नोएडा। नोएडा के डूब क्षेत्र में बिजली कनेक्शन की मांग को लेकर चल रहा किसानों और स्थानीय निवासियों का आंदोलन अब पुलिस कार्रवाई के बाद एक नए मोड़ पर पहुंच गया है। सेक्टर-123 के पृथला फ्लाईओवर के पास चल रहे धरने के मामले में सेक्टर-113 थाना पुलिस ने 40 नामजद और 200 अज्ञात लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। यानी पुलिस कार्रवाई की जद में कुल 240 लोगों के नाम सामने आए हैं।
मामले ने इसलिए भी तूल पकड़ लिया है क्योंकि प्रदर्शनकारी लंबे समय से डूब क्षेत्र की कॉलोनियों में बिजली कनेक्शन और नियमित बिजली आपूर्ति की मांग कर रहे हैं। दूसरी तरफ पुलिस और प्रशासन के सामने कानून-व्यवस्था तथा यातायात व्यवस्था बनाए रखने की चुनौती है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या पुलिस की FIR केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखने की कार्रवाई है या फिर इससे आंदोलन कर रहे लोगों की आवाज दबने का संदेश जा रहा है?
21 दिन से जारी है धरना
रिपोर्टों के मुताबिक भारतीय किसान परिषद के अध्यक्ष सुखबीर खलीफा के नेतृत्व में डूब क्षेत्र में बिजली कनेक्शन की मांग को लेकर धरना 6 सितंबर से चल रहा है। 28 सितंबर तक यह आंदोलन 21वें दिन में पहुंच गया था। प्रदर्शनकारियों की मांग है कि डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों को बिजली की नियमित सुविधा उपलब्ध कराई जाए और स्थायी कनेक्शन का रास्ता साफ किया जाए।
इससे पहले आंदोलन के दौरान आमरण अनशन भी शुरू किया गया था। कई प्रदर्शनकारियों की तबीयत बिगड़ने की खबरें भी सामने आईं। 21 सितंबर की रिपोर्ट में पांच महिलाओं के अस्पताल में भर्ती होने की जानकारी सामने आई थी।
आखिर FIR क्यों हुई?
पुलिस की कार्रवाई उस समय हुई जब प्रदर्शन के दौरान मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के घेराव की चेतावनी दिए जाने की बात सामने आई। रिपोर्ट के अनुसार 21 सितंबर को भाषण के दौरान ऐसी चेतावनी दी गई और अगले दिन पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया। एफआईआर सेक्टर-123 पृथला चौकी प्रभारी की शिकायत पर दर्ज हुई।
यहां यह फर्क समझना जरूरी है कि किसी प्रदर्शन पर FIR दर्ज होना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि FIR में नामजद या अज्ञात बताए गए सभी लोग अपराधी हैं। आरोपों की जांच, साक्ष्य और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय होती है।
किसानों का सवाल- बिजली मांगना अपराध कैसे?
आंदोलनकारियों का कहना है कि उनकी मूल मांग बिजली जैसी बुनियादी सुविधा से जुड़ी है। उनका दावा है कि डूब क्षेत्र की बड़ी संख्या में कॉलोनियों में लोग लंबे समय से बिजली की समस्या झेल रहे हैं।
इस मांग को लेकर पहले भी कई बार विद्युत निगम के कार्यालयों पर प्रदर्शन और महापंचायत हो चुकी हैं। फरवरी 2026 में भी किसानों ने बिजली कनेक्शन की मांग को लेकर प्रदर्शन किया था और अधिकारियों की ओर से शासन स्तर पर प्रस्ताव लंबित होने की बात सामने आई थी।
सितंबर में आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने लिखित आश्वासन की मांग की। वहीं प्रशासन और पुलिस का पक्ष कानून-व्यवस्था तथा यातायात प्रभावित होने की परिस्थितियों से जुड़ा है। 13 सितंबर को प्रदर्शन के कारण बड़े स्तर पर ट्रैफिक जाम की रिपोर्ट भी सामने आई थी और पुलिस बल तैनात किया गया था।
बिजली के मुद्दे पर पहले भी हुई है कार्रवाई
यह विवाद केवल धरने तक सीमित नहीं है। अगस्त में विद्युत निगम ने डूब क्षेत्र में कथित अनधिकृत कनेक्शनों और बिजली चोरी के खिलाफ अभियान चलाया था। एक रिपोर्ट के मुताबिक कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में अवैध कनेक्शन काटे गए और बिजली चोरी के आरोप में 31 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया गया।
यानी प्रशासन के सामने दो अलग-अलग पहलू हैं। एक तरफ विद्युत निगम का तर्क है कि अवैध कनेक्शन और बिजली चोरी पर कार्रवाई जरूरी है, जबकि दूसरी तरफ प्रभावित लोग पूछ रहे हैं कि यदि अवैध कनेक्शन हटाए जा रहे हैं तो वैध और नियमित बिजली आपूर्ति का समाधान कब होगा।
सितंबर में 300 से अधिक कनेक्शन दिए जाने की भी रिपोर्ट सामने आई, लेकिन आंदोलन पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
42 कॉलोनियों का मुद्दा भी जुड़ा
आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों की ओर से करीब 42 कॉलोनियों में बिजली की समस्या प्रभावित होने का दावा किया गया। हिन्दुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार प्रदर्शनकारी सरकार और प्रशासन से बिजली आपूर्ति को लेकर लिखित आश्वासन मांग रहे थे।
यही वजह है कि मामला सिर्फ किसानों के एक धरने तक सीमित नहीं माना जा रहा। इसके साथ डूब क्षेत्र में रह रहे बड़ी संख्या में परिवारों की बिजली व्यवस्था का सवाल भी जुड़ा हुआ है।
क्या पुलिस के पास कार्रवाई के अलावा कोई विकल्प नहीं?
यहीं से पुलिस कार्रवाई पर बहस शुरू होती है। कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है। यदि किसी प्रदर्शन के कारण सड़क जाम होती है, सरकारी काम में बाधा आती है, हिंसा या तोड़फोड़ होती है अथवा किसी व्यक्ति की सुरक्षा को खतरा पैदा होता है तो पुलिस कानूनी कार्रवाई कर सकती है।
लेकिन दूसरी तरफ लोकतांत्रिक व्यवस्था में शांतिपूर्ण तरीके से अपनी मांग रखना और प्रशासन के सामने अपनी समस्या रखना भी सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा है। इसलिए असली सवाल यह है कि क्या FIR उन विशिष्ट गतिविधियों के आधार पर हुई है जिनसे कानून-व्यवस्था प्रभावित हुई या फिर आंदोलन में शामिल हर व्यक्ति को व्यापक रूप से आरोपी बना दिया गया?
इसका जवाब पुलिस की FIR में दर्ज धाराओं, आरोपों और जांच से सामने आए साक्ष्यों से ही स्पष्ट होगा।
नोएडा श्रमिक हिंसा मामले की याद क्यों आई?
डूब क्षेत्र के किसानों पर FIR के बाद नोएडा में कुछ महीने पहले हुए श्रमिक आंदोलन की पुलिस कार्रवाई भी चर्चा में आ गई है। अप्रैल 2026 में औद्योगिक क्षेत्र में श्रमिक प्रदर्शन के दौरान हिंसा और आगजनी के मामले दर्ज हुए थे। पुलिस ने बड़ी संख्या में लोगों की गिरफ्तारी की और मामले में चार्जशीट भी दाखिल की।
इसके बाद कुछ आरोपियों और प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने अदालत का रुख किया। इलाहाबाद हाईकोर्ट में आकृति चौधरी की हिरासत से जुड़े मामले में सरकार से साक्ष्य मांगे गए। सितंबर में हाईकोर्ट ने उनके खिलाफ NSA की कार्रवाई रद्द कर दी और रिहाई का आदेश दिया।
इस घटनाक्रम का अर्थ यह नहीं है कि दोनों मामलों के तथ्य समान हैं। लेकिन इससे यह जरूर सामने आता है कि प्रदर्शन और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में पुलिस कार्रवाई की न्यायिक समीक्षा भी महत्वपूर्ण होती है।
अब सबसे बड़ा सवाल- समाधान कब?
डूब क्षेत्र के आंदोलन में FIR के बाद विवाद और गहरा सकता है। प्रदर्शनकारियों के सामने अब एक तरफ बिजली कनेक्शन का सवाल है और दूसरी तरफ मुकदमे का।
प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह एक साथ दो मोर्चों पर समाधान निकाले—पहला, डूब क्षेत्र में बिजली व्यवस्था को लेकर कानूनी और प्रशासनिक स्थिति स्पष्ट करे और दूसरा, आंदोलन के दौरान कानून-व्यवस्था तथा यातायात को प्रभावित होने से रोके।
यदि बिजली कनेक्शन की मांग नियमों के तहत पूरी नहीं की जा सकती तो प्रशासन को उसका स्पष्ट कारण और वैकल्पिक व्यवस्था बतानी होगी। वहीं यदि किसी क्षेत्र में वैध कनेक्शन देने की प्रक्रिया संभव है तो उसकी समयसीमा और शर्तें सार्वजनिक करना विवाद कम करने का रास्ता हो सकता है।
फिलहाल 240 लोगों के खिलाफ दर्ज FIR ने बिजली कनेक्शन के मूल मुद्दे को एक नए कानूनी विवाद में बदल दिया है। अब निगाह पुलिस जांच, प्रशासन की अगली कार्रवाई और किसानों के साथ होने वाली बातचीत पर है। यह भी महत्वपूर्ण होगा कि जांच में नामजद और अज्ञात लोगों के खिलाफ लगाए गए आरोपों के समर्थन में क्या साक्ष्य सामने आते हैं।

