साइकिल की सवारी पर नसीमुद्दीन सिद्दीकी — बसपा, कांग्रेस के बाद अब सपा, 2027 में फायदे का सौदा या सियासी बोझ?

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के बीच पार्टियों का गणित तेज होने लगा है। इसी सियासी हलचल के बीच एक नाम बहस के केंद्र में है — नसीमुद्दीन सिद्दीकी। बसपा से निष्कासन, फिर कांग्रेस का दरवाजा और अब समाजवादी पार्टी की साइकिल पर सवारी। उनका यह सियासी सफर जितना रोचक है, उतना ही विवादित भी है।

बसपा से निष्कासन — जब गिरा ‘मिनी सीएम’ का रुतबा

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। मूल रूप से बांदा के रहने वाले सिद्दीकी कभी राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी और रेलवे ठेकेदार हुआ करते थे। 1991 में बसपा के टिकट पर बांदा सदर से विधायक बने। धीरे-धीरे वह मायावती के सबसे करीबी और विश्वसनीय नेताओं में शुमार हो गए, यहां तक कि उन्हें ‘मिनी सीएम’ तक कहा जाने लगा।2016 में जब बीजेपी नेता दयाशंकर सिंह ने मायावती पर अभद्र टिप्पणी की, तो सिद्दीकी ने मोर्चा संभाला। हजरतगंज में धरने पर बैठे, विवादित बयान दिए और जेल तक गए। लेकिन 2017 के चुनावों में बसपा को महज 19 सीटें मिलने के बाद समीकरण बदल गए। सतीश चंद्र मिश्र ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर सिद्दीकी पर भ्रष्टाचार और बेनामी संपत्ति के आरोप लगाकर उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया।

वो ऑडियो जो जनता नहीं भूली

सिद्दीकी के बसपा से निष्कासन के दौरान एक कथित ऑडियो टेप भी सामने आया था जिसमें उन पर टिकट बेचने का आरोप लगा। बसपा सुप्रीमो मायावती ने उन्हें सीधे ब्लैकमेलर करार दिया और कहा कि जो आदमी अपनी पार्टी के नेता की बात को टेप करता हो, वो किसी का क्या होगा। मायावती ने यह भी कहा कि पश्चिमी यूपी, लखनऊ मंडल और उत्तराखंड से भी पार्टी के नेताओं ने सिद्दीकी के खिलाफ शिकायत की थी। यह ऑडियो विवाद आज भी उनके पीछे साये की तरह चलता है और जनमानस में उनकी छवि को प्रभावित करता है।

कांग्रेस में गए, वहां भी नहीं जमे

बसपा से बाहर होने के बाद सिद्दीकी ने कांग्रेस का दामन थामा। 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले वो सीनियर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के साथ मुस्लिम वोट बैंक पर काफी काम किए, कई सम्मेलनों में सक्रिय रहे — लेकिन पूरे प्रदेश में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें ही मिल पाईं। कांग्रेस छोड़ने की कहानी भी दिलचस्प रही। राहुल गांधी के रायबरेली दौरे के दौरान सिद्दीकी उन्हें रिसीव करने एयरपोर्ट पहुंचे, लेकिन उन्हें अंदर एंट्री नहीं मिली। खुद को उपेक्षित महसूस करने के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ने का फैसला किया।

अब सपा की साइकिल पर सवार

15 फरवरी 2026 को कांग्रेस छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। लखनऊ स्थित सपा मुख्यालय में अखिलेश यादव ने उन्हें पार्टी की सदस्यता दिलाई। सिद्दीकी ने कहा कि वे हमेशा नेताजी मुलायम सिंह यादव से प्रभावित रहे हैं।

सपा को फायदा या नुकसान — क्या कहते हैं विश्लेषक?

फायदे की उम्मीद

सपा में सिद्दीकी की एंट्री को पश्चिमी यूपी में मुस्लिम नेतृत्व मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है। आजम खान की कानूनी मुश्किलों के बीच पार्टी नए चेहरे को आगे बढ़ा रही है। यूपी में मुस्लिम वोटर्स करीब 19 फीसदी हैं। सपा हमेशा उनका साथ मांगती रही है। आजम खान उस वोट बैंक के बड़े प्रतीक थे। सिद्दीकी का आना मुस्लिम समुदाय को संदेश देता है कि सपा उनके साथ है। बुंदेलखंड और पश्चिमी यूपी में उनकी पकड़ किसी से छिपी नहीं है और सिद्दीकी के सियासी नेटवर्क का सपा को जरूर फायदा मिलेगा।

नुकसान की आशंका

राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सियासी कद आजम खान की तरह मुस्लिम वोट बैंक में सर्वमान्य चेहरा नहीं है। वेस्ट यूपी के मुस्लिम नेताओं के बीच जरूर पकड़ है, लेकिन बसपा और कांग्रेस में रहते हुए सिद्दीकी ने कभी मुस्लिम सियासत नहीं की है। बसपा छोड़ते समय मायावती पर लगाए गए आरोपों के कारण दलित समाज अब भी उनसे नाराज है, जिससे सपा के पीडीए समीकरण को नुकसान पहुंचने का खतरा बना हुआ है। नसीमुद्दीन सिद्दीकी के इस रुख से सपा का एक धड़ा भी नाखुश नजर आ रहा है, क्योंकि पार्टी के स्थानीय सांसद और कई विधायक मुरादाबाद के कार्यक्रम में शामिल नहीं हुए। सपा के एक विधायक ने पहचान गुप्त रखते हुए कहा कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी सपा की राजनीति को अभी समझ नहीं पा रहे हैं। मुरादाबाद में एक प्रेस वार्ता उस समय हंगामे की भेंट चढ़ गई जब स्थानीय टिकट की दावेदारी को लेकर विवाद खड़ा हो गया। स्थिति इतनी असहज हो गई कि सिद्दीकी जलपान छोड़कर कार्यक्रम स्थल से रवाना हो गए।

जनता का सवाल — मुसलमानों के रहनुमा या सिर्फ सत्ता के दलाल?

सबसे बड़ा सवाल यही है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी बरसों से खुद को मुसलमानों का नेता बताते रहे हैं, लेकिन समाज के लिए ठोस काम क्या किया? यूपी में AIMIM भी मुस्लिम वोटों पर नजर बनाए हुए है और करीब 200 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है — ऐसे में मुस्लिम मतदाताओं के सामने विकल्प भी बढ़ेंगे। तीन दलों का अनुभव रखने वाले नसीमुद्दीन सिद्दीकी के लिए यह साबित करने का वक्त है कि वे सपा के लिए वाकई संपत्ति हैं या महज एक और सियासी यात्री। 2027 का चुनाव उनके और सपा दोनों के लिए अग्निपरीक्षा होगी।

 

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