मथुरा पाइल-अप में 19 मौतें, DNA से होगी जले शवों की पहचान; कोहरा, ओवरस्पीडिंग और नींद बने सबसे बड़े कातिल
उत्तर प्रदेश का यमुना एक्सप्रेसवे जो एक समय आधुनिकता और गति का प्रतीक माना जाता था आज मौत के राजमार्ग के रूप में पहचाना जाने लगा है। नोएडा को आगरा से जोड़ने वाला यह 165 किलोमीटर लंबा मार्ग लगातार भीषण सड़क दुर्घटनाओं का गवाह बन रहा है। ताजा आंकड़े और हालिया हादसे मिलकर एक ऐसी तस्वीर पेश करते हैं जो न केवल चौंकाती है, बल्कि सड़क सुरक्षा के प्रति प्रशासन की उदासीनता पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
मथुरा का वह काला मंगलवार — 19 लाशें, जली पहचान
दिसंबर 2025 में मथुरा के निकट यमुना एक्सप्रेसवे पर हुई भीषण दुर्घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया। आठ बसों और दो छोटे वाहनों की टक्कर के बाद भड़की आग में मरने वालों की संख्या बढ़कर 19 तक जा पहुंची। हादसे की भयावहता का अंदाज़ा इसी से लगाया जा सकता है कि भीषण आग के कारण कई शव बुरी तरह जल गए, जिससे उनकी पहचान करना मुश्किल हो गया — अब तक केवल चार मृतकों की पहचान हो सकी है, जबकि अन्य 15 शवों की शिनाख्त के लिए डीएनए सैंपल लिए गए हैं। जिलाधिकारी चंद्र प्रकाश सिंह ने बताया कि जो तीन पीड़ितों के रिश्तेदार अभी भी प्रतीक्षा में हैं, फॉरेंसिक रिपोर्ट आने के बाद ही उनसे मिलान कर शवों की पहचान की जा सकेगी। इस हादसे में करीब 90 लोग घायल हुए थे, जिनमें से अधिकांश को प्रारंभिक उपचार के बाद छुट्टी दे दी गई और केवल छह लोग अस्पताल में भर्ती रहे।
14 साल का खौफनाक हिसाब, रोज़ औसतन दो हादसे
आरटीआई से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2012 से 2025 के बीच यमुना एक्सप्रेसवे पर कुल 8,812 दुर्घटनाएं दर्ज हुई हैं — यानी देश के सबसे आधुनिक माने जाने वाले इस एक्सप्रेसवे पर रोज़ाना औसतन दो हादसे। वर्ष 2017 में 763 हादसों में 146 मौतें, 2018 में 659 हादसों में 111 मौतें, 2019 में 560 हादसों में 195 मौतें, 2020 में 509 हादसों में 122 मौतें, 2021 में 424 हादसों में 136 मौतें, 2022 में 303 हादसों में 106 मौतें, 2023 में 411 हादसों में 95 मौतें और 2024 में 528 हादसों में 112 मौतें दर्ज की गईं। लेकिन सबसे चिंताजनक बात यह है कि वर्ष 2025 में अब तक इस एक्सप्रेसवे पर 1,198 सड़क हादसे हो चुके हैं, जिनमें 113 लोगों की मौत हो चुकी है और 562 लोग घायल हुए हैं।
नींद, रफ्तार और लापरवाही — तीन सबसे बड़े कातिल
आरटीआई में यह भी खुलासा हुआ कि कुल दुर्घटनाओं में से नींद और झपकी आने से 3,700, ओवरस्पीडिंग से 1,319 और टायर फटने से 853 हादसे हुए हैं। सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता के.सी. जैन ने बताया कि अधिकांश दुर्घटनाएं सड़क की खराबी से नहीं, बल्कि चालक की गलती से हो रही हैं कुल दुर्घटनाओं में लगभग 42 प्रतिशत मामलों में चालक के सो जाने या झपकी आने को मुख्य कारण पाया गया।यमुना एक्सप्रेसवे पर वाहनों की अधिकतम गति सीमा 75 किलोमीटर प्रति घंटा निर्धारित है और दो वाहनों के बीच 70 मीटर की दूरी रखना अनिवार्य है लेकिन अधिकांश चालक इन नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। खासकर सर्दियों में कोहरे के दौरान दृश्यता शून्य तक पहुंच जाती है जिससे टक्कर और पलटने की घटनाएं और भी बढ़ जाती हैं।
रोज़ 30 हज़ार वाहन, बढ़ता दबाव
यमुना एक्सप्रेसवे से रोज़ाना करीब 30 हज़ार वाहन गुजरते हैं। भारी वाहनों और तेज रफ्तार कारों की संख्या अधिक होने के कारण जोखिम और बढ़ जाता है। विशेषज्ञों का मानना है कि नोएडा इंटरनेशनल एयरपोर्ट जेवर के शुरू होने के बाद यातायात का यह दबाव और अधिक बढ़ेगा, जिससे अगर ठोस उपाय नहीं किए गए तो हादसों की संख्या में और वृद्धि अवश्यंभावी है।
जांच के आदेश और सरकारी वादे
मथुरा के भीषण पाइल-अप के बाद राज्य सरकार ने भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए सख्त निर्देश जारी किए हैं। नए नियमों के तहत अब वाहनों को काफिले (कॉन्वॉय) में चलाया जाएगा, कम दृश्यता होने पर ट्रैफिक को पूरी तरह रोकने और पूरे एक्सप्रेसवे पर सीसीटीवी कैमरे लगाने के आदेश दिए गए हैं। अपर जिलाधिकारी (प्रशासन) अमरेश मौर्य की देखरेख में पूरी घटना की विस्तृत जांच के आदेश भी जारी किए गए हैं।
सुरक्षा के नाम पर मामूली कदम
सुरक्षा के लिए उठाए जा रहे कदमों के तहत यमुना एक्सप्रेसवे टोल प्रशासन के अनुसार रात के समय भारी वाहन चालकों को मुफ्त में चाय पिलाई जा रही है और सुरक्षित सफर के लिए पर्चे बांटे जा रहे हैं। हल्के वाहनों की गति सीमा 75 किमी प्रति घंटा और भारी वाहनों की 60 किमी प्रति घंटा तय की गई है तथा बड़े वाहनों पर रिफ्लेक्टर टेप लगाए जा रहे हैं। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या मुफ्त चाय और पर्चे बांटने से उन हादसों पर लगाम लगाई जा सकती है जिनमें सैकड़ों निर्दोष जानें जा चुकी हैं? जानकारों का कहना है कि एक्सप्रेसवे पर रम्बल स्ट्रिप्स की संख्या बढ़ाना, स्वचालित स्पीड गवर्नर, रात में स्मार्ट लाइटिंग और सघन पुलिस गश्त जैसे ठोस कदम उठाए बिना दुर्घटनाओं का सिलसिला थमने वाला नहीं।
निष्कर्ष: संकल्प चाहिए, संवेदना नहीं
यमुना एक्सप्रेसवे की त्रासदी कोई अचानक आई आपदा नहीं, बल्कि यह वर्षों की अनदेखी और तंत्र की विफलता का परिणाम है। हर बड़े हादसे के बाद जांच के आदेश होते हैं, बयान आते हैं और फिर सब भुला दिया जाता है। जब तक चालकों के प्रशिक्षण, एक्सप्रेसवे की तकनीकी निगरानी और यातायात कानूनों की सख्त पालना एक साथ सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक यह राजमार्ग हर रोज़ किसी न किसी परिवार की ज़िंदगी तबाह करता रहेगा।

