नई दिल्ली। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प द्वारा हाल ही में हस्ताक्षरित एक कानून के तहत रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार मिला है। इससे भारत, जो अपनी आधे से ज्यादा कच्चे तेल की जरूरत रूस से पूरी करता है, अमेरिका के साथ व्यापार में गंभीर संकट का सामना कर सकता है। लेकिन यह पहली बार नहीं है जब भारत को अमेरिकी प्रतिबंधों की चुनौती झेलनी पड़ रही हो। ठीक 25 साल पहले भी भारत ऐसे ही हालात से गुजरा था और अंततः विजयी होकर निकला था।
1998 का परमाणु परीक्षण और अमेरिकी नाराज़गी
बात 1990 के दशक के अंत की है, जब भारत आर्थिक उदारीकरण की राह पर तेज़ी से आगे बढ़ रहा था। सोवियत संघ के पतन के बाद भारत पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका के करीब आ रहा था। इसी बीच 11 मई 1998 को राजस्थान के पोखरण में भारतीय सेना ने ऑपरेशन शक्ति के तहत तीन भूमिगत परमाणु परीक्षण किए। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने भारत को पूर्ण परमाणु शक्ति घोषित किया। इस कदम से अमेरिका बुरी तरह नाराज़ हुआ। तत्कालीन राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने इसे क्षेत्रीय स्थिरता और परमाणु अप्रसार के लिए खतरा बताया। महज़ दो दिन बाद, 13 मई 1998 को क्लिंटन ने आर्म्स एक्सपोर्ट कंट्रोल एक्ट की धारा 102 (ग्लेन अमेंडमेंट) के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा कर दी।
आर्थिक सहायता और रक्षा सौदों पर लगी रोक
इन प्रतिबंधों के चलते मानवीय और खाद्य सहायता को छोड़कर भारत को मिलने वाली सारी अमेरिकी आर्थिक मदद रोक दी गई। इससे लगभग 21 मिलियन डॉलर की विकास सहायता और ग्रीनहाउस गैस कम करने की योजना के लिए तय 6 मिलियन डॉलर प्रभावित हुए। अमेरिका ने विश्व बैंक और आईएमएफ जैसी संस्थाओं से भारत को मिलने वाले 3-4 अरब डॉलर के ऋण का भी विरोध किया। इसके अलावा रक्षा उपकरणों की बिक्री और सैन्य सहयोग पर भी रोक लगा दी गई, जिसका असर अगले साल हुए कारगिल युद्ध के दौरान भी महसूस किया गया।
वाजपेयी का दो टूक जवाब — “सैंक्शन हमें नहीं झुका सकते”
इन प्रतिबंधों के बावजूद भारत अपने रुख पर अडिग रहा। 27 मई 1998 को संसद में वाजपेयी ने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा ही इस फैसले का आधार थी और नए परमाणु हथियार पूरी तरह आत्मरक्षा के लिए हैं। इंडिया टुडे को दिए एक बयान में उन्होंने कहा था कि प्रतिबंध भारत को न तो नुकसान पहुंचा सकते हैं और न ही डरा सकते हैं, क्योंकि भारत के पास अपने गौरवशाली अतीत और मजबूत भविष्य की दृष्टि है।
प्रतिबंधों के बावजूद तेज़ी से बढ़ी अर्थव्यवस्था
आंकड़े बताते हैं कि प्रतिबंधों का असर भारत की आर्थिक रफ्तार पर बहुत सीमित रहा। जहां 1998 में विकास दर करीब 5.8% थी, वहीं 2003 तक यानी प्रतिबंधों के महज़ 5 साल बाद ही यह बढ़कर 7.8% हो गई। इसी दौर में भारत ने अपने व्यापारिक साझेदारों में भी विविधता लाई — अमेरिका के साथ वस्त्र और रत्न व्यापार जारी रहा, यूरोपीय संघ से चमड़ा और रसायन का आदान-प्रदान हुआ, रूस से रक्षा उपकरण मिलते रहे, जबकि खाड़ी देशों से तेल आयात जारी रहा। तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा ने 2001 में कहा था कि रक्षा आपूर्ति को छोड़कर प्रतिबंधों का भारतीय अर्थव्यवस्था पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
कूटनीतिक संबंध बने रहे, आख़िरकार हटे प्रतिबंध
आर्थिक मोर्चे पर डटे रहने के साथ-साथ भारत ने अमेरिका के साथ बातचीत का रास्ता भी खुला रखा। साल 2000 में बिल क्लिंटन खुद भारत के दौरे पर आए — 1978 के बाद यह किसी अमेरिकी राष्ट्रपति की पहली भारत यात्रा थी। अंततः 22 सितंबर 2001 को, यानी ठीक 25 साल पहले, राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने ये प्रतिबंध पूरी तरह वापस ले लिए। इसके बाद 9/11 के बाद आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई में भारत के सहयोग ने दोनों देशों के रिश्तों को और मजबूती दी, और 2008 में हुए भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते ने भारत को एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता दिलाई।
आज भी प्रासंगिक है 25 साल पुराना सबक
आज भारत-अमेरिका संबंध पहले से कहीं ज्यादा गहरे हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में अमेरिका भारत के कुल निर्यात का करीब 19.78% हिस्सा लेता है, और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार करीब 239.6 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। ऐसे में 100% तक का प्रस्तावित टैरिफ भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में बुरी तरह गैर-प्रतिस्पर्धी बना सकता है, भले ही भारत अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी तेल खरीदना जारी रखे। 25 साल पुराना यह अनुभव यही सिखाता है कि भारत को अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देते हुए दबाव में झुकने से बचना चाहिए, लेकिन साथ ही अमेरिका के साथ रचनात्मक बातचीत भी जारी रखनी चाहिए। 2001 की घटना यह साबित करती है कि गहरे मतभेदों के बावजूद निरंतर बातचीत से रिश्तों को फिर से पटरी पर लाया जा सकता है।
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