अग्निपरीक्षा में भारत: एल निनो की आग में झुलसती फ़सलें, बेहाल मज़दूर और मंडराता खाद्य संकट

जलवायु संकट की सबसे बड़ी चुनौती, आज़ाद भारत के करोड़ों श्रमिकों पर भारी

प्रशांत महासागर की गर्म लहरों ने इस वर्ष भारत के सामने एक ऐसा संकट खड़ा कर दिया है जिसकी आँच खेतों से लेकर निर्माण स्थलों तक, और मंडियों से लेकर आम आदमी की थाली तक महसूस की जा रही है। अमेरिकी मौसम एजेंसी NOAA ने 11 जून 2026 को आधिकारिक रूप से घोषणा की कि एल निनो की शुरुआत हो चुकी है और यह एक ‘सुपर’ घटना बन सकती है। इसी के साथ भारत के लिए मुसीबतों का एक नया दौर शुरू हो गया है।

मानसून देर से आया, संकट जल्दी

दक्षिण-पश्चिम मानसून 2026 केरल में 4 जून को पहुँचा सामान्य तिथि से तीन दिन और IMD की पूर्वानुमानित तिथि से नौ दिन बाद। और यह महज़ देरी नहीं, बल्कि एक बड़े संकट की आहट है। IMD ने दीर्घावधि औसत के मुकाबले मात्र 90 प्रतिशत वर्षा का पूर्वानुमान लगाया है, और 60 प्रतिशत संभावना जताई है कि मानसून सीज़न कमज़ोर या अपर्याप्त रहेगा। वैज्ञानिकों का कहना है कि NOAA के अनुमान के अनुसार 2026 का एल निनो बेहद तीव्र हो सकता है और यह उत्तरी गोलार्ध की 2026-27 की सर्दियों तक बना रह सकता है।

झुलसता भारत: अप्रैल में ही टूट गए रिकॉर्ड

इस वर्ष गर्मी का प्रकोप इतना भयावह रहा कि अप्रैल के अंत में एक ही दिन दुनिया के शीर्ष 50 सबसे गर्म शहरों में से सभी भारत में थे। महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र के अकोला में 26 अप्रैल को देश का सर्वोच्च तापमान 46.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया। किसान बाहर काम नहीं कर पा रहे, पशु गर्मी के तनाव में हैं और फ़सलें नष्ट हो रही हैं संयुक्त राष्ट्र ने चेतावनी दी है कि लू की लहरें खाद्य आपूर्ति को “कगार पर” धकेल रही हैं। कुछ जलवायु शोधकर्ताओं ने चेताया है कि यदि एक मज़बूत या ‘सुपर’ एल निनो विकसित होता है, तो 2026 वैश्विक स्तर पर अब तक के सबसे गर्म वर्षों में से एक बन सकता है।

फ़सलें संकट में, 200 जिले अलर्ट पर

केंद्र सरकार ने 150 से 200 कमज़ोर ज़िलों को प्राथमिकता सूची में डाला है और ज़िला-स्तरीय आकस्मिक योजनाओं में बदलाव की तेज़ी से प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन योजनाओं में फ़सल विकल्प, सिंचाई रणनीति और आयात के उपाय शामिल हैं। भारत में जनवरी-फरवरी 2026 में 60 प्रतिशत से कम वर्षा हुई और IMD ने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, बिहार और ओडिशा में लू के अलर्ट जारी किए। जलाशयों की स्थिति भी चिंताजनक है। मई की एक रिपोर्ट में देश के जलाशयों की कुल भंडारण क्षमता का केवल 34.45 प्रतिशत पानी शेष था, और केवल दो सप्ताह में करीब 8 अरब घन मीटर पानी घट गया। दलहन और तिलहन की फ़सलों पर खतरा सबसे गंभीर है। इन फ़सलों पर संकट का समय विशेष रूप से नुकसानदेह है क्योंकि ये भारत की आयात निर्भरता घटाने की मिशनों के लिए अहम हैं। इसके अलावा चावल भी गर्मी के तनाव में कीट और बीमारियों की चपेट में आ रहा है।

38 करोड़ मज़दूर — असुरक्षित, बेसहारा, इस गर्मी की मार सबसे भारी है देश के करोड़ों मेहनतकश मज़दूरों पर

भारत के तीन-चौथाई कार्यबल यानी लगभग 38 करोड़ लोग कृषि और निर्माण जैसे गर्मी-उजागर क्षेत्रों में काम करते हैं। इनमें से 90 प्रतिशत तक अनौपचारिक रोज़गार में हैं, जहाँ कोई अनुबंध नहीं, कोई अनिवार्य विश्राम अवकाश नहीं और कोई नियोक्ता दायित्व नहीं। एक श्वेतपत्र के अनुसार, “अहमदाबाद में 45 डिग्री की गर्मी में काम करने वाला एक निर्माण श्रमिक आय खोता है, चोट का जोखिम उठाता है, रात को खराब हवादार घर लौटता है जो ठंडा नहीं होता, और उसके पास कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं है। यह एक साथ श्रम, आवास, स्वास्थ्य और वित्त की समस्या है।” IMD के अप्रैल-जून 2026 के पूर्वानुमान में ‘बाहरी श्रमिकों’ को बुज़ुर्गों और बच्चों के साथ एक संवेदनशील वर्ग के रूप में नामित किया गया और चेताया गया कि बढ़ते तापमान से ‘गर्मी से संबंधित बीमारियाँ’ होंगी। लेकिन यह पहचान अभी तक नीति और कानून में नहीं बदली है। जब एक डिलीवरी कर्मचारी को वर्षों की गर्मी में काम करने से किडनी की बीमारी हो जाती है, तो कोई नियामक ढाँचा जिम्मेदारी तय नहीं करता।

मौतें: आँकड़ों से कहीं बड़ी तस्वीर

एक अध्ययन के अनुसार, अत्यधिक गर्मी के एक दिन में ही भारत में लगभग 3,400 अधिक मौतें होती हैं। पाँच दिन की लू में यह संख्या लगभग 30,000 तक पहुँच जाती है। अकेले उत्तर प्रदेश में 8,100 से ज़्यादा मौतें होती हैं। ये संख्याएँ सरकारी आँकड़ों से कहीं अधिक हैं। इस गर्मी में जनगणना कर्मचारियों की मौतें हुईं, पश्चिम बंगाल के हालिया चुनाव में मतदान के लिए निकले लोगों की भी जान गई। एक व्यक्ति जो बस में शादी में जाने के लिए बैठा था, अपनी मंज़िल पर पहुँचने से पहले ही चल बसा।

खाद्य महँगाई की नई मार

ICRA के अनुमान के अनुसार, यदि मानसून कमज़ोर रहा तो FY27 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित महँगाई 4.5 से 5 प्रतिशत तक पहुँच सकती है। केवल खाद्य महँगाई में 0.4 प्रतिशत तक की वृद्धि हो सकती है। FAO और विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक संयुक्त रिपोर्ट में कहा गया है कि अत्यधिक गर्मी फ़सलों को नष्ट कर रही है, पशुधन को तनाव में डाल रही है और मत्स्य पालन को सूखा रही है, जिससे दुनियाभर में 1.23 अरब लोगों की आजीविका खतरे में है।

सरकार की तैयारी — पर क्या यह पर्याप्त है?

IMD ने जून 2026 के ENSO बुलेटिन में पुष्टि की है कि भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में एल निनो की परिस्थितियाँ बन चुकी हैं और मानसून सीज़न के दौरान ये और मज़बूत होने की आशा है। सरकार ने जो कार्यबल गठित किया है उसमें 14-15 सदस्य हैं। इसमें इस बात का भी संज्ञान लिया जा रहा है कि नुकसान सिर्फ इस खरीफ सीज़न तक नहीं रुकेगा। एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, “लगातार वर्षा की कमी रबी सीज़न तक जारी रह सकती है और अगले वर्ष तक भी बनी रह सकती है।”

विशेषज्ञों की चेतावनी

केवल 8 प्रतिशत भारतीय घरों में एयर कंडीशनिंग है। जो लोग वातानुकूलित घरों, कारों, दफ़्तरों और मॉल में रह सकते हैं, वे संकट के सबसे बुरे प्रभावों से बच सकते हैं। लेकिन बाकी सब के लिए यह जीवन-मरण का सवाल है। एक विशेषज्ञ के अनुसार 2022 की लू ने गेहूँ उत्पादन में लगभग 10 प्रतिशत की कमी की थी और भारत को गेहूँ निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा था। यदि अनुकूलन उपायों में देरी हुई तो घटती उत्पादकता खाद्य महँगाई को और बढ़ा सकती है। यह संकट महज़ एक मौसमी आपदा नहीं है, यह भारत की खाद्य सुरक्षा, करोड़ों श्रमिकों की आजीविका और अर्थव्यवस्था की नींव पर एक साथ आया तूफ़ान है। जब तक नीति-निर्माता इस चुनौती को सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय एकीकृत नज़रिए से नहीं देखेंगे, झुलसते भारत की यह तस्वीर हर साल और गहरी होती रहेगी।

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