UP Expressway Tender Controversy: यूपी में 17,000 करोड़ के एक्सप्रेसवे टेंडरों पर सवाल, क्या सरकार को 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव से पहले एक्सप्रेसवे परियोजनाओं को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। राज्य में करीब 17,542 करोड़ रुपये की लागत वाली चार लिंक एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के सात पैकेजों को कैबिनेट की मंजूरी मिलने के बाद टेंडर प्रक्रिया पर सवाल उठाए जा रहे हैं। सोशल मीडिया पर पत्रकार अभिषेक उपाध्याय की ओर से किए गए दावों ने इस मामले को और चर्चा में ला दिया है। आरोप है कि टेंडर प्रक्रिया में संभावित रूप से करीब 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान हो सकता था। हालांकि, इस कथित नुकसान की स्वतंत्र पुष्टि होना अभी बाकी है और इसे साबित हुआ घोटाला मानना उचित नहीं होगा।

मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन परियोजनाओं का क्रियान्वयन उत्तर प्रदेश एक्सप्रेसवेज औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPEIDA) के माध्यम से होना है। दूसरी ओर, टेंडर प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों पर सरकार की तरफ से सफाई भी सामने आई है। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या पूरी प्रक्रिया निर्धारित नियमों और प्रतिस्पर्धी दरों के आधार पर हुई, या फिर टेंडर की शर्तों और कंपनियों की पात्रता की जांच में ऐसे फैसले लिए गए जिनकी स्वतंत्र समीक्षा जरूरी है?

17,542 करोड़ के सात पैकेज, टेंडर प्रक्रिया पर क्यों उठ रहे सवाल?

मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, उत्तर प्रदेश कैबिनेट ने 27 अक्टूबर 2026 को चार लिंक एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के सात पैकेजों के लिए डेवलपर्स के चयन को मंजूरी दी। इनकी कुल अनुमानित लागत 17,542.06 करोड़ रुपये बताई गई है। परियोजनाओं के तहत करीब 322 किलोमीटर लंबाई के एक्सप्रेसवे विकसित किए जाने हैं। इन परियोजनाओं का उद्देश्य प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों को मौजूदा एक्सप्रेसवे नेटवर्क से जोड़ना है। लेकिन विकास की इस बड़ी योजना के बीच टेंडर की दरों, प्रतिस्पर्धा और तकनीकी आधार पर कंपनियों को अयोग्य ठहराए जाने को लेकर सवाल खड़े हो गए हैं।

विवाद का केंद्र यह है कि जब सरकारी परियोजनाओं में हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं, तब क्या सरकार को सबसे प्रतिस्पर्धी दरों पर काम मिल रहा है? क्या सभी पात्र कंपनियों को समान अवसर मिला? और क्या टेंडर के अनुमान तैयार करने से लेकर अंतिम बोली स्वीकार करने तक हर स्तर पर पर्याप्त पारदर्शिता बरती गई?

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय ने क्या दावा किया?

पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया कि सात एक्सप्रेसवे परियोजनाओं के टेंडरों में सरकार को करीब 5,000 करोड़ रुपये का नुकसान होने की आशंका है। उनके दावे के अनुसार, कुछ दूसरी एक्सप्रेसवे परियोजनाओं में अनुमानित लागत से 35 से 40 प्रतिशत तक कम दरों पर काम दिए जाने के उदाहरण हैं, जबकि यूपी में कुछ पैकेजों की बोलियां अनुमानित लागत के बेहद करीब रही हैं।

इस दावे के आधार पर टेंडर प्रक्रिया की तुलना दूसरे राज्यों और दूसरी एजेंसियों की परियोजनाओं से करने की मांग उठ रही है। सवाल यह है कि यदि समान प्रकृति के निर्माण कार्य दूसरे स्थानों पर काफी कम कीमत पर पूरे हो सकते हैं, तो उत्तर प्रदेश में लागत का अंतर क्यों दिखाई दे रहा है?

हालांकि, अलग-अलग एक्सप्रेसवे परियोजनाओं की लागत की तुलना करते समय उनकी लंबाई, जमीन की उपलब्धता, मिट्टी की स्थिति, पुलों और अन्य संरचनाओं, निर्माण मानकों तथा रखरखाव की शर्तों को भी देखना जरूरी है। केवल दो परियोजनाओं की प्रतिशत दरों के अंतर से सरकारी नुकसान की अंतिम गणना नहीं की जा सकती। इसलिए 5,000 करोड़ रुपये के नुकसान के दावे की पुष्टि के लिए विस्तृत लागत अनुमान, मूल टेंडर दस्तावेज, सभी कंपनियों की वित्तीय बोलियां और तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट सामने आना जरूरी है।

यूपीडा की सफाई: टेंडर दरों में पहले से शामिल है 5 प्रतिशत की कटौती

विवाद बढ़ने के बाद अपर मुख्य सचिव दीपक कुमार ने टेंडर प्रक्रिया को लेकर सरकार का पक्ष रखा। उनके मुताबिक, परियोजनाओं की अनुमानित लागत निर्धारित करते समय ही करीब 5 प्रतिशत की कटौती को ध्यान में रखा जाता है। इसलिए टेंडर में दिखाई देने वाली कमी और मूल अनुमान से वास्तविक कुल कमी के बीच अंतर हो सकता है।

सरकारी पक्ष ने उदाहरण देते हुए बताया कि फर्रुखाबाद लिंक एक्सप्रेसवे के पैकेज-1 में दर्ज 2.52 प्रतिशत की कमी को इस आधार पर वास्तविक रूप से 7.52 प्रतिशत बताया गया। इसी तरह पैकेज-2 में दर्ज 0.26 प्रतिशत की कमी को 5.26 प्रतिशत की वास्तविक कमी बताया गया। अन्य पैकेजों में भी सरकार ने लगभग 5.12 प्रतिशत से 9 प्रतिशत तक की कमी का दावा किया है। यह सफाई विवाद के एक महत्वपूर्ण पहलू को सामने लाती है। यदि स्वीकृत अनुमान में पहले से ही संभावित बचत को शामिल किया गया था, तो केवल अंतिम टेंडर दर देखकर यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि सरकार को नुकसान हुआ है।

लेकिन इसके साथ यह सवाल भी जरूरी है कि अनुमान में 5 प्रतिशत की कटौती किस आधार पर की गई थी? क्या यह नियम सभी परियोजनाओं पर समान रूप से लागू हुआ? और क्या बाजार दरों तथा तुलनात्मक परियोजनाओं का आकलन पर्याप्त रूप से किया गया था?

इन सवालों का जवाब संबंधित दस्तावेजों के सार्वजनिक होने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।

कंपनियों को तकनीकी आधार पर बाहर करने का मुद्दा भी चर्चा में

टेंडर विवाद का दूसरा प्रमुख पहलू कंपनियों को तकनीकी आधार पर अयोग्य घोषित किया जाना है। आरोप लगाए गए कि कुछ बोलीदाताओं को प्रक्रिया से बाहर करने के कारण प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है।

इस पर दीपक कुमार ने कहा कि कुल 16 बोलीदाताओं ने प्रक्रिया में हिस्सा लिया था। उनके मुताबिक, किसी कंपनी को अयोग्य घोषित करने के पीछे निर्धारित मानकों को पूरा न करना, जरूरी तथ्य छिपाना या किसी अन्य सरकारी एजेंसी द्वारा प्रतिबंधित किए जाने की जानकारी नहीं देना जैसे कारण हो सकते हैं।

सरकारी पक्ष का कहना है कि शिकायत मिलने पर संबंधित कंपनियों से स्पष्टीकरण मांगा जाता है और नियमों के अनुसार निर्णय लिया जाता है। दीपक कुमार ने यह भी दावा किया कि एक कंपनी की अयोग्यता से जुड़ा मामला हाईकोर्ट तक गया था और अदालत ने संबंधित कार्रवाई को सही ठहराया था।

अब इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि किन कंपनियों को अयोग्य घोषित किया गया, उनके खिलाफ क्या आधार थे, कितनी कंपनियां प्रत्येक पैकेज के लिए प्रतिस्पर्धा में बचीं और वित्तीय बोलियां खोलने से पहले कौन-कौन से मानक लागू किए गए।

यदि नियमों के तहत कंपनियों को बाहर किया गया है, तो विभाग को दस्तावेजों के आधार पर अपनी बात रखने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए। वहीं, यदि किसी स्तर पर नियमों के असमान इस्तेमाल का संदेह है, तो स्वतंत्र जांच से स्थिति साफ की जा सकती है।

डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य के कथित बयान पर भी चर्चा

सोशल मीडिया पर इस पूरे मामले के साथ उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के कथित बयान का भी जिक्र किया जा रहा है। दावा है कि उन्होंने कैबिनेट बैठक में चुनावी साल के दौरान इस तरह के आरोपों को लेकर टिप्पणी की थी।

हालांकि, इस कथित बयान की स्वतंत्र पुष्टि करने वाला आधिकारिक रिकॉर्ड या विश्वसनीय प्रत्यक्ष विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए इसे केशव प्रसाद मौर्य का प्रमाणित बयान मानकर प्रकाशित करना उचित नहीं होगा।

फिर भी, राजनीतिक दृष्टि से मामला इसलिए अहम है क्योंकि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाएं सरकार के विकास संबंधी दावों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ऐसे समय में बड़े टेंडरों पर सवाल उठने से सरकार की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर राजनीतिक बहस तेज होना स्वाभाविक है।

लेकिन चुनावी समय में आरोप लगना और आरोपों का सही साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। इस मामले का आकलन राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के बजाय दस्तावेजों और जांच के नतीजों के आधार पर किया जाना चाहिए।

रिटायरमेंट से पहले टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ाने पर सवाल

इस विवाद में यूपीडा के सीईओ और औद्योगिक विकास आयुक्त दीपक कुमार सिंह की भूमिका को लेकर भी आलोचना की जा रही है। आपके दिए गए विवरण के अनुसार, उनका कार्यकाल समाप्त होने में कुछ ही दिन शेष हैं और आरोप है कि उन्होंने ही इन टेंडरों की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

इस घटनाक्रम के संदर्भ में एक बुनियादी सवाल उठता है कि इतने बड़े वित्तीय प्रभाव वाली परियोजनाओं के फैसलों में संस्थागत जवाबदेही किस तरह सुनिश्चित की गई? क्या सभी तकनीकी और वित्तीय मूल्यांकन पूरे होने के बाद ही प्रस्ताव आगे बढ़ाए गए? क्या संबंधित अधिकारियों ने तुलनात्मक लागत का परीक्षण किया? और क्या अंतिम निर्णय के पीछे पर्याप्त दस्तावेजी आधार मौजूद है?

हालांकि, किसी अधिकारी का रिटायरमेंट नजदीक होना अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है। इसी तरह, टेंडर प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाना भी अपने आप में गलत नहीं माना जा सकता। आलोचना की पुष्टि के लिए यह देखना होगा कि संबंधित अधिकारी ने किस स्तर पर क्या निर्णय लिया और क्या वह निर्धारित नियमों के अनुरूप था।

इसलिए दीपक कुमार सिंह की भूमिका पर उठे सवालों का जवाब अनुमान या आरोपों से नहीं, बल्कि फाइलों, अनुमोदन प्रक्रिया, वित्तीय मूल्यांकन और संबंधित अधिकारियों के आधिकारिक पक्ष से मिलना चाहिए।

जांच में किन पांच बिंदुओं पर स्पष्टता जरूरी?

  1. लागत का तुलनात्मक आकलन: सातों पैकेजों के अनुमानित खर्च की तुलना समान प्रकृति की दूसरी एक्सप्रेसवे परियोजनाओं से की जाए।

  2. टेंडर की प्रतिस्पर्धा: प्रत्येक पैकेज में कितनी कंपनियों ने बोली लगाई और कितनी तकनीकी रूप से पात्र पाई गईं, इसका पूरा विवरण सामने आए।

  3. कंपनियों की अयोग्यता: जिन कंपनियों को बाहर किया गया, उनके संबंध में दर्ज कारण और मूल्यांकन का आधार स्पष्ट किया जाए।

  4. स्वीकृत अनुमान का आधार: पहले से शामिल 5 प्रतिशत की कटौती की गणना और उसके समर्थन में मौजूद दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं।

  5. जवाबदेही तय हो: यदि स्वतंत्र जांच में नियमों के उल्लंघन या सरकारी धन को नुकसान पहुंचाने के प्रमाण मिलते हैं, तो जिम्मेदारी निर्धारित कर नियमानुसार कार्रवाई की जाए।

निष्कर्ष: विकास की परियोजना या टेंडर प्रक्रिया की अग्निपरीक्षा?

उत्तर प्रदेश में एक्सप्रेसवे नेटवर्क का विस्तार प्रदेश की कनेक्टिविटी, औद्योगिक निवेश और क्षेत्रीय विकास के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। लेकिन हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं में विकास की गति के साथ वित्तीय पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है।

एक ओर पत्रकार अभिषेक उपाध्याय के दावे हैं, जिनमें करीब 5,000 करोड़ रुपये के संभावित नुकसान का सवाल उठाया गया है। दूसरी ओर यूपीडा का पक्ष है कि अनुमानित लागत में पहले से कटौती शामिल थी और टेंडर नियमों के अनुसार पारदर्शी ई-टेंडरिंग प्रक्रिया से किए गए।अब जरूरत आरोपों और सफाई के बीच राजनीतिक बहस बढ़ाने की नहीं, बल्कि तथ्यों की जांच करने की है। यदि प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के अनुसार हुई है, तो विस्तृत दस्तावेज उसे साबित कर सकते हैं। और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है, तो स्वतंत्र जांच से जिम्मेदारी तय होनी चाहिए।

 

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