‘न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला, लिंचिंग केस में सजा सुनाने वाली महिला जज को धमकियों के बाद सुरक्षा मुहैया कराई गई

मध्य प्रदेश की अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश तबस्सुम खान, जिन्होंने 2022 के एक क्रूर मॉब लिंचिंग मामले में सात आरोपियों को उम्रकैद की सजा सुनाई थी, को सोशल मीडिया पर सांप्रदायिक गालियां, जान से मारने की धमकियां और लक्षित अभियान का सामना करना पड़ रहा है। इस गंभीर घटना पर संज्ञान लेते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इसे “न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक अधिकारियों के निडर कामकाज में सीधा हस्तक्षेप” करार दिया है। कोर्ट ने जज को सुरक्षा प्रदान करने के निर्देश दिए और पुलिस से दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की रिपोर्ट मांगी।

घटना का विवरण

12 जून 2026 को नर्मदापुरम (पूर्व में होशंगाबाद) जिले की अदालत में जज तबस्सुम खान ने 2022 के सिवनी मालवा लिंचिंग मामले में सात आरोपियों को दोषी करार दिया। पीड़ित ट्रक ड्राइवर शेख लाला नजीर अहमद (नजीर अहमद) को अगस्त 2022 में गौ-तस्करी के शक में भीड़ ने बुरी तरह पीटा था, जिससे उनकी मौत हो गई। अदालत ने पाया कि आरोपियों ने “अत्यधिक क्रूरता” से हमला किया और मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने आरोप साबित कर दिए। कुछ रिपोर्ट्स में कुल 14 दोषियों का जिक्र है, जो संबंधित फैसलों में शामिल हो सकते हैं। सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद अदालत परिसर में दोषियों के परिजनों ने हंगामा किया। पुलिस वाहन को रोका गया और जज के खिलाफ सोशल मीडिया पर तेजी से अभियान चलाया गया। इसमें सांप्रदायिक गालियां, “एंटी-हिंदू” जैसे आरोप और मौत की धमकियां शामिल थीं। एक टीवी एडिटर ने फैसले को “न्यायिक लिंचिंग” बताया और दोषियों के परिवारों के साथ खड़ा हुआ। जज की प्रतिमा जलाने जैसी घटनाएं भी सामने आईं।

हाईकोर्ट का आदेश

मामले की खबरों पर स्वतः संज्ञान लेते हुए जस्टिस विवेक अग्रवाल और जस्टिस अवनिंद्र कुमार सिंह की बेंच ने कहा, “हमारे न्यायिक अधिकारी को केवल इसलिए धमकियां नहीं दी जा सकतीं क्योंकि उन्होंने कोई फैसला दिया जो समाज के एक खास वर्ग को पसंद नहीं आया।” कोर्ट ने इसे न्यायिक स्वतंत्रता पर हमला बताया और निर्देश दिया कि, पुलिस महानिदेशक (DGP) और गृह विभाग के अतिरिक्त मुख्य सचिव/प्रधान सचिव को दोषियों को पकड़ने के लिए उठाए गए कदमों पर रिपोर्ट पेश करनी होगी। जज तबस्सुम खान को पर्याप्त पुलिस सुरक्षा दी जाए। नर्मदापुरम के पुलिस अधीक्षक को उन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जानकारी देनी होगी जिन्होंने “न्यायिक अधिकारी के लिए खतरे का माहौल” बनाया। पुलिस ने पहले ही अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ FIR दर्ज कर ली है और जज की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। सोशल मीडिया मॉनिटरिंग जारी है।

व्यापक प्रतिक्रियाएं

सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन (SCAORA) ने धमकियों की निंदा की और न्यायपालिका की रक्षा की मांग की। कानून विशेषज्ञों का कहना है कि यह घटना न केवल एक जज की सुरक्षा बल्कि पूरे न्याय तंत्र की गरिमा और निडरता पर सवाल उठाती है। लिव लॉ जैसी संस्थाओं ने इसे “कर्तव्य निभाने वाली जज” की कहानी बताया।

पृष्ठभूमि

2022 की घटना में नजीर अहमद और शेख मुश्ताक मवेशी ले जा रहे थे जब भीड़ ने उन्हें रोका। मामले में हत्या, दंगा और अन्य धाराओं के तहत मुकदमा चला। अदालत ने फांसी की सजा देने से इनकार करते हुए कहा कि यह “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” मामलों में ही दी जाती है। यह मामला गौ-विजिलैंटिज्म और मॉब लिंचिंग की पुरानी समस्या को फिर रेखांकित करता है, जहां न्यायाधीशों को फैसले के बाद व्यक्तिगत हमलों का सामना करना पड़ता है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में उच्च न्यायालयों और सरकार को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए ताकि न्यायिक अधिकारी बिना भय के काम कर सकें। मध्य प्रदेश पुलिस ने जांच तेज कर दी है और सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ाई गई है। आगे की सुनवाई में हाईकोर्ट स्थिति रिपोर्ट पर विचार करेगा। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

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