राजकोटः मलबे के बीच मलाई! अतिक्रमण हटाओ अभियान में चाय-समोसे पर 46 लाख का बिल, कांग्रेस ने काजू लेकर किया प्रदर्शन

जिस अभियान में हजारों लोग बेघर हुए, उसी अभियान के ‘जायके’ का बिल अब सियासी तूफान बन गया है

गुजरात के राजकोट शहर में बीते फरवरी महीने में चलाए गए मेगा डिमोलिशन अभियान का खर्च अब नए विवाद की वजह बन गया है। राजकोट नगर निगम (आरएमसी) ने जंगलेश्वर इलाके में आजी नदी किनारे बने करीब 1,500 अवैध मकानों-दुकानों को ध्वस्त करने के लिए तीन दिन का बड़ा अभियान चलाया था, जिसमें नगर निगम, पुलिस, बिजली विभाग, फायर ब्रिगेड और स्वास्थ्य विभाग के करीब 4,800 कर्मचारी तैनात किए गए थे। अब चार महीने बाद इस अभियान के दौरान कर्मचारियों और पुलिसबल के खाने-पीने पर हुए खर्च के बिल सामने आए हैं, और आंकड़ा देखकर हर कोई हैरान है—करीब 46 लाख रुपये सिर्फ चाय, कॉफी, मिनरल वाटर, समोसे, काजू-खजूर और नाश्ते पर खर्च कर दिए गए।

कहां-कितना खर्च हुआ

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक बिलों का ब्योरा कुछ इस तरह है: आराधना टी स्टॉल:  चाय, कॉफी और बिस्कुट पर करीब 6.30 लाख रुपये का बिल, जिसमें 21 हजार कप चाय और लगभग 4 हजार बोतल नींबू पानी का जिक्र है।

प्रेमवती रेस्टोरेंट: काजू, खजूर रोल, वेफर समोसे और अन्य नाश्ते पर लगभग 20 लाख रुपये का बिल। नाश्ते की एक प्लेट की कीमत करीब 231 रुपये बताई गई है।

मिनरल वाटर: 12.40 लाख रुपये का अलग बिल।

मंडप सेवा (टेंट, कुर्सी-मेज इंतजाम): 6.70 लाख रुपये। मिनरल वाटर और मंडप सेवा का ठेका एक ही एजेंसी—उमिया मंडप सर्विस—को दिया गया था। हालांकि यह बिल अब तक आरएमसी की स्थायी समिति के सामने औपचारिक रूप से पेश नहीं किया गया है, लेकिन इसके लीक होने के बाद से ही हड़कंप मचा हुआ है।

नगर निगम की सफाई

विवाद बढ़ने पर आरएमसी के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. जयेश वंकानी ने सामने आकर कहा कि जंगलेश्वर अभियान आठ अलग-अलग क्षेत्रों में चलाया गया था, जिसमें भारी मानव-बल और संसाधन लगाने पड़े। उनका दावा है कि सभी ठेके नियमानुसार पहले से स्वीकृत एजेंसियों को ही दिए गए थे और इसमें कोई अनियमितता नहीं बरती गई। उन्होंने यह भी कहा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में परोसी गई काजू-खजूर रोल और समोसे की थाली का बिल भी मौजूद है, यानी निगम के पास हर खर्च का हिसाब है।

कांग्रेस का काजू लेकर प्रदर्शन

विपक्षी कांग्रेस ने इस मसले को जोरदार तरीके से उठाया है। पार्टी के पार्षद आरएमसी की आम सभा के बाहर हाथों में काजू लेकर प्रदर्शन करने पहुंचे और सवाल पूछा कि आखिर एक डिमोलिशन अभियान में इतने महंगे नाश्ते की जरूरत ही क्यों पड़ी। कांग्रेस ने पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग करते हुए कहा कि जब हजारों लोग अपना घर खो रहे थे, उस वक्त सरकारी खजाने से ‘दावत’ का इंतजाम किया जा रहा था। यह मसला अब आरएमसी में बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

जिनके घर टूटे, उनका दर्द

जंगलेश्वर का यह अभियान सिर्फ खर्च की वजह से नहीं, बल्कि मानवीय पहलू से भी सुर्खियों में रहा था। रिपोर्टों के अनुसार रमजान के दौरान चले इस अभियान में सैकड़ों परिवार बेघर हुए, कई लोगों ने अपने हाथों से अपने मकान तोड़े। इलाके के एक स्थानीय रैपर चांदमियां फकीर का गाना ‘जस्टिस फॉर जंगलेश्वर’ सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसमें यह सवाल उठाया गया कि विकास की सड़कें हमेशा गरीबों के घरों से होकर ही क्यों गुजरती हैं। मामला अदालत तक भी पहुंचा था और कोर्ट ने 1,358 मकानों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाई थी। बाद में आरएमसी ने अगले पांच वर्षों में 30 हजार नए घर बनाने की घोषणा की और 873 परिवारों को घर भी आवंटित किए जा चुके हैं।

देशभर में दिखती रही यही तस्वीर

अकेले राजकोट ही नहीं, बीते महीनों में देश के कई शहरों में अतिक्रमण-रोधी अभियानों के दौरान खर्च और मानवीय पीड़ा दोनों को लेकर विवाद उठते रहे हैं:

दिल्ली, यमुना बाजार: कश्मीरी गेट इलाके में बुलडोजर कार्रवाई से करीब 310 घरों के लगभग 1,100 लोगों पर बेघर होने का संकट खड़ा हो गया, स्थानीय लोगों ने प्रशासन पर पहले ही पानी काटने का आरोप लगाया।

दिल्ली, वजीरपुर:  झुग्गियां टूटने के बाद आम आदमी पार्टी के नेता पीड़ितों से मिलने पहुंचे और मुद्दे को विधानसभा में उठाने की बात कही। पीड़ितों ने 30-35 साल से बसे होने का दावा करते हुए सरकार पर वादाखिलाफी का आरोप लगाया।

पटना: बीस दिन से लगातार चल रहे अतिक्रमण-रोधी अभियान में सब्जी और मछली बाजार के दुकानदार फूट-फूटकर रोते दिखे और प्रशासन से वैकल्पिक जगह न देने पर नाराजगी जताई।

झांसी: यहां हर महीने अतिक्रमण हटाने पर करीब 7 लाख रुपये खर्च होने के बावजूद शहर की सड़कों पर अतिक्रमण जैसी स्थिति बनी रही, जिससे सवाल उठा कि आखिर यह खर्च किस काम का। इन सभी मामलों में एक समान सूत्र दिखता है प्रशासन की कार्रवाई के दौरान होने वाला खर्च और बेघर होने वाले लोगों की पीड़ा, दोनों ही आम जनता और विपक्ष के निशाने पर रहे हैं। राजकोट का मामला इसलिए अलग है कि यहां खर्च सीधे कर्मचारियों के खाने-पीने पर हुआ, जिससे आम लोगों में यह सवाल और तेज हो गया है कि जब एक तरफ हजारों परिवार अपना घर खो रहे थे, तो दूसरी तरफ सरकारी पैसे से इतनी ‘दावत’ किस आधार पर परोसी गई।

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