सूरत से यूपी-बिहार के मजदूरों का बड़ा पलायन, फैक्ट्री मालिकों पर शोषण के आरोप

सूरत। गुजरात के डायमंड और टेक्सटाइल कारोबार के लिए मशहूर शहर सूरत में इन दिनों एक बड़ा घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। उत्तर प्रदेश और बिहार से आए हजारों मजदूर अचानक शहर छोड़कर अपने गांवों की ओर लौटने लगे हैं। इसका असर सूरत रेलवे स्टेशन पर साफ दिखाई दे रहा है, जहां प्लेटफॉर्मों पर मजदूरों की लंबी कतारें और भारी भीड़ जमा हो गई है। इस पूरे घटनाक्रम को मजदूरों ने ‘गांव चलो आंदोलन’ का नाम दिया है।

क्या है मजदूरों की मुख्य शिकायत

मजदूरों का आरोप है कि सूरत की फैक्ट्रियों में उनसे रोजाना करीब 12 घंटे काम कराया जाता है, इसके बावजूद उन्हें हफ्ते में एक दिन का साप्ताहिक अवकाश तक नहीं दिया जाता। महीने के सभी 30 दिन लगातार काम करने का दबाव डाला जाता है। जो वर्कर थकान या तबीयत खराब होने पर छुट्टी मांगते हैं, उनकी सैलरी से पैसे काट लिए जाते हैं या उन्हें नौकरी से निकाल दिया जाता है।

मजदूरों ने बयां किया दर्द

अयोध्या से आए एक मजदूर ने बताया कि हफ्ते में सिर्फ एक रविवार की छुट्टी मांगने पर पहले मालिक टालमटोल करते हैं और बाद में मुकर जाते हैं। इस मांग पर कई मजदूरों को काम से निकाल दिया गया, वह भी उनकी बकाया सैलरी दिए बगैर। प्रयागराज के एक मजदूर ने भावुक होते हुए कहा कि करीब पांच महीने से सूरत में काम करने के बावजूद छुट्टी मांगने पर सैलरी काटी जाती रही। उनका कहना था कि इस तरह की गुलामी झेलने से बेहतर है गांव लौटकर खेती-किसानी कर लेना। एक अन्य मजदूर ने गुस्सा जताते हुए कहा कि फैक्ट्री मालिक महीने के पूरे 30 दिन काम कराना चाहते हैं, जबकि वर्कर्स 26 दिन काम करने को तैयार हैं। इस मांग पर उन्हें सीधे फैक्ट्री से निकाल दिया गया।

लेबर यूनियन मैदान में उतरी

इस बड़े पैमाने पर हो रहे पलायन के बीच लेबर यूनियन भी मजदूरों के समर्थन में सामने आई है। यूनियन प्रतिनिधियों के मुताबिक रेलवे स्टेशन पर मजदूरों को पानी और खाने-पीने की चीजें मुहैया कराई जा रही हैं, साथ ही फैक्ट्री मालिकों के रवैये के खिलाफ विरोध जताया जा रहा है।

टेक्सटाइल इंडस्ट्री पर मंडराया संकट

सूरत की कपड़ा और कढ़ाई उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले इन्हीं प्रवासी मजदूरों के बड़ी संख्या में पलायन से आने वाले समय में कारीगरों की भारी कमी हो सकती है। अगर फैक्ट्री मालिकों ने साप्ताहिक अवकाश और उचित व्यवहार जैसी मजदूरों की वाजिब मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो सूरत की चमकती टेक्सटाइल इंडस्ट्री को बड़े आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।

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