23 साल बाद इराक से अमेरिकी सेना की पूरी वापसी, सुरक्षा को लेकर बढ़ीं आशंकाएं
बगदाद। दो दशक से अधिक लंबे युद्ध अभियान के बाद अमेरिकी सेना ने बुधवार को इराक में अपना मिशन आधिकारिक तौर पर समाप्त कर दिया। इस वापसी से इराक में एक सुरक्षा शून्य पैदा होने की आशंका जताई जा रही है, जिसका फायदा ईरान समर्थित शिया मिलिशिया और इस्लामिक स्टेट उठा सकते हैं। आखिरी टुकड़ियां मुख्य रूप से कुर्द क्षेत्र स्थित इरबिल के एक हवाई अड्डे से रवाना हुईं। तेहरान और उसके सहयोगियों ने इसे अपनी जीत के तौर पर पेश किया, हालांकि कई इराकी नागरिकों को चिंता है कि उनकी अपनी सुरक्षा बल इस जिम्मेदारी के लिए पूरी तरह तैयार नहीं हैं।
यह घटनाक्रम सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने वाले अमेरिकी नेतृत्व वाले हमले के 23 साल बाद हुआ है, जिसने इराक को वर्षों की उथल-पुथल और अराजकता में धकेल दिया था। अमेरिकी सेना पहले 2011 के अंत में भी इराक से हट गई थी, लेकिन इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों द्वारा देश के एक तिहाई हिस्से पर कब्जा करने के बाद उसे तीन साल के भीतर फिर लौटना पड़ा था। इस सदी के अब तक के सबसे बड़े अमेरिकी युद्ध में 4,500 से ज्यादा अमेरिकी सैनिकों की जान गई, जो अफगानिस्तान युद्ध में हुई मौतों से लगभग दोगुना है। इराक बॉडी काउंट प्रोजेक्ट के अनुसार इस दौरान 2 लाख से अधिक इराकी नागरिक मारे गए।
पेंटागन का बयान
पेंटागन ने कहा कि अमेरिका और उसके गठबंधन साझेदारों ने औपचारिक रूप से “ऑपरेशन इनहेरेंट रिज़ॉल्व” को समाप्त कर दिया है, लेकिन इराकी साझेदारों को प्रशिक्षण और खुफिया सहायता जारी रहेगी। अब इराकी बलों को ही देश की सुरक्षा संभालने और इस्लामिक स्टेट के बचे-खुचे नेटवर्क को दबाए रखने की जिम्मेदारी दी गई है। इराकी प्रधानमंत्री अली फालेह अल-जैदी ने एक बयान में कहा कि गठबंधन मिशन का खत्म होना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई का अंत नहीं है, बल्कि इराक के अपनी सुरक्षा की पूरी जिम्मेदारी खुद संभालने की शुरुआत है।
ईरान और उसके सहयोगियों की जीत?
सद्दाम के पतन के बाद से ईरान ने इराक में अपने प्रॉक्सी समूहों के जरिए लगातार पैर जमाए हैं। हालांकि अमेरिकी सेना की वापसी को आम इराकी जनता का व्यापक समर्थन मिला है, लेकिन कुछ लोगों को डर है कि अमेरिका द्वारा प्रशिक्षित और वित्त पोषित सुरक्षा बल देश की रक्षा करने में सक्षम नहीं होंगे।
सुरक्षा बलों को सलाह देने वाले इराकी विश्लेषक जासिम अल-बहादली के अनुसार, बीते दो दशकों से यही सबक मिला है कि सुरक्षा में खालीपन बेहद खतरनाक साबित हो सकता है। वहीं एक स्कूल शिक्षक आदिल सलमान ने कहा कि इराकियों को इस वापसी का जश्न मनाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए, क्योंकि मिलिशिया अब भी राज्य के नियंत्रण से बाहर सक्रिय हैं और इस्लामिक स्टेट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है।इस साल फरवरी में ट्रम्प द्वारा इजराइल के साथ मिलकर शुरू किए गए “ऑपरेशन एपिक फ्यूरी” के बाद से मारे गए 18 अमेरिकी सैनिकों में से 7 इराक में मारे गए थे। इनमें सबसे आखिरी मौत जुलाई में इरबिल के पास एक ड्रोन को निष्क्रिय करते समय एक आर्मी सार्जेंट की हुई थी।
इस्लामिक स्टेट की वापसी का डर
ईरान, जो पूरे मध्य-पूर्व से अमेरिकी सेना को बाहर निकालने का दावा करता आया है, इस वापसी को अपने “प्रतिरोध की धुरी” वाले सहयोगी सशस्त्र समूहों की बड़ी जीत के रूप में पेश कर रहा है। बगदाद के राजनीतिक विश्लेषक अहमद यूनुस का कहना है कि पश्चिमी सैन्य मौजूदगी के अभाव में ईरान समर्थित समूह और मजबूत हो सकते हैं तथा राज्य की नीतियों और मुख्य संस्थानों में अपनी पकड़ बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं।
कुछ इराकी सुरक्षा अधिकारियों को यह भी डर है कि इससे इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को नई जान मिल सकती है, जो अपने खलीफा के पतन के लगभग एक दशक बाद भी एक स्लीपर सेल नेटवर्क बनाए हुए हैं। गौरतलब है कि 2014 में मोसुल पर कब्जे के दौरान इराकी सेना इस्लामिक स्टेट के आगे टिक नहीं पाई थी और सैनिक वर्दी उतारकर भाग गए थे। रिटायर्ड इराकी जनरल मोहम्मद अल-जुबौरी, जो इस्लामिक स्टेट के खिलाफ युद्ध में एक ब्रिगेड का नेतृत्व कर चुके हैं, ने आगाह किया कि सबसे खतरनाक स्थिति तब बन सकती है जब इस्लामिक स्टेट के पास हथियारबंद ड्रोन आ जाएं, जबकि इराक के पास अभी भी ऐसे खतरों से निपटने के लिए पर्याप्त वायु रक्षा क्षमता नहीं है।

