नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच हाल ही में हुई टेलीफोनिक बातचीत ने वैश्विक कूटनीति के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ते तनाव के बीच, दोनों नेताओं ने न केवल द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा की, बल्कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) को खुला और सुरक्षित रखने पर विशेष जोर दिया।
भारत जैसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए यह बातचीत महज एक औपचारिक संवाद नहीं, बल्कि रणनीतिक और आर्थिक सुरक्षा का एक महत्वपूर्ण अध्याय है।
क्या है ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ और क्यों है यह महत्वपूर्ण?
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज ओमान और ईरान के बीच स्थित एक संकरा समुद्री मार्ग है, जो फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है। दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल व्यापार इसी रास्ते से होता है। भारत के लिए इसकी अहमियत इस बात से समझी जा सकती है कि हमारी ऊर्जा जरूरतों (क्रूड ऑयल और एलपीजी) का एक बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से होकर आता है।
भारत के परिप्रेक्ष्य में बातचीत के 4 मुख्य बिंदु
1. ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) पर सीधा असर
भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 80% आयात करता है, जिसमें से एक बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यदि तनाव के कारण ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ बाधित होता है, तो भारत में पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छू सकती हैं और सप्लाई चेन ठप हो सकती है। ट्रंप और मोदी की इस चर्चा का उद्देश्य ऊर्जा आपूर्ति को निर्बाध बनाए रखना है।
2. 1 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा
खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख से 1 करोड़ भारतीय रहते हैं और काम करते हैं। युद्ध जैसी स्थिति या समुद्री मार्ग बंद होने का सीधा असर उनके रोजगार और सुरक्षा पर पड़ता है। प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप के साथ बातचीत में क्षेत्र में शांति और स्थिरता (De-escalation) की वकालत कर इसी चिंता को सामने रखा है।
3. वैश्विक कूटनीति में भारत की ‘बैलेंसिंग एक्ट’
भारत के संबंध अमेरिका और ईरान—दोनों के साथ महत्वपूर्ण हैं। जहाँ अमेरिका हमारा ‘व्यापक वैश्विक रणनीतिक साझेदार’ है, वहीं ईरान के साथ हमारे ऐतिहासिक और कनेक्टिविटी (चाबहार पोर्ट) संबंध हैं। ट्रंप से बातचीत के जरिए भारत ने यह संदेश दिया है कि वह किसी एक पक्ष के साथ खड़े होने के बजाय ‘नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था’ और ‘स्वतंत्र नौवहन’ (Freedom of Navigation) के पक्ष में है।
4. ‘ट्रंप फैक्टर’ और द्विपक्षीय समीकरण
डोनाल्ड ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति और कड़ा रुख अक्सर वैश्विक बाजारों में अनिश्चितता पैदा करता है। ऐसे में पीएम मोदी की उनसे सीधी बातचीत भारत को अमेरिकी विदेश नीति के संभावित झटकों से बचाने और द्विपक्षीय हितों को सुरक्षित करने का एक प्रभावी तरीका है।
विशेषज्ञ की राय: “भारत अब केवल मूकदर्शक नहीं”
कूटनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस बातचीत से यह स्पष्ट है कि अमेरिका अब पश्चिम एशिया के मुद्दों पर भारत को एक सक्रिय हितधारक (Stakeholder) मानता है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर चर्चा यह दिखाती है कि समुद्री सुरक्षा के मामलों में भारत की भूमिका अब हिंद महासागर से आगे बढ़कर वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण हो गई है।

