नोएडा प्राधिकरण की नीतियों में ‘अपनों’ को राहत, ‘आम’ को आफ़त: मिक्स लैंड यूज़ के दाम बढ़ते ही फाइलें रुकी

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नोएडा। नोएडा प्राधिकरण की कार्यशैली और उसकी नीतियों को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं। आरोप हैं कि प्राधिकरण की नीतियां आम आदमी के लिए जहां आफ़त और अंतहीन इंतज़ार का सबब बनती हैं, वहीं रसूखदारों और ‘खास’ लोगों के लिए इसमें तत्काल राहत के रास्ते खोल दिए जाते हैं। इसका सबसे ताज़ा और बड़ा उदाहरण मिक्स लैंड यूज़ (मिश्रित भूमि उपयोग) योजना के क्रियान्वयन में देखने को मिला है।

विभिन्न स्रोतों और क्रेडिबल इनपुट्स से मिली जानकारी के मुताबिक, नोएडा प्राधिकरण ने ‘खास’ लोगों की मिक्स लैंड यूज़ से जुड़ी फाइलों को तो हरी झंडी दे दी, लेकिन आम आवंटियों की फाइलें महीनों तक ठंडे बस्ते में अटकी रहीं। अब जब प्राधिकरण ने बोर्ड बैठक में जमीन की दरें और कनवर्ज़न शुल्क (इम्पैक्ट फीस) बढ चुकी है। तब जाकर इन लटकी हुई फाइलों पर कार्रवाई को आगे बढ़ाया गया है। यानी आम आदमी को मंजूरी तब मिलेगी, जब उसे जेब से दोगुनी-तिगुनी कीमत चुकानी पड़ेगी। जिसके चलते लगभग सभी फाइलें रुक गई है। सवाल है कि प्राधिकरण को हुए नुकसान की भरपाई कौन करेंगा या फिर ये पूरी एक साजिश थी।

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क्या है खेल? खास को ‘पहले राहत’, आम को ‘महंगाई की आफ़त’

मिक्स लैंड यूज़ पॉलिसी के तहत आवासीय या औद्योगिक भूखंडों के मालिक निर्धारित इम्पैक्ट फीस (जो कि व्यावसायिक और आवासीय/औद्योगिक दरों के अंतर का एक निश्चित हिस्सा होती है) चुकाकर अपने प्लॉट के हिस्से पर कमर्शियल गतिविधियां (जैसे- गेस्ट हाउस, एटीएम, ऑफिस, शोरूम या कैफेटेरिया) चला सकते हैं।

  • चुनिंदा लोगों को पहले ही फायदा: सूत्रों का कहना है कि जब दरें पुरानी और कम थीं, तब प्राधिकरण के गलियारों में रसूख रखने वाले ‘खास’ लोगों की फाइलों को आनन-फानन में निपटाकर उन्हें मिक्स लैंड यूज़ की परमिशन दे दी गई।
  • आम आदमी की फाइलें अटकाने की रणनीति: वहीं दूसरी ओर, आम छोटे उद्यमियों और मकान मालिकों, जिन्होंने नियमों के तहत आवेदन किया था, उनकी फाइलों में तरह-तरह की आपत्तियां और तकनीकी कमियां निकालकर उन्हें महीनों तक बोर्ड बैठक और प्रशासनिक मंजूूरियों के नाम पर लटकाए रखा गया।

कीमतें बढ़ीं, तो खुला फाइलों का ताला

नोएडा प्राधिकरण अपनी आगामी बोर्ड बैठकों में वित्तीय बजट और आवंटन दरों में 6% या उससे अधिक की बढ़ोतरी करने जा रहा है। इसके साथ ही मिक्स लैंड यूज़ पॉलिसी में बदलाव कर इसके कनवर्ज़न शुल्क को भी महंगा करने की तैयारी है।

जैसे ही यह तय हुआ कि अब नई दरों के लागू होने से मिक्स लैंड यूज़ कराना बेहद महंगा हो जाएगा, वैसे ही प्राधिकरण ने आम आदमियों की उन फाइलों को आगे बढ़ाना शुरू कर दिया जो महीनों से धूल फांक रही थीं। रणनीति साफ है—अब इन आम आवेदकों को बढ़ी हुई नई दरों और महंगे शुल्क के दायरे में लाकर उनसे मोटी रकम वसूली जाएगी।

नियमों की आड़ में आम जनता का शोषण

प्राधिकरण के नियमों के मुताबिक, मिक्स लैंड यूज़ की अनुमति केवल उन्हीं प्लॉटों को मिल सकती है जो कम से कम 24 मीटर या उससे चौड़ी सड़क पर स्थित हों। आम आदमी इन सभी कड़े पैमानों को पूरा करने के बाद भी दफ्तरों के चक्कर काटता रहा।

पॉलिसी का विरोधाभास: मिक्स लैंड यूज़ योजना का मुख्य उद्देश्य शहरों में सस्टेनेबल डेवलपमेंट को बढ़ावा देना और लोगों को घर के पास सुविधाएं देना है। लेकिन नोएडा प्राधिकरण की लचर और भेदभावपूर्ण प्रशासनिक व्यवस्था के कारण यह योजना आम जनता के लिए राहत बनने के बजाय आर्थिक बोझ बन गई है।

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आम जनता में आक्रोश: बोर्ड बैठक के फैसलों पर टिकी निगाहें

इस दोहरी नीति को लेकर नोएडा के आरडब्ल्यूए (RWA) और औद्योगिक संगठनों में अंदरूनी आक्रोश है। लोगों का कहना है कि यदि प्राधिकरण को पारदर्शिता का दावा करना है, तो उन सभी आवेदनों को पुरानी दरों पर ही मंजूरी मिलनी चाहिए जो दरें बढ़ने से पहले जमा किए गए थे। अब देखना यह होगा कि आगामी बोर्ड बैठक में जब मिक्स लैंड यूज़ के नए रेट और नीतियां पटल पर रखी जाती हैं, तो क्या प्राधिकरण अपनी इस ‘खास को राहत, आम को आफ़त’ वाली छवि को सुधारने के लिए कोई राहत भरा कदम उठाता है, या फिर आम जनता को हमेशा की तरह इस प्रशासनिक चक्रव्यूह में पिसने के लिए छोड़ दिया जाता है।

 

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