महर्षि आश्रम की जमीन पर धड़ल्ले से अवैध निर्माण! ED की जांच के बीच भी नहीं थम रहा फ्लैट-विला बनाने का खेल

नोएडा। हाजीपुर, सलारपुर, भंगेल और गेझा समेत आसपास के इलाकों में महर्षि आश्रम की जमीन से जुड़ा विवाद अब लगातार गंभीर होता जा रहा है। एक तरफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) कथित फर्जी दस्तावेजों के जरिए जमीन की खरीद-फरोख्त और उससे जुड़े लेनदेन की जांच कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ इन जमीनों पर अवैध निर्माण और प्लॉटिंग की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल नोएडा प्राधिकरण के वर्क सर्किल और संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर उठ रहा है।

रिपोर्टों के मुताबिक ED ने हाल में इस मामले में नोएडा प्राधिकरण के कर्मचारियों से पूछताछ की है। जांच में जमीन की खरीद-बिक्री, निर्माण गतिविधियों और संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल की जा रही है।

फर्जी दस्तावेजों से जमीन बेचने के आरोप

पूरा मामला Spiritual Regeneration Movement Foundation of India (SRM Foundation) की जमीन से जुड़ा है। इस संस्था की स्थापना वर्ष 1963 में हुई थी और इसका प्रशासनिक कार्यालय नोएडा में भी है।

आरोप है कि ट्रस्ट के कथित फर्जी पदाधिकारी तैयार कर दस्तावेजों के जरिए जमीन की बिक्री की गई। ED की जांच में कई बैनामों और जमीन के लेनदेन को जांच के दायरे में लिए जाने की जानकारी सामने आई है। जून 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, गेझा तिलपताबाद और भंगेल क्षेत्र के कुछ खसरा नंबरों से जुड़े 36 बैनामों की भी जांच की गई थी।

करीब 3500 बीघा जमीन का मामला

मीडिया रिपोर्टों में महर्षि आश्रम की कुल जमीन करीब 3500 बीघा बताई गई है। रिपोर्टों के अनुसार वर्ष 2017 के बाद इसके बड़े हिस्से पर अवैध कॉलोनियां और निर्माण विकसित होने की बात सामने आई।

इस पूरे मामले में जमीन बेचने वाले कथित लोगों के साथ-साथ उन कॉलोनाइजर और बिल्डरों की भूमिका भी जांच के दायरे में है, जिन्होंने विवादित जमीन पर निर्माण कराकर खरीदारों को फ्लैट, विला और अन्य संपत्तियां बेचने का काम किया।

30 हजार फ्लैट-विला और कमर्शियल यूनिट का दावा

स्थानीय स्तर पर यह दावा किया जा रहा है कि इस इलाके में अब तक करीब 30 हजार फ्लैट, विला और कमर्शियल संपत्तियों के नाम पर जमीन बेची जा चुकी है। हालांकि इस संख्या की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी सामने नहीं आई है। यही वजह है कि मामला केवल जमीन की खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं रह गया है। अब उन निर्माणों की वैधता भी बड़ा सवाल बन गई है, जो कथित तौर पर विवादित जमीन पर खड़े किए गए हैं। पहले की रिपोर्टों में भी महर्षि आश्रम की जमीन पर बिना स्वीकृत नक्शे के फ्लैट और बहुमंजिला निर्माण होने की बात सामने आई थी।

ED जांच के बीच भी निर्माण पर सवाल

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि जमीन के दस्तावेजों और बिक्री प्रक्रिया को लेकर लंबे समय से विवाद था, तो निर्माण गतिविधियों पर समय रहते प्रभावी कार्रवाई क्यों नहीं हुई? प्राधिकरण का वर्क सर्किल किसी भी क्षेत्र में होने वाले अवैध निर्माण की निगरानी और कार्रवाई के लिए जिम्मेदार होता है। ऐसे में यदि विवादित जमीन पर लगातार नए निर्माण होते रहे हैं तो संबंधित अधिकारियों की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी की मिलीभगत को जांच या न्यायिक निष्कर्ष के बिना तथ्य के रूप में कहना उचित नहीं होगा। ED की जांच में यदि किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसकी जिम्मेदारी जांच के निष्कर्ष और संबंधित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगी।

इन खसरा नंबरों पर निर्माण का आरोप

स्थानीय शिकायतों और उपलब्ध जानकारी के अनुसार निम्न खसरा नंबरों को लेकर अवैध निर्माण की शिकायतें सामने आई हैं:

700 से 715, 723, 724, 728, 730 से 735, 745 से 752, 759 से 764, 779, 780 और 795 से 798।

इन खसरा नंबरों पर मौजूद प्रत्येक निर्माण की वैधता का अलग-अलग सत्यापन आवश्यक है। प्राधिकरण को यह स्पष्ट करना चाहिए कि इनमें से कितने भूखंडों पर नक्शा स्वीकृत है, कितने निर्माणों को नोटिस जारी हुए हैं और कितने मामलों में ध्वस्तीकरण या अन्य कार्रवाई की गई है।

खरीदारों के सामने भी बड़ा जोखिम

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू उन लोगों से जुड़ा है जिन्होंने अपनी जिंदगी की जमा पूंजी लगाकर इन इलाकों में फ्लैट, विला या प्लॉट खरीदे हैं। यदि किसी संपत्ति की जमीन ही विवादित या अवैध तरीके से हस्तांतरित पाई जाती है तो खरीदारों के सामने भविष्य में मालिकाना हक, बिजली-पानी, बैंक लोन और संपत्ति की बिक्री जैसी समस्याएं खड़ी हो सकती हैं।

पहले भी इस मामले में आश्रम की जमीन पर बने कुछ निर्माणों को अवैध घोषित किए जाने और संबंधित संपत्तियों की खरीद-बिक्री पर रोक जैसे कदमों की रिपोर्ट सामने आ चुकी है।

प्राधिकरण से उठ रहे सीधे सवाल

अब सवाल यह है कि ED जमीन के पुराने लेनदेन और कथित फर्जीवाड़े की जांच कर रही है, तो वर्तमान में चल रहे निर्माण की निगरानी कौन करेगा?

क्या संबंधित वर्क सर्किल ने इन खसरा नंबरों का सर्वे कराया है?

कितने अवैध निर्माणों को नोटिस जारी किए गए?

कितने निर्माणों के खिलाफ FIR दर्ज हुई?

कितने भवनों पर सीलिंग या ध्वस्तीकरण की कार्रवाई हुई?

और यदि लंबे समय से निर्माण जारी था तो संबंधित क्षेत्र के अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी?

इन सवालों के जवाब इसलिए भी जरूरी हैं क्योंकि मामला अब केवल पुरानी जमीन की खरीद-बिक्री का नहीं है, बल्कि विवादित जमीन पर नए निर्माण और उन्हें खरीदारों तक पहुंचाने की प्रक्रिया का भी है। ED की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ रही है, अब निगाहें इस बात पर हैं कि जमीन के कथित फर्जीवाड़े के साथ-साथ उन लोगों की भूमिका पर भी कार्रवाई होती है या नहीं, जिन्होंने विवादित जमीन पर निर्माण कर संपत्तियां बेचने का काम किया।

 

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