The Indian Patent Story: प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ IITs से ज़्यादा पेटेंट फाइल क्यों कर रही हैं?

The Indian Patent Story: भारत में पेटेंट फाइलिंग्स का रिकॉर्ड टूट गया है। वित्त वर्ष 2024-25 में कुल 1,10,375 पेटेंट एप्लीकेशन्स दाखिल हुए, जो पिछले साल के 92,168 से 19.75% ज़्यादा हैं। सबसे बड़ा योगदान शिक्षा संस्थानों का है – इनकी फाइलिंग्स 23,306 से बढ़कर 37,681 हो गईं, यानी 61.7% का उछाल। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि टॉप-10 एकेडमिक पेटेंट फाइलर्स में 9 प्राइवेट या डीम्ड यूनिवर्सिटीज़ हैं। सभी 23 IITs मिलाकर तीसरे नंबर पर हैं।

प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ की संख्या ज़्यादा, लेकिन क्वालिटी?
Intellectual Property Office (IPO) के आंकड़ों और हालिया विश्लेषण (Angela Hong) के मुताबिक 2020-2025 के बीच:
• IITs (सभी मिलाकर): 6,558 पेटेंट पब्लिश्ड, 2,806 ग्रांटेड → 42.8% सफलता दर (2020-23 में 64%)
• IISc Bengaluru: 46.5% ग्रांट रेट
• NITs: 41% कुल, 67.1% (2020-23)
दूसरी ओर प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़:
• Lovely Professional University (LPU): 7,096 फाइल्ड, सिर्फ 164 ग्रांटेड → 2.3%
• Chandigarh University: 5,318 फाइल्ड, 45 ग्रांटेड → 0.8%
• Galgotias University: 2,233 फाइल्ड, 2 ग्रांटेड → 0.1%
• Shobhit Institute: 961 फाइल्ड, 0 ग्रांटेड
कुछ प्राइवेट संस्थान एक साल में अकेले ही सभी IITs से ज़्यादा पेटेंट फाइल कर लेते हैं। लेकिन ग्रांट रेट बेहद कम होने से सवाल उठता है – क्या ये असली इनोवेशन हैं या सिर्फ़ रैंकिंग का खेल?

क्यों हो रहा है यह उछाल?
2021 के Patents (Amendment) Rules के तहत शिक्षा संस्थानों को 80% फीस छूट मिली (फाइलिंग सिर्फ ₹1,600, एग्जामिनेशन ₹4,000)। NIRF रैंकिंग में पब्लिश्ड पेटेंट्स को वेटेज मिलता है (ग्रांटेड को डबल), NAAC भी काउंट करता है। फैकल्टी को प्रमोशन, API स्कोर और ₹5,000-15,000 इनाम के लिए पेटेंट फाइल करने का दबाव। स्टूडेंट्स के रिज्यूमे में नाम चमकता है। परिणाम? क्वांटिटी बढ़ी, क्वालिटी नहीं।

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
India Research Watch के संस्थापक अचल अग्रवाल कहते हैं, “NIRF और NAAC को ग्रांटेड पेटेंट्स का प्रतिशत ज्यादा वेटेज देना चाहिए, वरना फ्रिवोलस फाइलिंग्स से टैक्सपेयर्स का पैसा और एग्जामिनर्स का समय बर्बाद हो रहा है।” BITS Pilani के ग्रुप वाइस-चांसलर वी. रामगोपाल राव जोर देते हैं, “पेटेंट को ग्रांट करवाना, मेंटेन करना और कमर्शियलाइज करना असली पैसा और रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर मांगता है – जो सिर्फ टॉप इंस्टीट्यूट्स के पास है।” कमर्शियलाइजेशन की स्थिति और खराब है – यूनिवर्सिटी पेटेंट्स में से सिर्फ 10-15% ही लाइसेंसिंग, स्टार्टअप या इंडस्ट्री टाई-अप तक पहुंच पाते हैं। बाकी लैब में ही पड़े रह जाते हैं।

निष्कर्ष: संख्या नहीं, असर मायने रखता है
पेटेंट फाइलिंग्स में भारत छठा वैश्विक रैंकिंग रखता है और घरेलू एप्लीकेंट्स 68% तक पहुंच गए हैं – यह अच्छी खबर है। लेकिन प्राइवेट यूनिवर्सिटीज़ की यह रेस अगर सिर्फ रैंकिंग और मार्केटिंग के लिए है तो असली इनोवेशन, जॉब्स और अर्थव्यवस्था को फायदा नहीं होगा। नीति-निर्माताओं को अब सिर्फ संख्या नहीं, ग्रांट रेट, कमर्शियलाइजेशन और सोशल इम्पैक्ट को मापने वाले नए मेट्रिक्स पर ध्यान देना चाहिए। वरना पेटेंट बूम सिर्फ कागजी रहेगा। यह खबर रैंकिंग के पीछे छिपी हकीकत को उजागर करती है – असली इनोवेशन लैब, फंडिंग और इंडस्ट्री लिंकेज से आता है, न कि सिर्फ फाइलिंग से।

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