बर्लिन। जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मर्ज़ सोमवार को सत्ता बचाने की कोशिश में जुटे नजर आए, जब रविवार को हुए क्षेत्रीय चुनावों में उनकी रूढ़िवादी पार्टी को युद्धोत्तर जर्मनी के इतिहास की सबसे बड़ी क्षेत्रीय हार का सामना करना पड़ा। इस नतीजे के बाद गठबंधन सहयोगियों के बीच मर्ज़ के अलोकप्रिय सुधार एजेंडे को लेकर मतभेद भी सामने आ गए हैं। मर्ज़ ने खुद उत्तर-पूर्वी राज्य मेक्लेनबर्ग-वेस्ट पोमेरानिया में मिली हार को “आपदा” करार दिया। यह पहला मौका है जब उनकी पार्टी किसी राज्य विधानसभा में प्रवेश के लिए जरूरी 5% वोट सीमा भी पार नहीं कर सकी।
AfD की बढ़ती ताकत, बर्लिन में वामपंथ को बढ़त
धुर-दक्षिणपंथी पार्टी ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) इस चुनाव में पहले स्थान पर रही। हालांकि पार्टी बहुमत से काफी दूर रही, लेकिन एक महीने के भीतर यह दूसरी बार है जब AfD ने किसी राज्य चुनाव में शीर्ष स्थान हासिल किया है, जिसे पार्टी राष्ट्रीय सत्ता की ओर बढ़ते कदम के तौर पर देख रही है। इसके साथ ही बर्लिन में हुए एक अन्य चुनाव में भी मर्ज़ की पार्टी को वोटों का नुकसान उठाना पड़ा। यहां पूर्वी जर्मनी पर कभी शासन कर चुकी कम्युनिस्ट पार्टी की उत्तराधिकारी मानी जाने वाली धुर-वामपंथी पार्टी Die Linke सबसे ज्यादा सीटें जीतकर गठबंधन सरकार बनाने की स्थिति में आ गई है।
मर्ज़ की कुर्सी पर फिलहाल कोई सीधा खतरा नहीं
विश्लेषकों के मुताबिक रविवार के नतीजे भले ही तुरंत मर्ज़ की सत्ता को खत्म न करें, लेकिन उनकी गिरती लोकप्रियता, अलोकप्रिय सुधार नीतियां और AfD की बढ़त ने उनके राजनीतिक भविष्य को अनिश्चितता में डाल दिया है। नतीजों के बाद कई रूढ़िवादी राज्य मुख्यमंत्रियों ने रविवार को बैठक कर स्थिति की समीक्षा की, जबकि इससे एक हफ्ते पहले ही उन्होंने एक खुले पत्र में मर्ज़ का समर्थन किया था। बैठक में शामिल एक सदस्य ने रॉयटर्स को बताया कि यह बैठक मर्ज़ के खिलाफ किसी विद्रोह या साजिश के लिए नहीं बल्कि इस बात पर सहमति बनाने के लिए हुई कि पार्टी की मुश्किल स्थिति के बाद चांसलर को बेहतर प्रदर्शन दिखाना होगा। नतीजे आने के कुछ ही मिनटों बाद टेलीविज़न पर दिए बयान में मर्ज़ ने अपने सुधार एजेंडे पर आगे बढ़ने की बात दोहराई। उनका कहना है कि यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले जर्मनी की सुस्त विकास दर को गति देने और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बने रहने के लिए यह जरूरी है।
गठबंधन सहयोगियों की नाराजगी
हालांकि मर्ज़ की केंद्र-वामपंथी गठबंधन सहयोगी सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी (SPD) के नेताओं ने उनके रुख पर सवाल उठाए हैं। मेक्लेनबर्ग-वेस्ट पोमेरानिया की लोकप्रिय मुख्यमंत्री मानुएला श्वेसिग, जो संघीय सरकार के पेंशन सुधारों की पहले भी आलोचना कर चुकी हैं, ने मर्ज़ की टिप्पणियों पर नाराजगी जताई और कहा कि चांसलर को अधिक विनम्रता दिखाने की जरूरत है।
आव्रजक समुदाय में चिंता, “फायरवॉल” नीति पर सवाल
राष्ट्रीय जनमत सर्वेक्षणों में भी बढ़त बनाए हुए AfD को अन्य प्रमुख दलों ने अब तक सत्ता से दूर रखा है, क्योंकि वे पार्टी के साथ गठबंधन करने से इनकार करते रहे हैं—इसे “फायरवॉल” नीति कहा जाता है। लेकिन AfD की मजबूती बढ़ने के साथ इस नीति की समीक्षा को लेकर बहस भी तेज हो रही है। आव्रजन को लेकर पार्टी के सख्त रुख ने जर्मनी में प्रवासी मूल के कई लोगों को अपने भविष्य को लेकर चिंतित कर दिया है।श्वेरिन में एक चुनावी कार्यक्रम में शामिल शिक्षाविद यास्मिन गौदर्जी ने कहा कि AfD का बढ़त में रहना उनके लिए स्वीकार करना मुश्किल है।बर्लिन में Die Linke की जीत को कॉर्पोरेट मकान मालिकों से आवास राष्ट्रीयकरण और किराए पर सीमा लगाने के अभियान की सफलता के तौर पर देखा जा रहा है। पार्टी की प्रमुख उम्मीदवार एलिफ एरल्प ने इस जीत को बर्लिन में बदलाव की शुरुआत बताया।
आर्थिक मुद्दों पर जनता की नाराजगी
पिछले साल आर्थिक सुधारों के वादे पर चुने गए मर्ज़ को मतदाताओं का भरोसा जीतने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा है। पेंशन, कर और स्वास्थ्य सेवा से जुड़े अलोकप्रिय सुधारों को लेकर नाराजगी के साथ-साथ संचार संबंधी चूकों ने भी स्थिति को और बिगाड़ा है। मेक्लेनबर्ग-वेस्ट पोमेरानिया और बर्लिन दोनों जगह चुनाव प्रचार के दौरान बढ़ती ऊर्जा और आवास लागत को लेकर मतदाताओं की नाराजगी साफ झलकी।श्वेसिग, जिन्हें SPD के अगले राष्ट्रीय नेता के तौर पर भी देखा जाता है, अपने राज्य में सत्ता में बने रहने की संभावना है। श्वेरिन के एक स्थानीय निवासी डेटलेफ स्पेल्कर ने चुनाव नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि करीब 100 साल पहले भी जर्मनी महंगाई और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से गुजर चुका है, और अब यह देखना बाकी है कि मौजूदा हालात किस दिशा में जाएंगे।
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