लखनऊ। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने संगठन में बड़ा बदलाव करते हुए पूर्व राज्यसभा सांसद एवं चार राज्यों के प्रभारी अशोक सिद्धार्थ तथा पार्टी के संयोजक रणधीर सिंह बेनीवाल को पार्टी से निष्कासित कर दिया है। इस फैसले के बाद बसपा के अंदरूनी समीकरणों को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं।
बसपा सुप्रीमो मायावती ने स्पष्ट किया है कि संगठनात्मक अनुशासन सर्वोपरि है और पार्टी के निर्देशों का उल्लंघन किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कर्नाटक, ओडिशा और पश्चिम बंगाल से संगठनात्मक निर्देशों की अनदेखी और अनुशासनहीनता की लगातार शिकायतें मिल रही थीं। इन्हीं शिकायतों के आधार पर पहले अशोक सिद्धार्थ से उनकी जिम्मेदारियां वापस ली गई थीं।
मायावती के अनुसार, जिम्मेदारियां हटाए जाने के बावजूद अशोक सिद्धार्थ द्वारा उत्तर प्रदेश लौटने और संगठन में सक्रिय भूमिका निभाने संबंधी खबरें फैलाकर कार्यकर्ताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा की गई। इसे गंभीर अनुशासनहीनता मानते हुए उन्हें पार्टी से निष्कासित करने का निर्णय लिया गया। इसी प्रकार पार्टी के संयोजक रणधीर सिंह बेनीवाल को भी निर्देशों का पालन न करने और अनुशासनहीनता के आरोपों के चलते बाहर का रास्ता दिखाया गया है।
आकाश आनंद को लेकर भी बढ़ी चर्चाएं
इस घटनाक्रम के बीच बसपा में आकाश आनंद की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा है कि आगामी विधानसभा चुनाव को देखते हुए पार्टी युवाओं और विशेष रूप से नई पीढ़ी के मतदाताओं तक पहुंच बनाने के लिए आकाश आनंद को बड़ी जिम्मेदारी दे सकती है। हालांकि, पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है।
उल्लेखनीय है कि अशोक सिद्धार्थ, आकाश आनंद के ससुर हैं। इससे पहले भी मायावती द्वारा अशोक सिद्धार्थ पर नाराजगी जताए जाने के दौरान आकाश आनंद को लेकर भी संगठनात्मक फैसले चर्चा में रहे थे। ऐसे में ताजा कार्रवाई को बसपा के भीतर अनुशासन मजबूत करने और संगठन को चुनावी रणनीति के अनुरूप पुनर्गठित करने के कदम के रूप में देखा जा रहा है।
चुनावी तैयारियों में जुटी बसपा
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए बसपा संगठन को मजबूत करने और बूथ स्तर तक सक्रियता बढ़ाने में जुटी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि हालिया संगठनात्मक कार्रवाई का उद्देश्य पार्टी में अनुशासन बनाए रखना और चुनाव से पहले नेतृत्व के संदेश को स्पष्ट करना है। आने वाले दिनों में बसपा की चुनावी रणनीति और संगठनात्मक बदलावों पर सभी की नजर रहेगी।

