सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा कि सेवा के दौरान दृष्टिहीन हुए एक जवान को वैकल्पिक पद पर समायोजित करने के बजाय चिकित्सकीय रूप से अयोग्य घोषित कर सेवा से हटाना कानून और संवैधानिक दायित्वों के विपरीत था। शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार की अपील खारिज करते हुए पूर्व सीआरपीएफ कांस्टेबल को 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया।
केंद्र सरकार की अपील खारिज
न्यायमूर्ति दीपंकर दत्ता और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के फैसले को बरकरार रखते हुए केंद्र सरकार की अपील खारिज कर दी। हालांकि, अदालत ने बहाली के आदेश में संशोधन किया क्योंकि संबंधित कांस्टेबल अब सेवानिवृत्ति की आयु पार कर चुके हैं। इसके स्थान पर अदालत ने बकाया वेतन, ब्याज और अन्य लाभों सहित कुल 1.25 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया।
सीआरपीएफ ने नहीं निभाई आदर्श नियोक्ता की जिम्मेदारी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि सीआरपीएफ एक आदर्श नियोक्ता के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रही। अदालत ने कहा कि यदि कोई कर्मचारी सेवा के दौरान दिव्यांग हो जाता है तो उसे नौकरी से हटाने के बजाय समान वेतन और सेवा लाभ वाले किसी अन्य पद पर समायोजित किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि उपयुक्त पद उपलब्ध न हो तो नियोक्ता को सुपरन्यूमेरी (अतिरिक्त) पद सृजित कर कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना चाहिए। यह दिव्यांगजन (समान अवसर, अधिकारों का संरक्षण और पूर्ण भागीदारी) अधिनियम, 1995 की धारा 47 के तहत अनिवार्य दायित्व है।
2002 की अधिसूचना का नहीं मिला लाभ
सुनवाई के दौरान सीआरपीएफ ने वर्ष 2002 की एक अधिसूचना का हवाला दिया, जिसके तहत लड़ाकू कर्मियों को धारा 47 के दायरे से छूट दी गई थी। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संबंधित कर्मचारी को 11 मार्च 1998 को सेवा से हटाया गया था, जबकि यह अधिसूचना चार वर्ष बाद जारी हुई थी। अदालत ने स्पष्ट किया कि कोई भी प्रत्यायोजित कानून (Delegated Legislation) पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता। इसलिए 2002 की अधिसूचना का लाभ इस मामले में नहीं दिया जा सकता।
क्या था पूरा मामला?
पूर्व सीआरपीएफ कांस्टेबल वर्ष 1985 से ड्राइवर के पद पर कार्यरत थे। वर्ष 1996 में उन्हें गंभीर नेत्र रोग हो गया, जिससे उनकी बाईं आंख की रोशनी पूरी तरह चली गई और दाहिनी आंख की दृष्टि भी कमजोर हो गई। सीआरपीएफ मेडिकल बोर्ड ने उन्हें स्थायी रूप से सेवा के लिए अयोग्य घोषित कर दिया और 11 मार्च 1998 को नौकरी से हटा दिया।
जवान ने सेवा लाभ और वित्तीय अधिकारों की मांग करते हुए कानूनी लड़ाई शुरू की। हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने उनके पक्ष में फैसला सुनाया, जिसके खिलाफ केंद्र सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराते हुए जवान को राहत प्रदान की है।
दिव्यांग कर्मचारियों के अधिकारों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि दिव्यांगजन अधिनियम की धारा 47 केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि दिव्यांग कर्मचारियों के सम्मानजनक रोजगार और उचित समायोजन के अधिकार की गारंटी है। सरकारी संस्थानों को इस प्रावधान का कड़ाई से पालन करना चाहिए।

