अल्कोहल टेट्रा पैक्स और सैशे पर प्रतिबंध की माँग, देशभर में एकसमान आबकारी नीति बनाने का निर्देश देने की अपील
अल्कोहल टेट्रा पैक्स: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक अहम जनहित याचिका पर संज्ञान लेते हुए केंद्र सरकार और देश के सभी राज्यों के आबकारी विभागों को नोटिस जारी किया है। यह याचिका अल्कोहल को टेट्रा पैक, सैशे और अन्य छोटी व भ्रामक पैकेजिंग में बेचने पर प्रतिबंध की माँग को लेकर दायर की गई है।भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जोयमल्या बागची की पीठ ने ‘कम्युनिटी अगेंस्ट ड्रंकन ड्राइविंग’ (CADD) संस्था द्वारा दायर याचिका पर केंद्र सरकार और सभी राज्यों के आबकारी प्राधिकरणों को नोटिस जारी करते हुए जवाब माँगा है।
क्या है पूरा मामला?
याचिकाकर्ता संस्था CADD की ओर से अधिवक्ता विपिन नायर ने अदालत को बताया कि तंबाकू उत्पादों के विपरीत, इस तरह की पैकेजिंग में बिकने वाले मादक पेय पदार्थों पर कोई स्पष्ट स्वास्थ्य चेतावनी नहीं होती। उन्होंने कहा, “तंबाकू की तरह यहाँ कोई चेतावनी नहीं है। ये पैक बिल्कुल फ्रूट जूस जैसे दिखते हैं, लेकिन इनमें वोदका होता है सेब, मिर्च, आम जैसे चित्रों के साथ।” इस पर मुख्य न्यायाधीश ने तत्काल मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि “यह पैकेजिंग बेहद भ्रामक है।” अदालत ने माना कि इस प्रकार की पैकेजिंग विशेष रूप से किशोर उपभोक्ताओं को लक्षित कर सकती है और मौजूदा आबकारी तथा सार्वजनिक स्वास्थ्य कानूनों की प्रभावी नियामक निगरानी को नाकाम कर सकती है।
याचिका में क्या माँगें हैं?
याचिका में केंद्र सरकार और राज्यों को टेट्रा पैक, सैशे और इसी तरह की छुपाने योग्य या अस्पष्ट पैकेजिंग में शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने हेतु एकसमान राष्ट्रीय नीति बनाने का निर्देश देने की माँग की गई है। साथ ही आबकारी कानूनों में संशोधन कर बॉटलिंग को केवल काँच की बोतलों या अन्य स्पष्ट रूप से पहचाने जाने योग्य पात्रों तक सीमित करने की अपील भी की गई है।याचिका में यह भी कहा गया है कि विभिन्न राज्यों के आबकारी अधिनियमों के तहत “बोतल” और “बॉटलिंग” की परिभाषाएँ इतनी व्यापक हैं कि उनमें सैशे, रैपर, फ्लास्क, पैकेट और इसी तरह के अन्य पात्र शामिल हो जाते हैं जिससे देश में एकरूपता का पूर्णतः अभाव है।
राज्यों की अलग-अलग नीतियाँ — एक बड़ी समस्या
याचिका में यह भी उजागर किया गया है कि देश के अलग-अलग राज्यों में आबकारी नियम एक-दूसरे से बिल्कुल अलग हैं। कर्नाटक और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में लचीली पैकेजिंग की अनुमति है, जबकि महाराष्ट्र ने 2016 में ही काँच की बोतलों को अनिवार्य कर टेट्रा पैक्स पर रोक लगा दी थी। उत्तर प्रदेश में भी फरवरी 2025 में राज्य सरकार द्वारा एक प्रशासनिक निर्णय लेकर इस तरह के छोटे पैकेट में शराब की बिक्री की अनुमति दी गई थी। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2026 में एक अन्य याचिकाकर्ता को यूपी के आबकारी आयुक्त के समक्ष अपनी चिंताएँ रखने की छूट देते हुए उस याचिका का निस्तारण किया था।
सस्ती कीमत और आसान उपलब्धता — खतरे की घंटी
याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि सैशे और टेट्रा पैक में बिकने वाली शराब सस्ती होती है, उसे ले जाना आसान होता है और वह अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध होती है, जिससे शराब का सेवन और उससे जुड़ी सामाजिक समस्याएँ बढ़ सकती हैं। छोटे और सस्ते पैक कम उम्र के बच्चों, स्कूली छात्रों और व्यावसायिक वाहन चालकों की पहुँच में आसानी से आ जाते हैं। याचिका में यह भी कहा गया है कि इस तरह के सघन और सस्ते पैकेजिंग प्रारूप शराब को सार्वजनिक स्थानों पर और शैक्षणिक संस्थाओं के आसपास अधिक सुलभ बनाते हैं तथा शराब के दुरुपयोग और अपराध के बढ़ते मामलों में योगदान देते हैं।
CADD का लंबा संघर्ष
CADD संस्था 2001 से शराब पीकर गाड़ी चलाने और नाबालिगों द्वारा शराब पीने के खिलाफ अभियान चला रही है। इससे पहले भी यह संस्था शराब बिक्री केंद्रों पर अनिवार्य आयु-सत्यापन की माँग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा चुकी है, जिस पर पहले ही नोटिस जारी हो चुका है।
नवंबर 2025 में भी उठा था यही मुद्दा
नवंबर 2025 में व्हिस्की ब्रांडों से जुड़ी ट्रेडमार्क सुधार कार्यवाही की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से यह टिप्पणी की थी कि टेट्रा पैक में बिकने वाली शराब फ्रूट जूस के डिब्बों जैसी दिखती है और इस तरह की पैकेजिंग की प्रकृति को लेकर चिंता जताई थी। इससे स्पष्ट है कि यह विषय न्यायपालिका की नज़र में पहले से ही गंभीर बना हुआ था।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट केंद्र और अन्य संबंधित अधिकारियों के जवाब दाखिल होने के बाद इस मामले की अगली सुनवाई करेगा।अदालत का लक्ष्य देश में शराब की पैकेजिंग को लेकर एकसमान और व्यापक दिशानिर्देश तय करना है, ताकि सार्वजनिक स्वास्थ्य, सड़क सुरक्षा और पर्यावरण संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए एक संतुलित नीति बनाई जा सके। यह मामला (W.P.(C) No. 475/2026) देश के लाखों नाबालिगों और सड़क सुरक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। सुप्रीम कोर्ट का यह कदम न केवल आबकारी नीतियों में एकरूपता की दिशा में एक बड़ा प्रयास है, बल्कि यह भी सुनिश्चित करने की कोशिश है कि शराब की पैकेजिंग आम नागरिकों, खासकर बच्चों, को गुमराह न करे।
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