Justice Yashwant Verma cash scandal: जांच समिति की रिपोर्ट संसद में पेश, तीनों आरोप साबित, सबूतों से छेड़छाड़ का भी जिक्र

Justice Yashwant Verma cash scandal: नई दिल्ली। जस्टिस यशवंत वर्मा कैश कांड में एक बड़ा अपडेट सामने आया है। पूर्व जज के खिलाफ आरोपों की जांच कर रही तीन सदस्यीय न्यायाधीश जांच समिति की विस्तृत रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—में औपचारिक रूप से पेश कर दी गई है। न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत तैयार की गई इस रिपोर्ट को हिंदी और अंग्रेजी, दोनों भाषाओं में सदन के पटल पर रखा गया, साथ ही जांच के दौरान दर्ज मौखिक और दस्तावेजी सबूत भी सदन में प्रस्तुत किए गए।

तीनों आरोप साबित, सबूतों से छेड़छाड़ का जिक्र

समिति ने अपनी अंतिम रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए तीनों आरोपों (आर्टिकल I, II और III) को सही ठहराया है। रिपोर्ट के मुताबिक स्टोररूम में मिले बड़े पैमाने पर 500-500 रुपये के नोटों को लेकर जस्टिस वर्मा की तरफ से दिया गया स्पष्टीकरण उपलब्ध सबूतों के आधार पर संतोषजनक नहीं पाया गया। समिति ने यह भी पाया कि घटनास्थल से जुड़े अहम सबूतों को न तो ठीक से सुरक्षित रखा गया और न ही स्टोररूम को कानूनी तरीके से सील कर उसकी जांच से पहले उसकी मूल स्थिति बरकरार रखी गई, यानी सबूतों से छेड़छाड़ की आशंका जताई गई है। हालांकि रिपोर्ट में यह भी साफ किया गया है कि इस पूरे प्रकरण के पीछे किसी बाहरी साजिश के प्रमाण नहीं मिले, फिर भी समिति ने इसे बेहद गंभीर मामला बताते हुए कहा कि किसी जज के आवास से इतनी बड़ी नकदी मिलना नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

कैसे शुरू हुआ पूरा मामला

14 मार्च 2025 की रात करीब 11:35 बजे दिल्ली में जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम में आग लग गई थी। उस समय वे दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत थे। दिल्ली फायर सर्विस की टीम ने आग पर काबू पाया, लेकिन इस दौरान स्टोररूम से 500-500 रुपये के अधजले नोटों से भरी कई बोरियां बरामद हुईं। जस्टिस वर्मा ने शुरू से ही इन आरोपों को साजिश करार देते हुए दावा किया था कि न तो उनके घर और न ही स्टोररूम में कोई नकदी थी।

जांच की पूरी टाइमलाइन

घटना के बाद दिल्ली हाईकोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय ने 21 मार्च 2025 को आंतरिक जांच शुरू कर सुप्रीम कोर्ट को रिपोर्ट सौंपी और सिफारिश की कि जस्टिस वर्मा को कोई न्यायिक काम न दिया जाए। इसके अगले ही दिन, 22 मार्च 2025 को तत्कालीन CJI संजीव खन्ना ने आरोपों की गहन जांच के लिए तीन सदस्यीय आंतरिक समिति गठित की और कैश बरामदगी से जुड़ा वीडियो सार्वजनिक कर दिया। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस वर्मा का तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट कर दिया। 3-4 मई 2025 को जांच समिति ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी, जिसमें जस्टिस वर्मा पर लगे आरोपों को सही पाया गया। इसके बाद 8 मई 2025 को CJI ने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर महाभियोग प्रस्ताव लाने की सिफारिश की, हालांकि उस समय यह पत्र सार्वजनिक नहीं किया गया था। 19 मई 2025 को जांच पैनल की 64 पन्नों की रिपोर्ट सामने आई, जिसमें कहा गया कि हाईकोर्ट जज और उनके परिवार का स्टोररूम पर सीक्रेट व सक्रिय नियंत्रण था और आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं।

संसद में महाभियोग प्रस्ताव और इस्तीफा

मामला इतना गंभीर हो गया कि लोकसभा के 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए। लोकसभा अध्यक्ष ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम के तहत तीन सदस्यीय समिति बनाकर औपचारिक जांच शुरू करवाई। इस बीच जस्टिस वर्मा ने 5 अप्रैल 2025 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज के तौर पर शपथ ली थी, लेकिन जांच और महाभियोग की आशंका के बीच उन्होंने अंततः 10 अप्रैल 2026 को राष्ट्रपति को अपना इस्तीफा सौंप दिया। उनके इस्तीफे के बाद संसद में चल रही महाभियोग की प्रक्रिया औपचारिक रूप से समाप्त हो गई थी।

सुप्रीम कोर्ट ने खारिज की याचिका

इस्तीफे के बावजूद विवाद पूरी तरह थमा नहीं है। हाल ही में एक याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी थी कि जस्टिस वर्मा के इस्तीफे से कैश से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही खत्म नहीं होनी चाहिए, लेकिन कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और याचिका खारिज कर दी। अब संसद में पेश हुई इस विस्तृत जांच रिपोर्ट के बाद यह देखना अहम होगा कि आगे इस मामले में क्या कार्रवाई होती है, खासकर तब जब जस्टिस वर्मा पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे चुके हैं।

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