Tamil Nadu ‘Identity’ Politics: LTTE फाउंडर प्रभाकरन को श्रद्धांजलि, श्रीलंकाई तमिलों के साथ एकजुटता संकल्प

विजय का नियो-द्रविड़ियन संश्लेषण: प्रभाकरण की याद और तमिल गौरव

तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय ने प्रभाकरण की मृत्यु तिथि (मुल्लिवैक्कल दिवस) पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा, “हम मुल्लिवैक्कल की यादों को अपने दिल में संजोए रखेंगे।” उन्होंने ईलम तमिलों को “नाभि से जुड़े रिश्तेदार” करार दिया और प्रभाकरण को “मां जैसा स्नेह” देने वाला नेता बताया। यह पहली बार नहीं है। 2008 में श्रीलंका के सैन्य अभियान के दौरान विजय ने चेन्नई में भूख हड़ताल की थी और कहा था, “हम बाघ के शावक हैं।” टीवीके के कार्यक्रमों में प्रभाकरण के चित्र भी दिखाई दिए हैं।

विश्लेषकों के अनुसार, विजय पारंपरिक द्रविड़ियन राजनीति (सामाजिक न्याय, कल्याणकारी योजनाएं, जातिवाद-विरोध) को तमिल राष्ट्रवाद (सांस्कृतिक गौरव, भाषाई पहचान, ट्रांसनेशनल तमिल एकजुटता) के साथ जोड़ रहे हैं। उन्होंने खुद कहा है कि “द्रविड़ियनवाद और तमिल राष्ट्रवाद इस धरती की दो आंखें हैं।” टीवीके का झंडा लाल-पीले रंगों, युद्ध के हाथियों और वगई फूल से सजा है, जो तमिल सभ्यता की मार्शल परंपरा को दर्शाता है। पार्टी के प्रतीकों में पेरियार, अंबेडकर, कमराज, वेलु नाचियार जैसे चेहरे शामिल हैं।  यह रणनीति युवा मतदाताओं को आकर्षित कर रही है, जो पुरानी द्रविड़ियन पार्टियों (डीएमके-एआईएडीएमके) की भ्रष्टाचार और वंशवाद वाली छवि से ऊब चुके हैं। नाम तमिलर काची (एनटीके) जैसे सख्त तमिल राष्ट्रवादी दलों से भी टीवीके की ओर कैडर शिफ्ट हो रहा है। हालांकि, प्रभाकरण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर भारत सरकार की एलटीटीई पर पाबंदी को देखते हुए यह दृष्टिकोण विवादास्पद भी है। विजय इसे अलगाववाद नहीं, बल्कि तमिल गरिमा और पीड़ा की अभिव्यक्ति बताते हैं।

अमित शाह का बस्तर दौरा: भय से स्थिरता तक की यात्रा

इसी दिन, गृह मंत्री अमित शाह ने बस्तर (छत्तीसगढ़) से घोषणा की, “गर्व के साथ कह रहा हूं, भारत अब नक्सल-मुक्त है।” 31 मार्च 2026 की समय-सीमा से पहले यह उपलब्धि हासिल हुई। बस्तर, जो दशकों तक नक्सलवाद का पर्याय था, अब विकास का प्रतीक बन रहा है। 2010 के घातक हमले (76 CRPF जवानों की शहादत) की यादें अभी ताजा हैं, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। सरकार के आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में सैकड़ों नक्सली मारे गए, हजारों ने सरेंडर किया। सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ सड़कें, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं बढ़ाई गईं। शाह ने बस्तर में सुरक्षा शिविरों को ‘जन सेवा केंद्रों’ में बदलने की घोषणा की, जहां कल्याणकारी योजनाएं, आधार और बैंकिंग सेवाएं दी जाएंगी। उन्होंने केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद की बैठक भी बस्तर में बुलाई, जो सामान्यतः राजधानियों में होती है। इसका मकसद स्पष्ट है—बस्तर को निवेश और विकास के लिए आकर्षक बनाना। बस्तर के 14 लाख से अधिक निवासियों के लिए यह “सच्ची आजादी” का दिन है। अमित शाह ने कहा कि 1947 में देश आजाद हुआ, लेकिन बस्तर को असली स्वतंत्रता अब मिली है।

दोनों घटनाओं का व्यापक संदर्भ

ये दो घटनाएं भौगोलिक और विषयगत रूप से अलग हैं, लेकिन दोनों ही भारत की विविधता को दर्शाती हैं। तमिलनाडु में सांस्कृतिक-भावनात्मक राष्ट्रवाद को मुख्यधारा की कल्याणकारी राजनीति के साथ जोड़ने की कोशिश हो रही है, तो छत्तीसगढ़ में सुरक्षा सफलता को विकास से जोड़ा जा रहा है। दोनों ही मामलों में पुरानी समस्याओं (विभाजनकारी पहचान या हिंसा) से आगे निकलकर नई पीढ़ी और नई आकांक्षाओं को संबोधित करने का प्रयास दिखता है। विजय का प्रयोग टीवीके की संगठनात्मक मजबूती और शासन प्रदर्शन पर निर्भर करेगा, जबकि बस्तर में अब निवेश, रोजगार और मुख्यधारा में शामिल करने की चुनौती बाकी है। देश इन दोनों प्रयोगों को करीब से देख रहा है।

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