मासिक धर्म के दौरान कई महिलाओं को अचानक चॉकलेट, मीठा, तीखा या फास्ट फूड खाने की तीव्र इच्छा होती है। इसे फूड क्रेविंग कहा जाता है और यह अधिकतर हार्मोनल बदलाव, न्यूरोट्रांसमीटर में उतार-चढ़ाव और ब्लड शुगर में अस्थिरता के कारण होता है। प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. वैशाली शर्मा ने इस व्यवहारिक समस्या के पीछे के वैज्ञानिक कारण और प्रभावी रोकथाम के उपायों पर विस्तार से जानकारी दी।
हार्मोनल उतार-चढ़ाव मुख्य कारण
डॉ. शर्मा के अनुसार पीरियड्स से पहले और दौरान शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन के स्तर में तेज बदलाव होते हैं। इन हार्मोनल उतार-चढ़ावों से मस्तिष्क में भूख और भोजन संबंधी सिग्नल बदल जाते हैं, जिससे विशेषकर मीठे और कार्बोहाइड्रेट युक्त चीजों की तीव्र चाहत पैदा होती है। साथ ही एस्ट्रोजन के घटने से सेरोटोनिन (जो मूड को संतुलित रखता है) का स्तर कम हो जाता है; सेरोटोनिन कमी का त्वरित असर खुशी और संतोष देने वाले खाने (जैसे चॉकलेट, बिस्किट) की तरफ़ झुकाव बढ़ाने में होता है।
ब्लड शुगर और अन्य जैविक कारण
हार्मोनल असंतुलन ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव भी पैदा कर सकता है, जिससे कभी अचानक अधिक भूख और किसी विशेष खाद्य वस्तु की लालसा होती है। कुछ महिलाओं में पीरियड्स के साथ पेट फूलना, थकान और मूड स्विंग्स भी होते हैं, जिससे वे आराम और तात्कालिक ऊर्जा के लिए जंक फूड या मीठा चुनती हैं। छोटे स्तर पर लो-आयरन (आयरन की कमी) भी कभी-कभार हमारे स्वाद व cravings को प्रभावित कर सकती है, इसलिए अधिक बार अत्यधिक क्रेविंग वाले मामलों में ब्लड टेस्ट की सलाह दी जाती है।
क्या सामान्य है और कब डॉक्टर से मिलें
डॉ. शर्मा बताती हैं कि थोड़ी-बहुत फूड क्रेविंग सामान्य है और इसके कारण महिलाओं को अनावश्यक मानसिक तनाव नहीं लेना चाहिए। हालांकि, यदि क्रेविंग इतनी तीव्र हो कि वजन बढ़ने, गंभीर पोषण संबंधी असंतुलता या दैनिक जीवन में बाधा उत्पन्न हो रही हो, या फिर अचानक अत्यधिक विशेष खाद्य पदार्थों का सेवन हो रहा हो, तो चिकित्सकीय परामर्श आवश्यक है। साथ ही बार-बार थकान, चक्कर, या असामान्य रूप से भारी माहवारी जैसे लक्षण दिखें तो गाइनोकोलॉजिकल जांच व पोषण विशेषज्ञ से सलाह लेने का सुझाव दिया जाता है।
रोकथाम और नियंत्रित करने के व्यावहारिक उपाय
डॉ. शर्मा ने क्रेविंग से निपटने के कुछ सरल और व्यावहारिक उपाय सुझाए हैं, जिन्हें महिलाएं रोज़मर्रा की जिंदगी में लागू कर सकती हैं: हेल्दी विकल्प चुनें: मीठे की चाहत हो तो मिल्क चॉकलेट की बजाय डार्क चॉकलेट या ताजे फल, सूखे मेवे (खजूर, किशमिश) लें। यह तुरंत संतोष देगा और पोषण भी बढ़ाएगा। छोटे-छोटे भोजन: हर 3–4 घंटे में हल्का-फुल्का भोजन करें ताकि ब्लड शुगर स्थिर रहे और अचानक भूख न लगे। प्रोटीन और फाइबर बढ़ाएँ: साबुत अनाज, दालें, नट्स और हरी सब्जियाँ खाने से पेट लंबे समय तक भरा रहता है और स्नैक्स की लालसा कम होती है।पर्याप्त पानी पिएं: कभी-कभी निर्जलीकरण को भूख समझ लिया जाता है; दिनभर में पर्याप्त पानी, नारियल पानी या हर्बल चाय से हाइड्रेशन बनाए रखें। हल्की एक्सरसाइज व योग: रोज़ाना हल्की वॉक, स्ट्रेचिंग या योग करने से एंडोर्फिन रिलीज होता है, जिससे मूड बेहतर रहता है और क्रेविंग कम होती है। माइंडफुल ईटिंग अपनाएँ: टीवी या मोबाइल देखते-देखते न खाएं; खाने पर ध्यान दें, धीरे-धीरे चबाएँ और सूक्ष्म संकेतों को समझें कि आप भूखे हैं या बस मूड की वजह से खा रहे हैं। जरूरत पड़ने पर परीक्षण: बार-बार अत्यधिक क्रेविंग वाले मामलों में आयरन, विटामिन बी12 और थायरॉइड परीक्षण कराने की सलाह दी जाती है, क्योंकि इनकी कमी भी वांछित व्यवहार को प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञ की सलाह और मानसिक पहलू
डॉ. शर्मा कहती हैं कि भावनात्मक कारक भी क्रेविंग बढ़ा सकते हैं — तनाव, ऊब या भावनात्मक अस्थिरता में लोग खाने की ओर भागते हैं। इसलिए तनाव प्रबंधन के लिए मेडिटेशन, गहरी साँसों के व्यायाम और पर्याप्त नींद अहम हैं। यदि व्यक्ति को खाने के प्रति नियंत्रण खोने का अनुभव हो रहा हो या खाने से जुड़ी मानसिक परेशानी हो तो मनोवैज्ञानिक परामर्श (counseling) उपयोगी साबित हो सकता है।
निष्कर्ष
फूड क्रेविंग एक व्यापक रूप से पाई जाने वाली और सामान्य समस्या है, जिसका मुख्य कारण हार्मोनल व न्यूरोट्रांसमीटर का अस्थिर होना है। छोटे-छोटे व्यवहारिक बदलाव, संतुलित आहार और जीवनशैली सुधार से इसे काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। जब क्रेविंग अत्यधिक हो और जीवन गुणवत्ता पर असर डाल रही हो, तब विशेषज्ञों से जाँच व मार्गदर्शन आवश्यक है।

