Jantar Mantar student movement: नई दिल्ली। NEET-UG परीक्षा में गड़बड़ी को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर से शुरू हुआ छात्र आंदोलन बीते कुछ हफ्तों में राष्ट्रीय स्तर की सियासी हलचल में बदल गया है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बैनर तले शुरू हुआ यह प्रदर्शन अब मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और पटना जैसे शहरों तक फैल चुका है, और इसके साथ ही पुलिस कार्रवाई, हथियारों के इस्तेमाल और गिरफ्तारियों को लेकर विवाद भी गहराता जा रहा है।
कैसे शुरू हुआ आंदोलन
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की शुरुआत सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल और छात्रों के धरने से हुई थी। 20 जुलाई 2026 को केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग को लेकर ‘चलो पार्लियामेंट’ मार्च बुलाया गया, जिसके दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच झड़प हो गई। इसमें दर्जनों लोग घायल हुए थे।
पैलेट गन विवाद: पहले इनकार, फिर स्वीकारोक्ति
घटना के तुरंत बाद यह दावा सामने आया कि प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए पैलेट गन और शॉक बैटन का इस्तेमाल किया गया, जिसमें कम से कम चार लोग घायल हुए। दिल्ली पुलिस ने शुरू में इस दावे से इनकार किया और यह घटना राष्ट्रीय राजधानी में आम नागरिकों पर पैलेट गन के इस्तेमाल का पहला दर्ज मामला मानी जा रही है। हालांकि, बाद में सामने आए दस्तावेजों ने मामले को नया मोड़ दे दिया। पार्लियामेंट स्ट्रीट थाने की जनरल डायरी एंट्री से खुलासा हुआ कि रैपिड एक्शन फोर्स ने एक डीसीपी स्तर के अधिकारी के मौखिक और लिखित निर्देश पर एंटी-रॉयट गन से दो राउंड पैलेट दागे थे। कुछ दिन बाद एक और रिपोर्ट में यह आंकड़ा और बड़ा निकला दस्तावेजों के मुताबिक डीसीपी राजा बांठिया के आदेश पर RAF ने 70 से अधिक पैलेट शेल दागे, साथ ही टियर स्मोक ग्रेनेड और दंगारोधी गन का भी प्रयोग किया गया। इस मुद्दे पर राजनीतिक हलचल भी तेज हुई। कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने लोकसभा में पैलेट गन से घायल एक पीड़ित के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस की जबकि पुलिस लंबे समय तक इस्तेमाल से इनकार करती रही। मामला अब न्यायपालिका तक पहुंच चुका है पूर्व IPS अधिकारी यशोवर्धन आजाद समेत कुछ पीड़ितों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर शांतिपूर्ण प्रदर्शनों में पैलेट गन के इस्तेमाल पर देशव्यापी प्रतिबंध की मांग की है, साथ ही घायलों के मुफ्त इलाज और मुआवजे की भी अपील की गई है।
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा
आंदोलन के दबाव में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने अपना इस्तीफा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भेजा। NEET-UG परीक्षा में अनियमितता की शिकायतों और जंतर-मंतर पर चल रहे छात्र आंदोलन के बीच यह फैसला लिया गया, और उनका कहना था कि सरकार ने अनियमितताओं की शिकायत आते ही तुरंत कार्रवाई की थी। प्रधान ने अपने बयान में शिक्षा व्यवस्था में सुधार को देश के विकास की नींव बताया।
बिहार: सीवान में AK-47 फायरिंग
आंदोलन की आंच बिहार तक पहुंची, जहां 25 जुलाई को बिहार बंद के दौरान कई जिलों में छात्रों और पुलिस के बीच झड़पें हुईं। सीवान जिले में मामला और गंभीर हो गया। प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए लाठीचार्ज के अलावा एक जवान ने AK-47 से फायरिंग कर दी, जिसके बाद संबंधित जवान अभिषेक पटेल को निलंबित कर दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार इस फायरिंग में तीन लोगों को गोली भी लगी, जिसने यह सवाल खड़ा किया कि अगर फायरिंग केवल हवा में हुई थी तो चोटें कैसे आईं। विपक्ष ने इस मामले को जोरशोर से उठाया। राजद सांसद मनोज झा ने सुप्रीम कोर्ट का रुख करते हुए प्रदर्शनकारियों पर गोली चलाने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग की। दबाव के बीच बिहार सरकार ने आंशिक राहत भी दी राज्य सरकार ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज मामले वापस लेने और गिरफ्तार छात्रों को रिहा करने की घोषणा की।
पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में कार्रवाई
आंदोलन से जुड़ी गिरफ्तारियां सिर्फ बिहार तक सीमित नहीं रहीं। जुलाई को दिल्ली, बिहार, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र और असम में पुलिस कार्रवाई तेज हो गई, और दिल्ली पुलिस ने दावा किया कि उसके पास 100 से अधिक CCTV फुटेज हैं जिनके आधार पर हिंसा में शामिल लोगों की पहचान की जा रही है। वहीं CJP और सहयोगी छात्र संगठनों का आरोप है कि सरकार अपने वादे से मुकर रही है। प्रवक्ता आशुतोष रांका ने आरोप लगाया कि प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कोई पुलिस कार्रवाई न करने के समझौते का उल्लंघन हो रहा है, और दिल्ली, बिहार व बंगाल में छात्रों तथा वॉलंटियर्स को हिरासत में लेकर परेशान किया जा रहा है। संगठन ने केंद्रीय मंत्रियों पर वादाखिलाफी का आरोप लगाते हुए फिर से बड़े आंदोलन की चेतावनी दी है। दूसरी ओर, सत्तापक्ष समर्थित मीडिया और कुछ नेताओं का कहना है कि गिरफ्तारियां आंदोलन में घुस आए अराजक तत्वों और हिंसा में शामिल लोगों तक सीमित हैं, न कि शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों तक। दोनों पक्षों के बीच यह मतभेद अब भी सुलझा नहीं है कि गिरफ्तार किए गए लोगों की पहचान किस आधार पर हुई।
जंतर-मंतर पर प्रशासन की नई कार्रवाई: बैरिकेड्स की वेल्डिंग
आंदोलन थमने के बजाय बार-बार सुलगता दिख रहा है। जंतर-मंतर पर अब प्रशासन ने प्रदर्शन स्थल को स्थायी रूप से घेरने के लिए नया कदम उठाया है मौके पर मौजूद बैरिकेड्स को आपस में वेल्ड कर एक-दूसरे से जोड़ा जा रहा है, ताकि प्रदर्शनकारी तय सीमा से आगे न बढ़ सकें। यह कदम भविष्य में किसी भी बड़े जमावड़े या मार्च को रोकने की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है।
सरकार बनाम विपक्ष: आमने-सामने के दावे
इस पूरे प्रकरण में सरकार और विपक्ष के दावे परस्पर विरोधी हैं:
विपक्ष और छात्र संगठनों का पक्ष:आंदोलन से जुड़े नेताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कार्रवाई न करने और सभी गिरफ्तार लोगों को रिहा करने का जो आश्वासन दिया था, उससे अब पीछे हटा जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ताओं ने विशेष रूप से मुस्लिम और दलित छात्रों को निशाना बनाए जाने की भी शिकायत की है। सरकार और पुलिस का पक्ष: केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा है कि सरकार छात्र आंदोलन और पेपर लीक विवाद को लेकर संवेदनशील है, आरोपियों की गिरफ्तारी पहले ही हो चुकी है और फास्ट-ट्रैक कोर्ट के जरिए जल्द सजा सुनिश्चित की जाएगी। पुलिस प्रशासन का कहना है कि कार्रवाई केवल हिंसा में शामिल लोगों तक सीमित है।
मामला अदालत की दहलीज़ पर
पैलेट गन के इस्तेमाल और पुलिस कार्रवाई को लेकर विवाद अब सिर्फ सड़क या संसद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंच चुका है। एक ओर बिहार में फायरिंग के खिलाफ FIR दर्ज करने की मांग वाली याचिका दायर हुई है, तो दूसरी ओर दिल्ली में पैलेट गन के इस्तेमाल पर देशव्यापी रोक की मांग को लेकर भी याचिका दाखिल की गई है।
आगे क्या?
CJP और सहयोगी छात्र संगठनों ने साफ कर दिया है कि यह आंदोलन तब तक अधूरा है जब तक सभी गिरफ्तार छात्रों की रिहाई और उनके खिलाफ दर्ज मामलों की वापसी नहीं होती। संगठन ने बिहार और कोलकाता में आगामी दिनों में नए प्रदर्शनों का भी ऐलान किया है। दूसरी ओर, सरकार का रुख यह है कि पेपर लीक जैसे मुद्दों पर कार्रवाई पहले ही शुरू हो चुकी है और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के साथ एक बड़ी मांग पूरी की जा चुकी है। आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई, बिहार व बंगाल में प्रस्तावित प्रदर्शन, और केंद्र सरकार का अगला कदम यह तय करेंगे कि यह आंदोलन शांत होगा या और तेज होगा।

