‘ऑपरेशन टाइगर’ सफल: शिवसेना (UBT) में बड़ी टूट, 6 सांसदों ने थामा शिंदे का दामन, संजय राउत बोले, “गद्दार और बेईमान”

महाराष्ट्र की राजनीति में बीते कुछ दिनों से चल रहा सस्पेंस सोमवार को खत्म हो गया। शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) यानी UBT को अपने अस्तित्व की लड़ाई में एक बड़ा झटका लगा है। पार्टी के लोकसभा में मौजूद कुल 9 सांसदों में से 6 सांसदों ने सोमवार को एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में विलय कर लिया, जिसे राजनीतिक गलियारों में महीनों से चली आ रही गुप्त रणनीति ‘ऑपरेशन टाइगर’ का अंतिम और निर्णायक चरण माना जा रहा है।

किसने छोड़ा साथ?

बागी होने वाले 6 सांसदों में संजय दीना पाटिल, संजय देशमुख, संजय जाधव, भाऊसाहेब वाकचौरे, नागेश पाटिल-अष्टीकर और ओमप्रकाश राजे निंबालकर, शामिल हैं। इन सभी ने गोरेगांव स्थित नेस्को सेंटर में शिंदे गुट की शिवसेना के 60वें स्थापना दिवस समारोह के मंच पर औपचारिक रूप से सदस्यता ग्रहण की, समारोह की टाइमिंग को लेकर माना जा रहा है कि यह संयोग नहीं बल्कि सुनियोजित रणनीति का हिस्सा था। बागी सांसदों ने पहले ही दिल्ली में एकनाथ शिंदे और उनके बेटे श्रीकांत शिंदे से मुलाकात की थी और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र सौंपकर सदन में अलग गुट के रूप में मान्यता और बैठने की जगह बदलने का अनुरोध किया था, स्पीकर ओम बिरला ने इनके स्वतंत्र समूह को मान्यता दे दी है, जिससे इन सांसदों की संसदीय सदस्यता दलबदल कानून के दायरे से तकनीकी रूप से सुरक्षित मानी जा रही है।

दो-तिहाई का गणित और संख्या-बल की लड़ाई

संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दलबदल विरोधी कानून के तहत किसी दल के सांसदों की अयोग्यता से बचने के लिए कुल सदस्यों के दो-तिहाई हिस्से का एक साथ अलग होना जरूरी होता है। लोकसभा में उद्धव ठाकरे गुट के पास कुल 9 सांसद थे, इसलिए 6 सांसदों के एक साथ टूटने से उनकी सदस्यता तकनीकी रूप से सुरक्षित रह गई है। इस बड़ी टूट के बाद अब उद्धव ठाकरे के पाले में केवल 3 वफादार सांसद बचे हैं। अरविंद सावंत, अनिल देसाई और राजाभाऊ वाजे।

कैसे शुरू हुआ पूरा विवाद

घटनाक्रम की शुरुआत 18 जून को दिल्ली में बुलाई गई शिवसेना (UBT) की संसदीय दल की बैठक से हुई, जिसमें पार्टी व्हिप के बावजूद 9 में से 6 सांसद नदारद रहेसभी 6 अनुपस्थित सांसदों को कारण बताओ नोटिस जारी कर लोकसभा से उनकी अयोग्यता की औपचारिक प्रक्रिया शुरू कर दी। लेकिन सूत्रों के अनुसार बागी सांसदों के करीबी हलकों का कहना है कि दलबदल कानून के तहत उनके पास पहले से ही दो-तिहाई का स्पष्ट बहुमत होने के कारण इन नोटिसों या सदस्यता रद्द करने की धमकियों का उन पर कोई कानूनी असर नहीं होगा।

संजय राउत का आक्रामक रुख — “गद्दार, बेईमान, धोखेबाज”

बैठक से सांसदों के नदारद रहने के बाद शिवसेना (UBT) के मुख्य प्रवक्ता और राज्यसभा सांसद संजय राउत बेहद आक्रामक नजर आए। मीडिया से बातचीत में उन्होंने बागी सांसदों को गद्दार, बेईमान और धोखेबाज करार दिया और आरोप लगाया कि इन सांसदों ने पार्टी के साथ धोखा किया है।  राउत ने यह भी दावा किया कि बागी सांसदों को अतिरिक्त 10 करोड़ रुपये दिए गए और उन्हें राजस्थान में सुरक्षित जगह ले जाया गया, और कहा कि अगर इनमें जरा भी नैतिकता बची है तो उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए। राउत यहीं नहीं रुके एक तीखे सोशल मीडिया पोस्ट में उन्होंने सीधे तौर पर बागियों की ओर इशारा करते हुए “कुछ लोग कुत्ते तो होते हैं, लेकिन वफादार नहीं होते” लिखा और कैप्शन में सिर्फ “जय महाराष्ट्र!” जोड़ा। उन्होंने यह भी कहा कि खुद को शिवसैनिक कहने वाले ये लोग असल में डरपोक हैं जो जयपुर के होटलों में जाकर छिप गए।

संजय राउत के भाजपा में जाने की अफवाह: सच क्या है?

इस उथल-पुथल के बीच सोशल मीडिया पर एक और खबर तेज़ी से फैली कि संजय राउत खुद भाजपा में शामिल होने वाले हैं। दरअसल, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राउत ने तंज भरे लहजे में कहा था कि अगर कोई उन्हें पीएम मोदी के विकास का एक मुद्दा समझा दे तो वे भी भाजपा में चले जाएंगे। इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी को सोशल मीडिया पर तोड़-मोड़कर पेश किया गया, जिससे यह भ्रामक खबर फैली कि राउत भाजपा में शामिल हो रहे हैं। वास्तव में राउत उद्धव ठाकरे के साथ पहले से ज्यादा मजबूती से डटे हुए हैं और बागियों के खिलाफ कानूनी लड़ाई का नेतृत्व कर रहे हैं।

उद्धव ठाकरे और भाजपा-शिंदे खेमे की प्रतिक्रिया

उद्धव ठाकरे ने इस टूट को ‘भाजपा का पाप’ करार दिया है और कहा है कि जो जाना चाहते थे वे चले गए, अब उन्हें जनता की अदालत में जवाब देना होगा। दूसरी ओर, उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तंज कसते हुए ‘ऑपरेशन’ के सफल होने की पुष्टि करते हुए कहा था कि ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और स्वास्थ्य बहुत अच्छा है। केंद्रीय मंत्री प्रतापराव जाधव ने भी संजय राउत की बयानबाजी को पार्टी के पतन की वजह बताया था।

आगे क्या? — “पिक्चर अभी बाकी है”

सांसदों की बगावत के बाद अब निशाना विधायकों और स्थानीय निकायों की ओर शिफ्ट हो गया है। शिंदे खेमे ने दावा किया है कि उद्धव गुट के 16 विधायक भी अब उनके सीधे संपर्क में हैं, जिससे उद्धव ठाकरे के सामने अपने अस्तित्व को बचाने की बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है, साथ ही मुंबई के पार्षदों पर भी संकट के संकेत मिल रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2022 की बगावत के बाद यह शिवसेना (UBT) के लिए अब तक का सबसे बड़ा संगठनात्मक झटका है, और आने वाले दिनों में और हलचल देखने को मिल सकती है।

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