भारतीय राजनीति और बौद्धिक जगत में आरिफ मोहम्मद खान एक ऐसा नाम हैं, जिन्होंने हमेशा लकीर से हटकर अपनी राह बनाई है। उत्तर प्रदेश की जमीनी राजनीति से निकलकर बिहार और केरल के राज्यपाल (गवर्नर) के प्रतिष्ठित पद तक पहुँचने वाले आरिफ मोहम्मद खान अपनी बेबाक बयानबाजी, प्रगतिशील विचारों और संवैधानिक मूल्यों के प्रति अटूट निष्ठा के लिए जाने जाते हैं। एक प्रखर वक्ता, कानूनविद और सुधारवादी नेता के रूप में उनका जीवन और सफर बेहद प्रेरणादायक है। आइए विस्तार से जानते हैं उनके जीवन, राजनीतिक सफर और ऐतिहासिक निर्णयों के बारे में:
1. प्रारंभिक जीवन, शिक्षा और पारिवारिक पृष्ठभूमि
आरिफ मोहम्मद खान का जन्म 18 नवंबर 1951 को उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में हुआ था। उनकी शुरुआती शिक्षा बुलंदशहर के ही लखौटी स्थित जामिया उर्दू और गवर्नमेंट हाई स्कूल से हुई।
इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए देश के प्रतिष्ठित संस्थानों का रुख किया:
- अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (AMU): यहाँ से उन्होंने स्नातक (B.A.) की पढ़ाई पूरी की। AMU के दौर में ही उनकी नेतृत्व क्षमता उभरकर सामने आई।
- लखनऊ यूनिवर्सिटी: यहाँ से उन्होंने कानून की पढ़ाई (LL.B.) पूरी की।
छात्र राजनीति से शुरुआत: आरिफ मोहम्मद खान छात्र जीवन से ही बेहद सक्रिय थे। साल 1972-73 में वे अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ (AMU Students’ Union) के अध्यक्ष चुने गए, जिसने उनके राजनीतिक भविष्य की मजबूत नींव रखी।
2. राजनीतिक सफर: युवाओं के नेता से केंद्रीय मंत्री तक
आरिफ मोहम्मद खान ने बहुत कम उम्र में मुख्यधारा की राजनीति में कदम रख दिया था। उनका राजनीतिक ग्राफ बेहद दिलचस्प और उतार-चढ़ाव भरा रहा है:
- भारतीय क्रांति दल (BKD) से शुरुआत: उन्होंने अपना पहला विधानसभा चुनाव 1977 में सियाना निर्वाचन क्षेत्र से भारतीय क्रांति दल के टिकट पर लड़ा, लेकिन इसमें उन्हें सफलता नहीं मिली।
- कांग्रेस में प्रवेश और संसद का सफर: बाद में वे कांग्रेस में शामिल हो गए। 1980 में वे कानपुर से और 1984 में बहराइच से लोकसभा सांसद चुने गए।
- केंद्रीय मंत्रिमंडल में भूमिका: उनकी प्रशासनिक और वाकपटुता की क्षमता को देखते हुए उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार में केंद्रीय राज्य मंत्री (ऊर्जा, उद्योग और नागरिक उड्डयन जैसे विभाग) बनाया गया।
3. शाह बानो मामला: जब सिद्धांतों के लिए लात मार दिया मंत्री पद
आरिफ मोहम्मद खान के जीवन का सबसे ऐतिहासिक और मोड़ देने वाला क्षण 1986 का शाह बानो मामला था। इस घटना ने उन्हें भारतीय राजनीति में एक ‘रिफॉर्मर’ (सुधारवादी) के रूप में स्थापित कर दिया।
क्या था मामला? सर्वोच्च न्यायालय ने तलाकशुदा मुस्लिम महिला शाह बानो के पक्ष में गुजारा भत्ता देने का ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने इस फैसले को पलटने के लिए संसद में एक विधेयक लाने का फैसला किया।
आरिफ मोहम्मद खान ने इस कदम का पुरजोर विरोध किया। उनका मानना था कि यह कदम मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों के खिलाफ और तुष्टिकरण की राजनीति का हिस्सा है। जब सरकार नहीं मानी, तो उन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता न करते हुए केंद्रीय मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया। उनके इस कदम ने पूरे देश का ध्यान खींचा और वे प्रगतिशील सोच के प्रतीक बन गए।
4. जनता दल और भाजपा के साथ जुड़ाव
कांग्रेस छोड़ने के बाद आरिफ मोहम्मद खान जनता दल में शामिल हो गए।
- 1989 में वे जनता दल के टिकट पर फिर से लोकसभा पहुंचे और वी.पी. सिंह सरकार में केंद्रीय नागरिक उड्डयन और ऊर्जा मंत्री बने।
- इसके बाद के वर्षों में वे कुछ समय के लिए बहुजन समाज पार्टी (BSP) में भी रहे।
- साल 2004 में उन्होंने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का दामन थामा और बहराइच से चुनाव लड़ा, हालांकि इस चुनाव में उन्हें कामयाबी नहीं मिली। इसके बाद उन्होंने सक्रिय दलीय राजनीति से कुछ समय के लिए दूरी बना ली और लेखन व सामाजिक विमर्श में जुट गए।
5. संवैधानिक पदों पर पारी: बिहार और केरल के राज्यपाल
आरिफ मोहम्मद खान की बौद्धिक क्षमता, कानून की समझ और निष्पक्षता को देखते हुए उन्हें देश के महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों की जिम्मेदारी दी गई:
केरल के राज्यपाल के रूप में ऐतिहासिक कार्यकाल (2019 से)
सितंबर 2019 में राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने उन्हें केरल का राज्यपाल नियुक्त किया। केरल के राज्यपाल के रूप में उनका कार्यकाल भारतीय राजनीति में सबसे चर्चित और ऊर्जावान कार्यकालों में से एक माना जाता है:
- सक्रिय और मुखर भूमिका: उन्होंने केरल की वामपंथी सरकार (LDF) के साथ कई मुद्दों पर सीधे वैचारिक लोहा लिया, विशेषकर नागरिकता संशोधन अधिनियम (CAA) और विश्वविद्यालयों में कुलपतियों (VCs) की नियुक्ति के मामलों पर।
- संवैधानिक सर्वोच्चता की लड़ाई: उन्होंने हमेशा इस बात पर जोर दिया कि विश्वविद्यालयों और राज्य के प्रशासन में कानून और संविधान का पालन होना चाहिए, न कि किसी राजनीतिक विचारधारा का।
- बिहार के राज्यपाल (2025–2026)
खान को राष्ट्रपति ने 24 दिसंबर 2024 को बिहार का राज्यपाल नियुक्त किया था,[1] और उन्होंने 2 जनवरी 2025 को पदभार ग्रहण किया। उन्होंने 14 मार्च 2026 को पद छोड़ दिया, जब सिर्फ़ 1 साल और 71 दिनों के बाद सैयद अता हसनैन ने उनकी जगह ली।
6. सामाजिक और धार्मिक सुधारों के पैरोकार
आरिफ मोहम्मद खान सिर्फ एक राजनेता नहीं, बल्कि इस्लामी विद्वान और विचारक भी हैं। वे अक्सर टीवी बहसों, सेमिनारों और अपने लेखों के माध्यम से निम्नलिखित मुद्दों पर खुलकर बोलते हैं:
- तीन तलाक (Triple Talaq) का विरोध: उन्होंने तीन तलाक को असंवैधानिक और गैर-इस्लामी बताते हुए इसके खिलाफ कानून बनाने का पुरजोर समर्थन किया।
- समान नागरिक संहिता (UCC): वे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने के समर्थकों में से एक रहे हैं, ताकि सभी नागरिकों को समान अधिकार मिल सकें।
- आधुनिक शिक्षा पर जोर: वे मदरसों के आधुनिकीकरण और मुस्लिम समाज में महिलाओं की उच्च शिक्षा के सबसे बड़े पैरोकार माने जाते हैं।
7. निजी जीवन, विवाह और पारिवारिक पृष्ठभूमि
आरिफ मोहम्मद खान का निजी जीवन भी बेहद सादगीपूर्ण और गरिमा से भरा रहा है। सार्वजनिक जीवन की व्यस्तताओं के बीच उन्होंने हमेशा अपने परिवार को एक मजबूत संबल दिया है।
- विवाह और जीवनसाथी: आरिफ मोहम्मद खान का विवाह 14 अक्टूबर 1977 को सैयदा रेशमा आरिफ के साथ हुआ। रेशमा आरिफ भी सामाजिक कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाती रही हैं।
- संतान: आरिफ मोहम्मद खान और रेशमा आरिफ के दो बेटे (Two Sons) हैं। दोनों ही अपने-अपने क्षेत्रों में स्थापित हैं:
- मुस्तफा आरिफ: वे पेशे से एक कुशल अधिवक्ता (Advocate) हैं और कानून के क्षेत्र में सक्रिय हैं।
- कबीर आरिफ: कबीर ने शुरुआत में बतौर पायलट (Pilot) ट्रेनिंग ली, लेकिन वर्तमान में वे उत्तर प्रदेश में बड़े स्तर पर ‘ऑर्गेनिक फार्मिंग’ (जैविक खेती) के अपने जुनून को आगे बढ़ा रहे हैं।
- पारिवारिक विरासत: आरिफ मोहम्मद खान के पिता का नाम अशफाक मोहम्मद खान था। इसके अलावा, दिल्ली की राजनीति में सक्रिय रहे पूर्व विधायक आसिफ मोहम्मद खान उनके छोटे भाई हैं।
राजनीति के शीर्ष शिखर और राजभवन के ऊंचे पदों पर रहने के बावजूद, आरिफ मोहम्मद खान का परिवार चकाचौंध से दूर रहकर अपने-अपने रचनात्मक व व्यावसायिक कार्यों में व्यस्त रहता है।
निष्कर्ष
आरिफ मोहम्मद खान का जीवन इस बात का जीवंत उदाहरण है कि राजनीति में रहते हुए भी वैचारिक ईमानदारी और सिद्धांतों को कैसे जिंदा रखा जा सकता है। मंत्री पद को ठुकराने से लेकर राजभवन में बैठकर संवैधानिक मूल्यों की रक्षा करने तक, उन्होंने हमेशा देशहित और सुधारों को प्राथमिकता दी। आज भी वे देश के उन गिने-चुने विचारकों में शामिल हैं, जिनकी बात को हर वर्ग बेहद गंभीरता और सम्मान के साथ सुनता है।

