प्रधानमंत्री मोदी के पांच राष्ट्रों के दौरे से ऊर्जा सुरक्षा को मजबूती, गैस, एलपीजी और तेल की किल्लत कम करने की दिशा में क्या अहम कदम?  

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पांच राष्ट्रों (यूएई, नीदरलैंड्स, स्वीडन, नॉर्वे और इटली) के दौरे ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को नई दिशा दी है। खासकर हालिया पश्चिम एशिया संकट के कारण स्ट्रेट ऑफ हरमुज की रुकावट से उपजी एलपीजी, प्राकृतिक गैस (LNG) और कच्चे तेल की आयातीय कमी को दूर करने में यह दौरा महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। यूएई चरण में पहले ही एलपीजी आपूर्ति और सामरिक पेट्रोलियम रिजर्व पर अहम समझौते हो चुके हैं, जबकि नीदरलैंड्स में स्वच्छ ऊर्जा, हाइड्रोजन और प्रौद्योगिकी सहयोग से दीर्घकालिक राहत की उम्मीद है।  भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है, जहां सालाना खपत करीब 33 मिलियन टन से अधिक है। लगभग 60 प्रतिशत मांग आयात पर निर्भर है, जिसमें से अधिकांश हिस्सा पश्चिम एशिया से हरमुज जलडमरूमध्य के रास्ते आता है। 2026 की शुरुआत में क्षेत्रीय तनाव के कारण आपूर्ति बाधित होने से एलपीजी उपयोग में 13-16 प्रतिशत की गिरावट आई, कीमतें बढ़ीं और कई शहरों में कमी देखी गई। कच्चे तेल में आयात निर्भरता 85-90 प्रतिशत के करीब है, जबकि प्राकृतिक गैस (LNG) में भी आधी मांग आयात से पूरी होती है।

यूएई दौरा: तत्काल राहत के समझौते

दौरे के पहले चरण में यूएई के साथ दो प्रमुख ऊर्जा समझौते हुए। अबू धाबी नेशनल ऑयल कंपनी (ADNOC) के साथ सामरिक पेट्रोलियम रिजर्व पर MoU के तहत यूएई भारत में 3 करोड़ बैरल तक कच्चा तेल भंडारित कर सकेगा। आपात स्थिति में भारत को प्राथमिकता मिलेगी। साथ ही, भारतीय ऑयल कॉर्पोरेशन (IOCL) और ADNOC के बीच एलपीजी की लंबी अवधि की आपूर्ति पर समझौता हुआ, जो घरेलू खपत की स्थिरता सुनिश्चित करेगा। यूएई पहले से भारत की एलपीजी जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करता है।  ये समझौते न केवल आपूर्ति विविधीकरण करेंगे बल्कि सब्सिडी बोझ और विदेशी मुद्रा खर्च को भी नियंत्रित करने में मदद करेंगे।

नीदरलैंड्स दौरा: स्वच्छ ऊर्जा और दीर्घकालिक समाधान

नीदरलैंड्स पहुंचकर प्रधानमंत्री मोदी ने डच प्रधानमंत्री रोब जेटेन, राजा विलेम-अलेक्जेंडर और रानी मैक्सिमा से मुलाकात की। चर्चा का केंद्र सेमीकंडक्टर, रक्षा, व्यापार के साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा, स्वच्छ हाइड्रोजन और पानी प्रबंधन रहा। नीदरलैंड्स उन्नत ऊर्जा लॉजिस्टिक्स और हाइड्रोजन प्रौद्योगिकी में मजबूत है, जो भारत के नेशनल ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को गति दे सकता है।  हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा सहयोग से भविष्य में जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता कम होगी, जिससे एलपीजी और तेल की मांग में दीर्घकालिक संतुलन आएगा। ASML जैसी कंपनियों के साथ सेमीकंडक्टर समझौते भी अप्रत्यक्ष रूप से ऊर्जा दक्षता बढ़ाएंगे।

विशेषज्ञों का आकलन

विशेषज्ञों के अनुसार, ये कदम तत्काल कमी को कम करेंगे और आत्मनिर्भरता की दिशा मजबूत करेंगे। हालांकि, पूर्ण समाधान के लिए घरेलू उत्पादन बढ़ाना, पाइप्ड गैस नेटवर्क का विस्तार और नवीकरणीय स्रोतों को बढ़ावा जरूरी है। इस दौरे से भारत की वैश्विक ऊर्जा कूटनीति को नई गति मिली है, जो न केवल आपूर्ति सुरक्षा बल्कि सतत विकास के लक्ष्यों को भी समर्थन देगी। सरकार का फोकस अब इन समझौतों को जल्द अमली जामा पहनाने और अन्य साझेदार देशों (स्वीडन, नॉर्वे, इटली) से भी समान सहयोग हासिल करने पर है। इससे आम उपभोक्ता को सस्ती और स्थिर एलपीजी-ईंधन उपलब्धता सुनिश्चित हो सकेगी।

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