देश में आलकल नई तरह के आंदोलन देखने को मिल रहे है। भाजपा चुनाव जीतने में बाजी मार रही है लेकिन आर्थिक मोर्चा पर फेल हो गई है। हिन्दू मुसलमान मुद्दे का भी अब दम निकल रहा है। अर्थव्यवस्था का आकार क्या भारत चैथे पायदान से फिसला? सवाल उठ रहे है। सोशल मीडिया पर कुछ दावों में कहा जा रहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था चैथे स्थान से खिसक कर छठे पर आ गई है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक (World Bank) के ताजा आंकड़ों के अनुसार यह दावा पूरी तरह सही नहीं है। विपक्ष के नेता राहुल गांधी लगातर अर्थिक मामलों को लेकर सरकार पर हमलावर हो रहे है। दूसरी तरह काकरोच जनता पार्टी ने देश के लोगों में नई क्रांति के संकेत दिये है।
- कुल GDP रैंकिंग: भारत वर्तमान में दुनिया की छठी (6th) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है (लगभग 4.15 ट्रिलियन डॉलर)। कुछ समय पहले भारत पांचवें स्थान पर भी रहा था, और वर्तमान में यह ब्रिटेन और जापान के बेहद करीब छठे पायदान पर है।
- सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था: बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत की विकास दर (GDP Growth Rate) दुनिया में सबसे तेज़ (लगभग 6.5% से 7%) बनी हुई है।
- क्रय शक्ति (PPP): अगर ‘परचेजिंग पावर पैरिटी’ (PPP) यानी स्थानीय बाज़ार में पैसे की ताकत के आधार पर देखा जाए, तो भारत दुनिया की तीसरी (3rd) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है।
2. प्रति व्यक्ति आय (Per Capita Income) और 142वां नंबर
यह सच है कि देश की कुल GDP बहुत बड़ी है, लेकिन विशाल जनसंख्या (करीब 140 करोड़ से अधिक) होने के कारण जब इस कुल आय को प्रति व्यक्ति में बांटा जाता है, तो तस्वीर बदल जाती है:
- रैंकिंग का सच: नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत दुनिया में लगभग 144वें स्थान के आस-पास आता है। (दावे में कहा गया 142वां नंबर इस वैश्विक आंकड़े के बेहद करीब है)।
- प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा: भारत में औसतन प्रति व्यक्ति आय लगभग 3,051 डॉलर वार्षिक (Nominal) है। जनसंख्या का बड़ा आकार ही इसका मुख्य कारण है कि वैश्विक स्तर पर भारत इस सूची में नीचे दिखाई देता है।
3. अमीर-गरीब की खाई: क्या 1% लोगों के पास है 40% धन?
आर्थिक असमानता को लेकर विपक्ष और राहुल गांधी द्वारा उठाए जा रहे सवाल अंतरराष्ट्रीय संस्था ऑक्सफैम (Oxfam) और ‘वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब’ की रिपोर्ट्स पर आधारित हैं। इन रिपोर्ट्स के आंकड़े चौंकाने वाले हैं:
आर्थिक असमानता के आंकड़े: विभिन्न आर्थिक सर्वेक्षणों के अनुसार, भारत में सबसे अमीर 1 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा है। वहीं, नीचे की 50 प्रतिशत आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का मात्र 3 से 5 प्रतिशत हिस्सा ही बचता है।
यह डेटा दर्शाता है कि आर्थिक विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है, जिससे अमीर और अधिक अमीर हो रहे हैं और गरीब बुनियादी जरूरतों (जैसे दो वक्त की रोटी, बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य) के लिए संघर्ष कर रहे हैं। महंगाई और ईंधन (पेट्रोल-डीजल) की बढ़ती कीमतों का सबसे ज्यादा असर इसी मध्यम और निचले वर्ग की जेब पर पड़ता है।
4. राजनीतिक घमासान: राहुल गांधी के आरोप बनाम मोदी सरकार का पलटवार
इस आर्थिक असमानता को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया है, जिस पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच तीखी बहस जारी है:
- राहुल गांधी का रुख: राहुल गांधी अपनी जनसभाओं और बयानों में लगातार ‘अमीर बनाम गरीब’ (Two Indias) की बात कर रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार की नीतियां केवल कुछ चुनिंदा उद्योगपतियों (अंबानी-अडाणी जैसी कॉर्पोरेट कंपनियों) को फायदा पहुंचा रही हैं, जबकि युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा और गरीब और पिछड़ता जा रहा है।
- मोदी सरकार के मंत्रियों का पलटवार: भारतीय जनता पार्टी (BJP) और सरकार के मंत्रियों ने राहुल गांधी पर तीखा हमला बोला है। सरकार का आरोप है कि राहुल गांधी देश में ‘अस्थिरता’ (Instability), वैमनस्य और हिंसा की भावना भड़काना चाहते हैं। मंत्रियों का कहना है कि सरकार ‘मुफ्त राशन योजना’ (80 करोड़ लोगों को), किसान सम्मान निधि, और आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के जरिए गरीबों को सशक्त कर रही है, जबकि विपक्ष केवल जाति और वर्ग के नाम पर देश को बांटने की कोशिश कर रहा है।
आंकड़ों के विश्लेषण से साफ है कि भारत की अर्थव्यवस्था का कुल आकार (Global GDP) तो तेजी से बढ़ रहा है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय और संपत्ति का असमान वितरण देश के सामने आज भी दो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। यही वजह है कि आने वाले समय में देश की राजनीति का केंद्र बिंदु धार्मिक मुद्दों से हटकर आर्थिक मोर्चे (अमीर बनाम गरीब, रोजगार और महंगाई) की तरफ मुड़ता हुआ दिखाई दे रहा है।

