₹3 लाख तक का iPhone खरीदने पर इतना जश्न क्यों? Apple के फोल्डेबल फोन पर सवाल—मोबाइल भारत का, पैसा जाएगा कहां?

नई दिल्ली। Apple ने आखिरकार अपने पहले फोल्डेबल स्मार्टफोन iPhone Duo को लॉन्च कर दिया है। भारत में इसकी शुरुआती कीमत ₹2,99,900 रखी गई है, जबकि 2TB स्टोरेज वाला टॉप मॉडल करीब ₹4,49,900 तक पहुंचता है। यानी जिस फोन को लेकर बाजार और मीडिया में जबरदस्त उत्साह दिखाई दे रहा है, उसे खरीदने के लिए आम भारतीय ग्राहक को तीन लाख रुपये के आसपास खर्च करने होंगे।

ऐसे में एक सवाल उठना स्वाभाविक है—क्या यह सिर्फ एक नया मोबाइल फोन है या फिर इसे ऐसी मार्केटिंग के जरिए पेश किया जा रहा है कि उपभोक्ता इसकी कीमत पर सवाल करने के बजाय इसे खरीदने को उपलब्धि समझने लगे?

Apple का उत्पाद लॉन्च हमेशा केवल तकनीकी लॉन्च नहीं रहता। उसके साथ डिजाइन, कैमरा, प्रोसेसर, स्क्रीन, बैटरी और नए फीचर्स की ऐसी कहानी बनाई जाती है कि उत्पाद खुद एक ‘प्रीमियम एक्सपीरियंस’ बन जाता है। इस बार फोल्डेबल iPhone के साथ भी यही माहौल देखने को मिल रहा है।

तीन लाख रुपये के फोन के लिए देश में इतना उत्साह क्यों?

iPhone Duo में 7.6 इंच का फोल्डिंग डिस्प्ले, 5.4 इंच की बाहरी स्क्रीन, A20 Pro चिप और नया फोल्डेबल डिजाइन दिया गया है। Apple इसे अब तक का सबसे बड़ा iPhone डिस्प्ले और अपनी नई पीढ़ी के फोल्डेबल अनुभव के रूप में पेश कर रहा है।

तकनीक के लिहाज से निश्चित रूप से यह एक बड़ा लॉन्च है। लेकिन सवाल यह है कि ₹2,99,900 से शुरू होने वाला स्मार्टफोन कितने भारतीयों की वास्तविक जरूरत है?

भारत में बड़ी आबादी अभी भी महंगे स्मार्टफोन को आवश्यकता के बजाय लक्जरी मानती है। इसके बावजूद लॉन्च के आसपास जिस तरह फीचर्स, डिजाइन और कीमत की चर्चा होती है, उससे ऐसा माहौल बनता है कि नया iPhone खरीदना किसी सामाजिक उपलब्धि से कम नहीं है।

यहीं से सवाल उठता है कि क्या उपभोक्ता फोन खरीद रहा है या ब्रांड की बनाई हुई प्रतिष्ठा खरीद रहा है?

विज्ञापन कम दिखाई दें तो क्या प्रचार कम हो जाता है?

Apple की मार्केटिंग रणनीति का एक दिलचस्प पहलू यह है कि ब्रांड की चर्चा सिर्फ पारंपरिक विज्ञापनों से नहीं होती। उत्पाद लॉन्च के समय तकनीकी फीचर्स, डिजाइन और नई सुविधाओं पर लगातार खबरें, रिव्यू, वीडियो और सोशल मीडिया चर्चाएं शुरू हो जाती हैं।

भारत में Apple के विज्ञापन और प्रमोशन खर्च पर 2024 की एक Exchange4Media रिपोर्ट ने कंपनी के FY23 के आंकड़ों के आधार पर बताया था कि भारत में विज्ञापन और प्रमोशनल गतिविधियों पर खर्च कंपनी के भारतीय राजस्व के एक प्रतिशत से भी कम था। वैश्विक स्तर पर Apple के विज्ञापन खर्च की तुलना में यह अनुपात काफी कम बताया गया था।

इसका मतलब यह नहीं कि मीडिया कवरेज को सीधे तौर पर Apple द्वारा ‘खरीदा हुआ विज्ञापन’ कहा जा सकता है। ऐसा दावा करने के लिए ठोस प्रमाण जरूरी होंगे। लेकिन यह सवाल जरूर पूछा जा सकता है कि किसी उत्पाद के लॉन्च पर संपादकीय कवरेज और ब्रांड प्रमोशन के बीच की सीमा कितनी स्पष्ट रहती है?

Apple का असली खेल सिर्फ फोन बेचने तक सीमित नहीं

Apple सिर्फ हार्डवेयर नहीं बेचता। वह अपने साथ पूरा इकोसिस्टम बेचता है—iPhone, Apple Watch, AirPods, iCloud, ऐप्स और दूसरी सेवाएं।

यानी एक ग्राहक अगर एक बार Apple के इकोसिस्टम में प्रवेश करता है तो भविष्य में उसके खर्च का दायरा सिर्फ फोन की कीमत तक सीमित नहीं रहता।

इसीलिए तीन लाख रुपये का फोन केवल तीन लाख रुपये का ग्राहक नहीं है। उसके साथ लंबे समय तक चलने वाला पूरा Apple ecosystem जुड़ सकता है।

अब सबसे बड़ा सवाल—फोन खरीदने का पैसा भारत में रहेगा या विदेश जाएगा?

यह सवाल थोड़ा जटिल है, क्योंकि इसका जवाब केवल ‘पूरा पैसा विदेश जाता है’ या ‘पूरा पैसा भारत में रहता है’ नहीं है।

Apple ने भारत में iPhone की मैन्युफैक्चरिंग तेजी से बढ़ाई है। 2025 में भारत में करीब 5.5 करोड़ iPhone असेंबल किए जाने की रिपोर्ट सामने आई थी और भारत की हिस्सेदारी Apple के वैश्विक iPhone उत्पादन में करीब 25 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया। भारत में अब विभिन्न iPhone मॉडल असेंबल किए जा रहे हैं।

इसका मतलब है कि भारत में बिकने वाले हर iPhone के मामले में पूरी कीमत सीधे विदेश नहीं चली जाती।

भारत में फोन की असेंबली, कर्मचारियों की सैलरी, स्थानीय सप्लायर, लॉजिस्टिक्स, रिटेल, टैक्स और दूसरी सेवाओं के जरिए रकम का एक हिस्सा भारतीय अर्थव्यवस्था में रहता है।

लेकिन दूसरी तरफ, स्मार्टफोन के कई महत्वपूर्ण कंपोनेंट और तकनीक वैश्विक सप्लाई चेन से आते हैं। इसलिए फोन की पूरी कीमत को भारतीय घरेलू आय नहीं माना जा सकता।

Apple के लिए भारत अब सिर्फ बाजार नहीं, मैन्युफैक्चरिंग हब भी

यहां कहानी का दूसरा पहलू भी महत्वपूर्ण है। भारत अब Apple के लिए केवल iPhone बेचने वाला बाजार नहीं रह गया है।

भारत में Foxconn और Tata Electronics जैसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर Apple के लिए उत्पादन कर रहे हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 2026 में भारत से वैश्विक iPhone उत्पादन की हिस्सेदारी करीब 26 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया है।

यानी भारतीय ग्राहक का पैसा पूरी तरह विदेशी अर्थव्यवस्था में चला जाता है, ऐसा कहना सही नहीं होगा। भारत में बढ़ता उत्पादन रोजगार, निर्यात, स्थानीय सेवाओं और सप्लाई चेन के जरिए आर्थिक गतिविधि पैदा करता है।

फिर भी बड़ा सवाल मुनाफे का है

असल बहस यहां शुरू होती है।

भारत में किसी विदेशी कंपनी का फोन बनने का अर्थ यह नहीं है कि फोन की पूरी आर्थिक वैल्यू भारत के पास रहती है। उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले आयातित कंपोनेंट, विदेशी तकनीक, वैश्विक सप्लाई चेन और कंपनी के अंतरराष्ट्रीय कारोबार को भी ध्यान में रखना पड़ता है।

इसीलिए ₹2,99,900 के iPhone Duo में से कितनी रकम भारतीय अर्थव्यवस्था में वास्तविक घरेलू मूल्य के रूप में रहती है और कितनी वैश्विक सप्लाई चेन तथा Apple के अंतरराष्ट्रीय कारोबार में जाती है, इसका सीधा जवाब केवल रिटेल कीमत देखकर नहीं दिया जा सकता।

यही वह सवाल है जिस पर उपभोक्ताओं और नीति-निर्माताओं को ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

‘Made in India’ का मतलब 100 प्रतिशत भारतीय फोन नहीं

आज भारत में iPhone असेंबल होने की खबर निश्चित रूप से देश के इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर के लिए अच्छी है। लेकिन असेंबली और पूरी तरह स्वदेशी निर्माण में अंतर है।

भारत सरकार खुद मोबाइल फोन में घरेलू वैल्यू एडिशन बढ़ाने पर जोर दे रही है। प्रस्तावित PLI 2.0 का लक्ष्य मोबाइल फोन उत्पादन में घरेलू वैल्यू एडिशन को 55 प्रतिशत से अधिक तक पहुंचाना बताया गया है।

इससे साफ है कि भारत में फोन बनने के बावजूद पूरी वैल्यू चेन अभी भारत में नहीं है।

Apple का ब्रांड बनाम भारतीय ग्राहक की जरूरत

iPhone Duo तकनीकी रूप से आकर्षक हो सकता है। फोल्डेबल स्क्रीन, हाई-एंड प्रोसेसर और Apple का सॉफ्टवेयर इकोसिस्टम इसे प्रीमियम फोन बनाते हैं।

लेकिन क्या हर ग्राहक को ₹3 लाख का फोन चाहिए?

यह सवाल तकनीक का नहीं, अर्थव्यवस्था और उपभोक्ता व्यवहार का है।

यदि किसी व्यक्ति के लिए फोन काम, व्यवसाय या पेशेवर जरूरत का महत्वपूर्ण उपकरण है और वह इसकी कीमत वहन कर सकता है, तो खरीदना उसका व्यक्तिगत फैसला है। लेकिन केवल ब्रांड की चमक, सोशल मीडिया के दबाव या लॉन्च के आसपास बनाए गए उत्साह में आकर इतना महंगा फोन खरीदना आर्थिक रूप से कितना समझदारी भरा है—इस पर जरूर विचार होना चाहिए।

मीडिया से भी सवाल—खबर और विज्ञापन की सीमा कहां है?

Apple जैसे बड़े ब्रांड जब नया उत्पाद लॉन्च करते हैं तो मीडिया के लिए भी यह बड़ी खबर होती है। नए फीचर्स, कीमत, कैमरा, डिजाइन और टेक्नोलॉजी पर रिपोर्टिंग करना पत्रकारिता का हिस्सा है।

लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब उत्पाद की आलोचनात्मक समीक्षा के बजाय उसकी खूबियों की लगातार प्रस्तुति उपभोक्ता को खरीदारी की ओर धकेलने लगे।

किसी भी महंगे उत्पाद की रिपोर्टिंग में यह भी बताया जाना चाहिए कि उसकी कीमत कितनी है, उसके विकल्प क्या हैं, उसकी वास्तविक उपयोगिता क्या है और क्या उपभोक्ता को इतना खर्च करना जरूरी है।

सवाल सिर्फ iPhone का नहीं, हमारी खरीदारी की मानसिकता का है

Apple हर साल नया फोन लॉन्च करता है और लाखों लोग उसे खरीदते हैं। कंपनी का काम अपने उत्पाद को शानदार तरीके से पेश करना है। लेकिन उपभोक्ता का काम यह तय करना है कि उसे वास्तव में क्या चाहिए।

₹2.99 लाख का iPhone Duo निश्चित रूप से तकनीक की दुनिया में बड़ा लॉन्च है, लेकिन इसे सोने की तरह पेश करने की जरूरत नहीं है।

आखिर यह एक स्मार्टफोन है—सोना नहीं।

और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि जब कोई भारतीय उपभोक्ता इस फोन के लिए लाखों रुपये खर्च करता है, तो उस रकम का कितना हिस्सा भारतीय रोजगार, उत्पादन, टैक्स और सप्लाई चेन में वापस आता है और कितना हिस्सा वैश्विक कंपनियों तथा विदेशी सप्लाई चेन के पास जाता है।

 

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