Nestlé Warning Label Controversy: नेस्ले ने भारत से फूड लेबलिंग पर मांगी सलाह, वार्निंग लेबलपर बढ़ा विवाद

Nestlé Warning Label Controversy: नई दिल्ली, दुनिया की सबसे बड़ी फूड कंपनियों में शुमार नेस्ले ने भारत सरकार से आग्रह किया है कि पैकेज्ड फूड और ड्रिंक्स पर फ्रंट-ऑफ-पैक हेल्थ वार्निंग लेबल के नियम बनाते समय कंपनियों को भी बातचीत में शामिल किया जाए, ताकि यह प्रक्रिया “वैज्ञानिक आधार” पर हो सके। यह बयान ऐसे समय आया है जब भारत में सख्त फूड लेबलिंग की कमी को लेकर जनआक्रोश बढ़ता जा रहा है।

क्या है पूरा मामला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पिछले कई वर्षों से पैकेज्ड फूड पर वार्निंग लेबल लगाने की योजना पर काम कर रही थी, लेकिन इस साल मार्च में कोका-कोला और नेस्ले जैसी कंपनियों का प्रतिनिधित्व करने वाले इंडस्ट्री समूहों के विरोध के बाद यह प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया। रॉयटर्स की इस सप्ताह प्रकाशित एक रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ, जिसके बाद से सोशल मीडिया पर उपभोक्ताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़ी नाराजगी जताई है। गौरतलब है कि कोका-कोला और नेस्ले जैसी कंपनियां यूरोपीय बाजारों में वर्षों से स्वेच्छा से ऐसे ही लेबल अपने उत्पादों पर लगाती आ रही हैं।

नेस्ले CEO का बयान

नेस्ले के सीईओ फिलिप नवरातिल ने इकोनॉमिक टाइम्स को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि कंपनी शुगर, सॉल्ट और फैट की अधिकता वाले उत्पादों पर फ्रंट-ऑफ-पैक लेबलिंग का समर्थन करती है, लेकिन इस प्रक्रिया में निर्माताओं की राय भी ली जानी चाहिए। नवरातिल के अनुसार कंपनियों का पक्ष सुना जाना जरूरी है क्योंकि इस विषय पर अलग-अलग नजरिए हो सकते हैं, और नेस्ले यह सुनिश्चित करने की बहस में शामिल होना चाहती है कि नियम वैज्ञानिक आधार पर बनें। गौरतलब है कि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हेल्थ एक्टिविस्ट्स की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार को देरी के लिए फटकार लगाई थी और फ्रंट-फेसिंग वार्निंग लेबल जल्द लागू करने को कहा था। खाद्य सुरक्षा नियामक FSSAI ने रॉयटर्स के सवालों का अब तक कोई जवाब नहीं दिया है।

उपभोक्ताओं और एक्टिविस्ट्स में गुस्सा

अनुमान है कि भारत के 100 अरब डॉलर से बड़े पैकेज्ड फूड और बेवरेज बाजार के करीब 80% उत्पाद ऐसे हैं जिन्हें फैट, शुगर और सॉल्ट की अधिकता वाला माना जा सकता है। न्यूट्रिशन एडवोकेसी इन पब्लिक इंटरेस्ट के संयोजक डॉ. अरुण गुप्ता ने कहा कि नेस्ले की यह मांग असल में भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति को कमजोर करने की कोशिश है। उन्होंने बताया कि ये कंपनियां 2013 से यूरोप में वार्निंग लेबल अपना चुकी हैं, जबकि इनके ट्रेड बॉडीज भारत में इसी तरह के कदमों का लगातार विरोध करते रहे हैं। नेस्ले ने रॉयटर्स की टिप्पणी मांगे जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। गौरतलब है कि हाल के महीनों में भारत में फूड सेफ्टी को लेकर सख्ती बढ़ी है — मुंबई के एक चर्चित अधिकारी ने कई रेस्टोरेंट्स के लाइसेंस रद्द कर सुर्खियां बटोरी हैं।

दोहरा मापदंड? एक ही प्रोडक्ट, अलग फॉर्मूला

रॉयटर्स की रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि कंपनियां स्थानीय नियमों, स्वाद और खर्च क्षमता के हिसाब से एक ही उत्पाद के अलग-अलग वर्जन बनाती हैं। उदाहरण के तौर पर, लंदन में बिकने वाले फैंटा के एक कैन में 63 कैलोरी होती है, जबकि भारत में उसी आकार के प्रोडक्ट में करीब तीन गुना ज्यादा शुगर और 185 कैलोरी पाई जाती है। इस असमानता पर उद्यमी रविसुतंजनी कुमार ने X पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए सवाल उठाया कि क्यों वैश्विक ब्रांड्स भारतीय उपभोक्ताओं के साथ हल्का रवैया अपनाते हैं। जाने-माने फूड राइटर वीर सांघवी ने अपने कॉलम में लिखा कि कंपनियों की यह दलील सही है कि हेल्दी इंग्रीडिएंट्स इस्तेमाल करने से लागत बढ़ेगी, लेकिन सवाल यह है कि क्या कीमतों में मामूली बढ़ोतरी वाकई इतनी बड़ी समस्या है — क्योंकि मुनाफे के लिहाज़ से भले ही यह नुकसानदेह हो, पर देश की सेहत के लिए इसका फायदा ही ज्यादा होगा।

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