पटना हाईकोर्ट की सख्ती, जीवित महिला को मृत घोषित करने की लापरवाही पर समस्तीपुर पुलिस में हड़कंप, थानाध्यक्ष निलंबित 

पटना हाईकोर्ट में पुलिस की गंभीर प्रशासनिक लापरवाही का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। एक जीवित महिला को मृत बताकर अदालत में गलत रिपोर्ट दाखिल करने पर हाईकोर्ट ने समस्तीपुर पुलिस पर नाराजगी जताई। मुख्य न्यायाधीश संगम कुमार साहू की खंडपीठ ने इस मामले में समस्तीपुर के एसपी अरविंद प्रताप सिंह और ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा से जवाब तलब किया था। आज 12 मई को इस पर सुनवाई हुई, जिसमें पुलिस अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठे। मामला सकली देवी (बदला हुआ नाम सावित्री देवी) से जुड़ा है। उन्होंने अपनी नाबालिग नातिन के दुष्कर्म और हत्या के आरोपी के बरी होने के फैसले के खिलाफ अपील दायर की थी। सुनवाई के दौरान पुलिस ने रिपोर्ट दी कि अपीलकर्ता महिला की मृत्यु हो चुकी है, जिसके आधार पर कोर्ट ने 13 मार्च को अपील समाप्त कर दी। बाद में जब महिला खुद कोर्ट में पहुंची और आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक पासबुक तथा पंचायत का जीवित प्रमाण-पत्र पेश कर अपनी जीवित स्थिति साबित की, तब सनसनी फैल गई।

कोर्ट की नाराजगी और आदेश

हाईकोर्ट ने इस गंभीर चूक पर कड़ी नाराजगी व्यक्त की और पूछा कि बिना पुख्ता जांच के इतनी संवेदनशील जानकारी अदालत में कैसे दाखिल की गई। अदालत ने एसपी और थानाध्यक्ष को वर्चुअल उपस्थिति का आदेश दिया और स्पष्टीकरण मांगा कि उनके खिलाफ अवमानना की कार्रवाई क्यों न शुरू की जाए। पुलिस रिपोर्टिंग प्रक्रिया की समीक्षा का भी संकेत दिया गया।

पुलिस विभाग की कार्रवाई

हाईकोर्ट की सख्ती के बाद समस्तीपुर पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया। एसपी अरविंद प्रताप सिंह ने ताजपुर थानाध्यक्ष राकेश कुमार शर्मा को तत्काल निलंबित कर दिया। मुफस्सिल सर्किल इंस्पेक्टर को ताजपुर थाने की अतिरिक्त जिम्मेदारी सौंपी गई है ताकि जांच और आगे की प्रक्रिया प्रभावित न हो। सूत्रों के अनुसार, रिपोर्ट तैयार करते समय पहचान और जीवित स्थिति की पुष्टि नहीं की गई, जिसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही माना जा रहा है। यह जांच का विषय भी है कि गलती अनजाने में हुई या उदासीनता बरती गई।

12 मई की सुनवाई में क्या निकला?

आज की सुनवाई में पुलिस अधिकारियों ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उपस्थित होकर गलत रिपोर्ट स्वीकार की। कोर्ट ने दोनों से व्यक्तिगत शपथ-पत्र दाखिल करने को कहा है। साथ ही, पुलिस की रिपोर्टिंग प्रक्रिया और लंबित मामलों पर भी सवाल उठाए गए। मामले की आगे की सुनवाई के लिए नई तारीख तय होने की संभावना है। यह घटना न्यायिक प्रक्रिया में पुलिस की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़ी करती है। यह मामला बिहार पुलिस की कार्यप्रणाली की विश्वसनीयता पर सवाल उठाता है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि ऐसी लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। अब नजर इस बात पर है कि अधिकारी कोर्ट में क्या स्पष्टीकरण देते हैं और जिम्मेदारी तय होने के बाद आगे क्या कार्रवाई होती है। पीड़ित परिवार को न्याय मिले, इसके लिए कोर्ट की निगरानी जारी रहेगी।

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