85 परियोजनाओं को मिली राहत, 18 हजार से ज्यादा फ्लैटों की रजिस्ट्री हुई पूरी, लेकिन एक दर्जन से ज्यादा बिल्डर अब भी बकाया जमा करने और मालिकाना हक देने से बच रहे
दिल्ली-एनसीआर में वर्षों से अपने घर की रजिस्ट्री का इंतजार कर रहे हजारों फ्लैट खरीदारों के लिए ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण ने सख्त कदम उठाना शुरू कर दिया है। अमिताभ कांत समिति की सिफारिशों के आधार पर बिल्डरों को दी गई राहत का फायदा उठाने के बावजूद जो डेवलपर न तो परियोजनाएं पूरी कर रहे हैं और न ही प्राधिकरण का बकाया जमा कर रहे हैं, उनके खिलाफ अब नोटिस जारी करने और कड़ी कार्रवाई की प्रक्रिया तेज कर दी गई है।
क्या है अमिताभ कांत समिति की सिफारिश
देश में कोविड महामारी और जमीन के बढ़ते बकाये के कारण रुकी पड़ी रियल एस्टेट परियोजनाओं को राहत देने के लिए केंद्र सरकार ने नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। इस समिति की सिफारिशों को उत्तर प्रदेश सरकार ने 21 दिसंबर 2023 को शासनादेश के रूप में लागू किया। इसके तहत बिल्डरों को कोविड काल (अप्रैल 2020 से मार्च 2022) के लिए “जीरो पीरियड” की छूट, बकाया जमा करने के लिए समय विस्तार, मॉर्गेज की अनुमति, सह-डेवलपर नियुक्त करने और जमीन का आंशिक सरेंडर करने जैसी सुविधाएं दी गईं। बदले में बिल्डरों से उम्मीद की गई कि वे जल्द से जल्द फ्लैट खरीदारों के नाम रजिस्ट्री पूरी कराएंगे। ग्रेटर नोएडा औद्योगिक विकास प्राधिकरण (जीएनआईडीए) के बोर्ड ने अपनी 133वीं बैठक में इन सिफारिशों को अपनाया, जिसका सीधा फायदा करीब 117 ग्रुप हाउसिंग परियोजनाओं और लगभग 75 हजार फ्लैट खरीदारों को मिलने का अनुमान लगाया गया था।
अब तक कितना असर हुआ
प्राधिकरण की 141वीं बोर्ड बैठक में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, इस राहत नीति की मदद से 98 में से 85 परियोजनाओं को रास्ता मिल चुका है और करीब 18 हजार खरीदारों के फ्लैटों की रजिस्ट्री संपन्न हो चुकी है। यह आंकड़ा दिखाता है कि नीति का असर हुआ है, लेकिन अब भी एक बड़ा वर्ग ऐसा है जिसे राहत नहीं मिल पाई है।
किन बिल्डरों पर एक्शन की तैयारी
प्राधिकरण ने ऐसे करीब एक दर्जन बिल्डरों को चिन्हित किया है जिन्होंने बार-बार नोटिस मिलने के बाद भी न तो परियोजनाएं पूरी की हैं और न ही बकाया जमा करके खरीदारों को मालिकाना हक दिया है। इनमें एविजे डेवलपर्स, एमएसएक्स रियलटेक, ज्योतिर्मय इंफ्राकॉन, अंतरिक्ष इंजीनियरिंग और एलीगेंट इंफ्राकॉन जैसी कंपनियों के नाम शामिल हैं। प्राधिकरण के अधिकारियों के अनुसार, इन बिल्डरों को अमिताभ कांत समिति से मिली छूट का सीधा फायदा तो हुआ, लेकिन वे न तो प्राधिकरण की देनदारी चुका रहे हैं और न ही खरीदारों को उनका हक सौंप रहे हैं। इससे पहले प्राधिकरण के अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी स्तर पर क्रेडाई और बिल्डर प्रतिनिधियों के साथ हुई बैठक में भी स्पष्ट चेतावनी दी जा चुकी थी कि यदि बिल्डरों ने जल्द रजिस्ट्री नहीं कराई, तो उन्हें अमिताभ कांत समिति के तहत मिली छूट वापस ली जा सकती है। साथ ही यह निर्देश भी दिया गया था कि जो खरीदार जानबूझकर रजिस्ट्री नहीं करा रहे, उन्हें अंतिम नोटिस जारी कर आवंटन रद्द करने की प्रक्रिया शुरू की जाए।
नोएडा में भी वैसी ही तस्वीर, OTS स्कीम की तैयारी
ग्रेटर नोएडा के पड़ोसी नोएडा प्राधिकरण में भी स्थिति लगभग वैसी ही है। ताज़ा जानकारी के मुताबिक, नोएडा में 57 डिफॉल्टर परियोजनाओं पर करीब 26 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का बकाया है और लगभग 2.12 लाख फ्लैट खरीदारों की रजिस्ट्री इससे जुड़ी हुई है। प्राधिकरण के मुताबिक पिछले दो वर्षों में महज लगभग 1,200 करोड़ रुपये की वसूली हो सकी है और केवल 4,364 फ्लैट खरीदारों के पक्ष में ही रजिस्ट्री पूरी हुई है, जबकि 21 हजार से अधिक खरीदार अब भी इंतजार में हैं। बारह बिल्डरों ने तो नोटिस का जवाब तक नहीं दिया, जबकि चौदह बिल्डरों ने आंशिक भुगतान कर सहमति जरूर जताई है। इसी वजह से नोएडा प्राधिकरण ने बकाया वसूली में तेजी लाने के लिए वन टाइम सेटलमेंट (OTS) योजना का प्रस्ताव तैयार कर राज्य सरकार को भेज दिया है। अधिकारियों का कहना है कि आने वाली कैबिनेट बैठक में इस प्रस्ताव पर विचार हो सकता है और मंजूरी मिलते ही इसे लागू कर दिया जाएगा। इसके अलावा गौतम बुद्ध नगर के जिलाधिकारी स्तर पर भी फ्लैट रजिस्ट्री में देरी को लेकर दर्जनों बिल्डरों को तलब करते हुए नोटिस जारी किए जा चुके हैं।
सरकार का सख्त रुख
उत्तर प्रदेश के औद्योगिक विकास मंत्री नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’ ने हाल ही में हुई समीक्षा बैठक में अधिकारियों को डिफॉल्टर बिल्डरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने और लंबित रजिस्ट्रियों तथा बिल्डर-खरीदार विवादों को प्राथमिकता पर निपटाने के निर्देश दिए हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, जो बिल्डर भुगतान नहीं करते, उनके खिलाफ रिकवरी सर्टिफिकेट जारी कर वसूली, संपत्ति की कुर्की, बैंक खाता अटैचमेंट, परियोजनाओं से ब्लैकलिस्टिंग, रेरा के तहत कानूनी कार्रवाई और गंभीर मामलों में दिवाला प्रक्रिया (IBC/NCLT) तक का रास्ता अपनाया जा सकता है।
खरीदारों के लिए क्या मायने हैं
जिन बिल्डरों के पास नकदी है, बिकने लायक फ्लैट या जमीन जैसी संपत्ति बची है, उनके लिए राहत योजनाओं और OTS का फायदा उठाकर बकाया चुकाना और रजिस्ट्री कराना संभव है। लेकिन जो बिल्डर पूरी तरह आर्थिक संकट में फंसे हैं, उनके मामलों में खरीदारों को अभी और इंतजार करना पड़ सकता है। प्राधिकरण और सरकार दोनों का जोर अब इस बात पर है कि राहत का फायदा उठाने वाले बिल्डर अपनी जिम्मेदारी से न बचें, ताकि वर्षों से अटकी रजिस्ट्रियां जल्द पूरी हो सकें और खरीदारों को उनके घर का कानूनी मालिकाना हक मिल सके।

