की स्पष्ट व्यवस्था है। विशेषज्ञ नोएडा के मॉडल को “बिना जवाबदेही वाला पूंजीवादी प्रशासन” और “नौकरशाही का गढ़” की संज्ञा दे रहे हैं।
जनता की माँग चुने हुए प्रतिनिधियों को मिले अधिकार
डॉ. आश्रय गुप्ता ने माँग की है कि नोएडा में स्थानीय स्वशासन व्यवस्था तत्काल लागू की जाए और जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों को विकास कार्यों एवं प्रशासनिक फैसलों में वास्तविक भागीदारी दी जाए। उनका कहना है “जब तक नोएडा में लोकतांत्रिक ढाँचा नहीं बनेगा, तब तक जनता की आवाज़ प्रशासन तक नहीं पहुँचेगी।” यह रिपोर्ट नोएडा के स्थानीय प्रशासनिक ढाँचे की संरचनागत खामियों और जनता की बढ़ती आकांक्षाओं पर आधारित एक विशेष विश्लेषण है।

