भारत में 1901 के बाद पाँचवाँ सबसे सूखा जून, मानसून की मार पस्त पड़े किसान

देश में इस साल जून का महीना पिछले 125 वर्षों के इतिहास में पाँचवाँ सबसे शुष्क महीना दर्ज किया गया है। मौसम विभाग और कई अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के मुताबिक 1901 के बाद से जून में इतनी कम बारिश बहुत कम मौकों पर ही दर्ज हुई है, जिससे खरीफ की बुवाई, भूजल स्तर और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के आँकड़ों के अनुसार 4 से 22 जून के बीच देश में सामान्य 97.6 मिलीमीटर के मुकाबले मात्र 53.1 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई, यानी करीब 46 प्रतिशत की कमी रही। राज्यवार स्थिति देखें तो मानसून के मुख्य क्षेत्र मध्य प्रदेश में 58 प्रतिशत, महाराष्ट्र में सबसे ज़्यादा 85 प्रतिशत, गुजरात में 84 प्रतिशत, छत्तीसगढ़ में 71 प्रतिशत, झारखंड में 71 प्रतिशत और मेघालय में 81 प्रतिशत तक बारिश की कमी दर्ज की गई। विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल की खाड़ी, पूर्वी भारत और हिमालयी क्षेत्र पर बादलों की सक्रियता बनी रही, जबकि मध्य और पश्चिमी भारत के बड़े हिस्से लगभग बादल-रहित रहे, जिससे नमी वाली हवाओं का अंदरूनी इलाकों तक पहुँचना बाधित हुआ। इसी वजह से मानसून की प्रगति लगभग दो सप्ताह तक रुकी रही।

हालाँकि महीने के अंत तक हालात में कुछ सुधार के संकेत मिले हैं। अरब सागर से नमी से भरी हवाओं ने मुंबई, उसके उपनगरों और दक्षिण-पूर्व गुजरात के हिस्सों में प्रवेश करना शुरू कर दिया है, जिससे महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में अगले 24 से 48 घंटों में बारिश गतिविधि बढ़ने की उम्मीद जताई गई है। IMD ने 29 जून को जारी अपने बुलेटिन में पश्चिम बंगाल, सिक्किम, कोंकण-गोवा और मध्य महाराष्ट्र में भारी से अत्यंत भारी बारिश की चेतावनी भी दी है, साथ ही उत्तर प्रदेश, हरियाणा, चंडीगढ़ और दिल्ली में लू की स्थिति बने रहने की आशंका जताई है।मौसम विभाग पहले ही इस साल के मानसून सीज़न को लेकर सतर्क कर चुका था। IMD ने 2026 के दक्षिण-पश्चिम मानसून के अपने पूर्वानुमान को संशोधित कर इसे दीर्घावधि औसत (LPA) का 90 प्रतिशत बताया था, जिसमें चार प्रतिशत के मॉडल त्रुटि मार्जिन के साथ इसे सामान्य से कम वर्षा की श्रेणी में रखा गया। विभाग के अनुसार इस सीज़न में सामान्य से कम वर्षा की 60 प्रतिशत और सामान्य या उससे कम वर्षा की 84 प्रतिशत संभावना जताई गई थी। 

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार जून की इस कमज़ोर बारिश का सीधा असर खरीफ की फसलों, खासकर धान, दलहन और गन्ने की बुवाई पर पड़ा है, जिससे बीज और खाद की मांग में गिरावट देखी गई है। ग्रामीण इलाकों में ट्रैक्टर और दोपहिया वाहनों की बिक्री पर भी इसका प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है, क्योंकि किसान बारिश की प्रतीक्षा में नकदी खर्च करने से बच रहे हैं। मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले हफ्तों में मानसून की रफ्तार, अरब सागर की मानसूनी धारा की मजबूती और मध्य व पश्चिमी भारत में बारिश की वापसी पर सबकी नज़र रहेगी। यदि जुलाई और अगस्त में अच्छी बारिश होती है तो जून की कमी की भरपाई संभव है, लेकिन देरी और असमान वितरण आगे भी फसल उत्पादन को प्रभावित कर सकता है।

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