नोएडा। सेक्टर-132 स्थित ग्राम रोहिल्लापुर के किसानों ने नोएडा प्राधिकरण द्वारा खसरा संख्या-4 की भूमि पर 5 प्रतिशत आवासीय भूखंड आवंटित किए जाने की प्रक्रिया का कड़ा विरोध किया है। किसानों का आरोप है कि यह कार्रवाई नियमों, उनके साथ हुए लिखित समझौते तथा न्यायालयों में लंबित मामलों के विपरीत है। किसानों ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराने की मांग करते हुए कहा कि प्राधिकरण मीडिया को गुमराह कर विवादित भूमि पर भूखंड स्थानांतरित करने की कोशिश कर रहा है।
अजीत तोमर का कहना है कि खसरा संख्या-4 की भूमि का मुआवजा आज तक उन्हें प्राप्त नहीं हुआ है। इस भूमि से संबंधित वाद जिला न्यायालय के साथ-साथ सर्वोच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है। उनका दावा है कि मुआवजा न दिए जाने के कारण नोएडा प्राधिकरण भूमि का विधिक स्वामी नहीं बन पाया है, इसलिए इस पर किसी भी प्रकार की योजना लागू करना कानून के अनुरूप नहीं है।
अजीत तोमर के अनुसार वर्ष 2016 में नोएडा प्राधिकरण के अधिकारियों ने 24 मीटर चौड़ी सड़क के निर्माण के लिए किसानों से सहयोग मांगा था। किसानों का कहना है कि उस समय प्राधिकरण ने लिखित रूप से आश्वासन दिया था कि सड़क एवं संस्थागत भूखंडों में आने वाली भूमि का नियमानुसार मुआवजा दिया जाएगा, जबकि आबादी की ओर स्थित शेष भूमि का आबादी विनियमावली के तहत विनियमीकरण किया जाएगा। इसके बाद सर्वे कराया गया और आबादी विनियमावली के अंतर्गत गठित 5(1) समिति ने स्थल निरीक्षण कर आबादी को मान्यता देते हुए विनियमीकरण की संस्तुति की। किसानों के अनुसार वर्ष 2017 में इस प्रक्रिया पर आगे भी कार्रवाई की गई थी।
वहीं एडवोकेट रंजन तोमर का कहना है कि वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) ने इस भूमि को ग्रामीण आबादी मानते हुए शासन को संदर्भित करने के आदेश दिए थे। उनका कहना है कि यह भूमि नोएडा प्राधिकरण द्वारा पूर्व में निर्धारित ग्राम परिधि (Periphery) के भीतर स्थित पुरानी ग्रामीण आबादी है, इसलिए यहां 5 प्रतिशत आवासीय भूखंड लगाए जाना नियमों के विरुद्ध है। किसानों ने कहा कि इस भूमि से संबंधित मामला जिला न्यायालय के अलावा “अजीत सिंह बनाम उत्तर प्रदेश सरकार” प्रकरण के तहत सर्वोच्च न्यायालय में भी विचाराधीन है। ऐसे में विवादित भूमि पर किसी भी प्रकार की प्रशासनिक कार्रवाई न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित कर सकती है।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि उनके साथ हुए लिखित समझौते और पूर्व में किए गए सर्वे एवं समिति की संस्तुतियों की अनदेखी की जा रही है। उनका कहना है कि उपलब्ध परिस्थितियों से आशंका पैदा होती है कि पूरी प्रक्रिया किसानों के वैधानिक अधिकारों की अनदेखी करते हुए संचालित की जा रही है। किसानों ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही संबंधित अभिलेखों, नोटशीट, ले-आउट, अनुमोदन प्रक्रिया और फाइल मूवमेंट की जांच कराई जाए। यदि किसी भी स्तर पर अनियमितता सामने आती है तो संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई करते हुए 5 प्रतिशत आवासीय भूखंड आवंटन की पूरी प्रक्रिया तत्काल निरस्त की जाए।

