दो महीने वयस्क जेल में बंद रहा नाबालिग, अब NHRC ने लिया स्वतः संज्ञान, यूपी पुलिस-जेल प्रशासन से मांगा जवाब

कासना जेल में 16 वर्षीय किशोर को बालिग मानकर रखा गया, अदालत के आदेश पर बाल सुधार गृह भेजा गया, छह दिन बाद जमानत पर रिहाई

गौतमबुद्ध नगर में श्रमिकों के वेतन वृद्धि आंदोलन के दौरान गिरफ्तार किए गए एक 16 वर्षीय किशोर को पुलिस ने बालिग मानकर दो महीने से अधिक समय तक कासना की लुक्सर जेल में वयस्क कैदियों के बीच रखा। मामला सामने आने के बाद राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने इसे गंभीर मानवाधिकार उल्लंघन मानते हुए गुरुवार को स्वतः संज्ञान लिया है और उत्तर प्रदेश के पुलिस महानिदेशक (DGP) तथा जेल महानिदेशक (DG Prisons) को नोटिस जारी कर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।

क्या है मामला

पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, 14 अप्रैल को थाना फेस-2 पुलिस ने नोएडा के भंगेल इलाके में मजदूरों के वेतन वृद्धि और बेहतर कार्य परिस्थितियों की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन और उससे जुड़ी हिंसा के आरोप में किशोर को हिरासत में लिया था। किशोर के वकील के मुताबिक गिरफ्तारी और रिमांड दस्तावेजों में उसकी उम्र 25 वर्ष दर्ज कर दी गई, जबकि उसके आधार कार्ड में उम्र महज 16 वर्ष है। इसी गलत प्रविष्टि के आधार पर उसे वयस्क आरोपी मानकर कासना स्थित लुक्सर जेल भेज दिया गया, जहां वह करीब दो महीने तक बालिग कैदियों के साथ बंद रहा।

परिवार का आरोप है कि गिरफ्तारी के बाद न तो उन्हें सूचित किया गया और न ही किशोर को वकील से मिलने दिया गया। बताया जा रहा है कि गिरफ्तारी के लगभग एक महीने बाद ही उसे कानूनी प्रतिनिधित्व मिल सका। परिवार और वकील ने यह भी आरोप लगाया है कि हिरासत में किशोर के साथ मारपीट की गई और उसे अदालत में हथकड़ी-जंजीरों में बांधकर पेश किया गया, जो किशोर न्याय अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का सीधा उल्लंघन है।

अदालत में वकील की नजर पड़ी, खुला राज

मामले का खुलासा तब हुआ जब एक सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता माणिक गुप्ता की नजर हथकड़ी में पेश किशोर पर पड़ी और बातचीत में उसने खुद को नाबालिग बताया। इसके बाद वकील ने उसका आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज जुटाकर अदालत में पेश किए, जिनकी जांच में उसकी उम्र 16 वर्ष होने की पुष्टि हुई। 29 मई को गौतमबुद्ध नगर की एक सत्र अदालत ने किशोर को जमानत दे दी। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि किशोर का नाम FIR में दर्ज नहीं था और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सीसीटीवी, वीडियो या फोटोग्राफिक सबूत मौजूद नहीं था जिससे घटना में उसकी भूमिका साबित होती हो। गवाहों के बयान भी उसकी कोई स्पष्ट संलिप्तता नहीं दर्शाते थे।

जमानत के बावजूद हफ्तों जेल में रहना पड़ा

जमानत मंजूर होने के बावजूद किशोर तुरंत रिहा नहीं हो सका, क्योंकि परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि वह जमानत के लिए जरूरी 50-50 हजार रुपये के दो जमानती और 45 हजार रुपये की राशि नहीं जुटा पा रहा था। इस बीच 6 जून को उसकी ओसिफिकेशन जांच (हड्डी परीक्षण से उम्र के आकलन की प्रक्रिया) की रिपोर्ट भी आ गई, जिसमें उसकी उम्र लगभग 16 वर्ष ही आंकी गई। यह पुष्टि होने के बावजूद उसे छह दिन और वयस्क जेल में ही रखा गया। अदालत ने 8 जून को आदेश जारी कर उसे वयस्क जेल से निकालकर बाल सुधार गृह (किशोर गृह) भेजने का निर्देश दिया, जिसके बाद 12 जून को उसे स्थानांतरित किया गया। बाद में अदालत ने जमानत राशि को 45 हजार रुपये से घटाकर 30 हजार रुपये कर दिया। जमानत के बदले एक मोटरसाइकिल के दस्तावेज जमा कराने के बाद 18 जून को किशोर को बाल सुधार गृह से रिहा कर दिया गया। इस तरह वह कुल मिलाकर लगभग दो महीने वयस्क जेल और छह दिन किशोर गृह में बिताने के बाद आज़ाद हुआ। जांच में सामने आया कि किशोर भंगेल क्षेत्र का रहने वाला है और एक किराना दुकान पर काम करता था। पुलिस का कहना है कि गिरफ्तारी के समय किशोर ने खुद को बालिग बताया था, जिसके आधार पर आगे की कार्रवाई हुई। हालांकि कानूनी विशेषज्ञ इस सफाई पर सवाल उठाते हुए कहते हैं कि उम्र को लेकर थोड़ा भी संदेह होने पर दस्तावेजी सत्यापन अनिवार्य होता है, खासकर तब जब मामला किशोर न्याय कानून से सीधे जुड़ा हो।

NHRC का स्वतः संज्ञान, दो हफ्ते में मांगी रिपोर्ट

मीडिया रिपोर्टों के आधार पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने गुरुवार को इस मामले में स्वतः संज्ञान लिया। आयोग ने इसे एक नाबालिग को दो महीने से अधिक समय तक अवैध रूप से वयस्क कैदी के तौर पर बंद रखने का बेहद गंभीर मामला बताया है। आयोग ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी और डीजी जेल को नोटिस जारी कर दो सप्ताह के भीतर विस्तृत जवाब मांगा है, जबकि अपने महानिदेशक (इन्वेस्टिगेशन) को एक सप्ताह के भीतर तथ्यात्मक जांच रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए हैं। आयोग की प्राथमिकता यह स्पष्ट करना है कि उम्र सत्यापन की प्रक्रिया में चूक आखिर किस स्तर पर हुई गिरफ्तारी के समय, रिमांड दस्तावेज तैयार करते समय या जेल में दाखिले के दौरान और इस गंभीर लापरवाही के लिए कौन जिम्मेदार है। मामला अब पुलिस और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है, खासकर इस बात पर कि नाबालिगों से जुड़े मामलों में वर्षों से लागू किशोर न्याय अधिनियम और सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के बावजूद आधार जैसे पहचान दस्तावेजों की जांच क्यों नहीं की गई। किशोर न्याय अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार विधि के विरुद्ध किसी भी बालक की पहचान सार्वजनिक नहीं की जा सकती, इसलिए इस रिपोर्ट में पीड़ित किशोर का नाम प्रकाशित नहीं किया गया है।

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