सेंसर बोर्ड की बढ़ती सख्ती: हिल गया दक्षिण भारतीय सिनेमा, टाइटल बदलो, कट करो या रिलीज भूल जाओ

सेंसर बोर्ड की बढ़ती सख्ती: सेंट्रल बोर्ड ऑफ फिल्म सर्टिफिकेशन (CBFC) की हालिया हस्तक्षेपों ने तेलुगु, तमिल और मलयालम सिनेमा को गंभीर चुनौती दी है। पिछले कुछ महीनों में कई फिल्मों को टाइटल बदलने, बड़े पैमाने पर कट्स करने या अनुचित सर्टिफिकेट मिलने की वजह से रिलीज में देरी या नुकसान झेलना पड़ा है। फिल्मकार इसे क्रिएटिव फ्रीडम पर हमला बता रहे हैं, जबकि ट्रेड एक्सपर्ट्स कहते हैं कि यह सिस्टम राजनीतिक प्रभावों से ग्रस्त हो गया है।

हाल के प्रमुख उदाहरणों में तेलुगु फिल्म S Saraswathi (पहले Saraswathi) शामिल है, जिसका टाइटल देवी के नाम पर आपत्ति के कारण बदलना पड़ा। इसी तरह Hey Bhagawan! को Hey Balwanth और Couple Friendly को Friendly Couple बनाने की सलाह दी गई, लेकिन मेकर्स ने मना किया तो ‘A’ सर्टिफिकेट मिला, जिससे फैमिली ऑडियंस दूर हो गई। मलयालम फिल्म Haal में बीफ बिरयानी सीन और ‘ध्वज प्रणाम’ जैसे संवादों पर आपत्ति जताई गई, जिसके खिलाफ कोर्ट जाना पड़ा।

बड़ी फिल्मों में भी यही हाल है। राजिनिकांत की Coolie को CBFC ने इलेक्ट्रिक क्रेमेशन सीन के कारण 35 कट्स मांगे। डायरेक्टर लोकेश कनगराज ने कहा, “हमने पूरा फिल्म ‘A’ सर्टिफिकेट के साथ रिलीज किया, लेकिन इससे 40-50 करोड़ का नुकसान हुआ।” थलापति विजय की Jana Nayagan (उनकी आखिरी फिल्म) को धार्मिक भावनाओं और सेना चित्रण पर आपत्ति के कारण रिलीज डेट से पहले ही अटका दिया गया है। जनवरी 2026 में रिलीज की उम्मीद थी, लेकिन कोर्ट केस और रिवाइजिंग कमिटी में फंसी हुई है। अब मार्च 2026 तक भी रिलीज अनिश्चित है, और तमिलनाडु चुनावों के कारण मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट लगने का खतरा है।

सिवकार्थिकेयन की Parasakthi (जनवरी 2026 रिलीज) को हिंदी इंपोजिशन से जुड़े डायलॉग्स और सीन पर 25 कट्स/मॉडिफिकेशन्स करने पड़े, जैसे “Hindi has erased my dream” को बदलकर “My only dream is to oppose Hindi imposition” करना पड़ा। सिवकार्थिकेयन ने कहा, “हमारे पास समय नहीं था नेगोशिएट करने का, लेकिन स्टोरीलाइन पर असर नहीं पड़ा।”

ट्रेड एनालिस्ट रमेश बाला ने कहा, “अमेरिका में बोर्ड सिर्फ रेटिंग देता है, कट नहीं मांगता। भारत में यह कंटेंट को शेप कर रहा है, जो राजनीतिक लगता है।” फिल्मकारों का कहना है कि छोटी फिल्में तो मजबूरन मान जाती हैं, लेकिन बड़ी फिल्मों में भी यह ट्रेंड बढ़ रहा है। फिल्म इंडस्ट्री अब CBFC की प्रक्रिया में पारदर्शिता, समयबद्धता और क्रिएटिव फ्रीडम की मांग कर रही है। अगर सुधार नहीं हुए, तो दक्षिण सिनेमा की बोल्ड स्टोरीटेलिंग पर लंबे समय तक असर पड़ सकता है। स्थिति पर सभी की नजर है कि क्या कोई नीतिगत बदलाव आएगा या यह सिलसिला जारी रहेगा।

यहां से शेयर करें