भारतीय खेतों पर यूरोप में प्रतिबंधित कैंसरकारी कीटनाशक और हर्बिसाइड्स बिना किसी सख्त निगरानी के छिड़के जा रहे हैं। ये रसायन न केवल भारतीय कृषि निर्यात को यूरोपीय बाजारों में अस्वीकार करवा रहे हैं, बल्कि आम भारतीयों की थाली तक पहुंचकर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम पैदा कर रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, लंबे समय तक इनके संपर्क में रहने से कैंसर, पार्किंसन रोग, गुर्दे की विफलता और पर्यावरणीय नुकसान बढ़ रहा है।
हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पैराक्वाट, ग्लाइफोसेट, 2,4-डी और डाइमेथोएट जैसे रसायन विदेशों में बैन या सख्ती से नियंत्रित हैं, लेकिन भारत में इनका खुलेआम उपयोग जारी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की कैंसर एजेंसी IARC ने ग्लाइफोसेट को “संभावित कैंसरकारी” (Group 2A) और 2,4-डी को “संभावित कैंसरकारी” (Group 2B) श्रेणी में रखा है। पैराक्वाट तो और भी खतरनाक है – छोटी मात्रा भी घातक हो सकती है, कोई एंटीडोट नहीं है, और यह फेफड़ों, किडनी को नुकसान पहुंचाता है तथा पार्किंसन रोग का खतरा बढ़ाता है।
निर्यात अस्वीकृति और घरेलू खतरा
मई 2024 से मई 2026 के बीच यूरोपीय संघ (EU) के 27 सदस्य देशों ने भारतीय उत्पादों के 365 बैच को कीटनाशकों और भारी धातुओं के कारण अस्वीकार किया। इसमें क्लोरपाइरीफॉस, मोनोक्रोटोफॉस और अन्य प्रतिबंधित पेस्टिसाइड्स शामिल हैं। EU भारत का प्रमुख व्यापारिक भागीदार है, लेकिन भारतीय उत्पादों में इन रसायनों के अवशेष निर्यात को प्रभावित कर रहे हैं। देश में कैंसर पहले से ही एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। ICMR के अनुसार, 2022 में लगभग 14.6 लाख नए कैंसर मामले दर्ज हुए, जो 2025 तक 15.7 लाख तक पहुंचने की आशंका है। हालांकि कैंसर के कई कारण हैं, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि संभावित कैंसरकारी पदार्थों के संपर्क को कम करना जरूरी है।
प्रमुख रसायन और उनके खतरे
पैराक्वाट: 74 से अधिक देशों में प्रतिबंधित, EU ने 2007 में बैन किया। भारत में अभी भी कानूनी। राजस्थान और अन्य राज्यों के किसान संगठन इसके खिलाफ विरोध कर रहे हैं। केरल और तेलंगाना जैसे राज्यों ने कुछ प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर पूर्ण बैन की मांग सुप्रीम कोर्ट में लंबित है।
ग्लाइफोसेट: दुनिया भर में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला हर्बिसाइड। Monsanto (अब Bayer) का राउंडअप उत्पाद विवादास्पद रहा। Bayer ने कैंसर मुकदमों में अरबों डॉलर का निपटारा किया है, लेकिन भारत में कंपनियों के डेटा पर आधारित “सुरक्षित” माना जा रहा है।
2,4-डी: वियतनाम युद्ध के दौरान एजेंट ऑरेंज का प्रमुख घटक। भारत में गेहूं, धान आदि फसलों में व्यापक उपयोग।
एसीफेट और अन्य: मधुमक्खियों और परागणकर्ताओं के लिए हानिकारक, जिससे फसल उत्पादन प्रभावित हो सकता है।
ये रसायन यूरोप और अमेरिका में विकसित हुए, लेकिन विकसित देशों में बैन होने के बाद विकासशील देशों जैसे भारत में बाजार मिल जाता है। EU से बैन पेस्टिसाइड्स का निर्यात LMICs (कम और मध्यम आय वाले देशों) की ओर होता है, जिससे “डबल स्टैंडर्ड” की आलोचना हो रही है।
सरकार की भूमिका और चुनौतियां
कृषि मंत्रालय और नियामक निकाय इन रसायनों को किसानों की जरूरत और फसल सुरक्षा के आधार पर अनुमति देते हैं। उद्योग लॉबी का तर्क है कि बैन से उपज कम होगी और किसानों की लागत बढ़ेगी। लेकिन आलोचक कहते हैं कि कंपनियों और नियामकों के बीच “मिलीभगत” आम जनता के स्वास्थ्य को जोखिम में डाल रही है। भारत ने कुछ पेस्टिसाइड्स पर प्रतिबंध लगाए हैं, लेकिन कई Highly Hazardous Pesticides (HHPs) अभी भी उपयोग में हैं। PAN India जैसी संस्थाएं 27 और पेस्टिसाइड्स के बैन की मांग कर रही हैं। कुछ राज्यों ने स्थानीय स्तर पर कार्रवाई की है, लेकिन राष्ट्रीय नीति में सख्ती की कमी है।
समाधान की दिशा
नियमन: EU की तरह सख्त मानक अपनाएं, आयात सहनशीलता (import tolerance) पर पुनर्विचार करें।
वैकल्पिक: जैविक खेती, एकीकृत कीट प्रबंधन (IPM) और safer विकल्पों को बढ़ावा।
जागरूकता: किसानों को प्रशिक्षण और सुरक्षित विकल्प उपलब्ध कराएं।
स्वास्थ्य निगरानी: अवशेषों की नियमित जांच और कैंसर स्क्रीनिंग। यह मुद्दा केवल निर्यात का नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सेहत का है। क्या भारतीय जीवन विदेशी जीवन से कम मूल्यवान है? नीति-निर्माताओं को इस पर तुरंत विचार करना चाहिए। बिना किसी सख्त कार्रवाई के, “प्लेट पर कैंसर” परोसा जाना जारी रहेगा।

