नोएडा में स्मार्ट मीटर का दर्द: बिल पैमेंट करते है, भटकते है, अफसरों का गुस्सा झेलते है लेकिन समस्या जस की तस, फोनरवा जैसे संगठन कर रहे खानापूर्ति

Noida PrePaid Smart Meter News:  नोएडा को उत्तर प्रदेश का सबसे आधुनिक और हाईटेक शहर माना जाता है। मल्टीनेशनल कंपनियां, आईटी हब, चमचमाते सेक्टर — लेकिन इसी शहर का आम बिजली उपभोक्ता आज एक ऐसी व्यवस्था के सामने असहाय खड़ा है जिसने उसके घर की बत्ती तो नहीं बुझाई, मगर जेब जरूर खाली कर दी। स्मार्ट प्रीपेड मीटर — जो “राहत” देने आया था — नोएडा के लाखों उपभोक्ताओं के लिए डिजिटल जंजाल बन चुका है।

बिल दोगुना, समस्या दोगुनी

नोएडा के सेक्टर-34 के 30 वर्षीय निवासी प्रदीप कुमार ने अगस्त 2025 में अपने घर पर स्मार्ट मीटर लगवाया था। उन्हें विश्वास था कि जब मीटर “स्मार्ट” है और सब कुछ डिजिटल होता जा रहा है तो बिजली विभाग के दफ्तरों के चक्कर कम होंगे। लेकिन अगले ही महीने से उनके बिजली बिल में भारी बढ़ोतरी होने लगी। पहले मासिक बिल 3,000 से 4,000 रुपये के बीच आता था, मगर अचानक यह बढ़कर 7,000 से 8,000 रुपये हो गया।  उन्होंने नोएडा के कई बिजली दफ्तरों के चक्कर लगाए और स्थानीय स्तर के साथ-साथ लखनऊ के अधिकारियों को भी ईमेल भेजे। उनका कहना है — “उन्होंने मुझे इधर-उधर भटकाते रखा, जबकि मेरा घर अंधेरे में डूबा रहा।” यह सिर्फ प्रदीप की कहानी नहीं है। नोएडा के सेक्टर 34 से लेकर सेक्टर 82 तक, हजारों उपभोक्ता इसी दर्द को महसूस कर रहे हैं।

रिचार्ज के बाद भी बिजली गुल, सर्वर ने धोखा दिया

बैठकों में उपभोक्ताओं ने यह भी बताया कि प्रीपेड स्मार्ट मीटर प्रणाली लागू होने के बाद तकनीकी खामियों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। सबसे बड़ी शिकायत यह रही कि नोएडा और गाजियाबाद में कई उपभोक्ताओं ने रिचार्ज करने के बाद भी बैलेंस अपडेट नहीं होने और खाते में राशि माइनस ही दिखाई देने की बात कही। इसके अलावा सर्वर से जुड़ी दिक्कतें और बिजली आपूर्ति का अचानक बंद हो जाना भी प्रमुख मुद्दे रहे। सर्वर डाउन होने के कारण सेक्टर के उपभोक्ता न तो अपना बैलेंस चेक कर पा रहे हैं और न ही मीटर रिचार्ज कर पा रहे हैं। बिल संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए सेक्टर-18 जाने के बाद भी उनकी समस्याओं का समाधान नहीं हो पा रहा।

1912 हेल्पलाइन — नाम का, काम का नहीं

सेक्टर-82 के RWA अध्यक्ष राघवेंद्र दुबे ने उजागर किया कि बिजली विभाग का हेल्पलाइन नंबर 1912 अक्सर व्यस्त रहता है या कॉल उठाने में लापरवाही बरती जाती है। कई बार शिकायत दर्ज कराने के बावजूद बिना समस्या का समाधान किए ही “निस्तारण” का फर्जी मैसेज भेज दिया जाता है, जिससे लोगों में भारी नाराजगी है। यानी शिकायत दर्ज होती है, “हल हुआ” का मैसेज भी आता है — लेकिन समस्या वहीं की वहीं रहती है। इससे बड़ा मजाक और क्या हो सकता है?

फोनरवा और RWA: बैठकें कई, नतीजा शून्य

नोएडा में फेडरेशन ऑफ रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन (फोनरवा) और तमाम सेक्टरों की RWA बिजली विभाग के दरवाजे पर बार-बार दस्तक दे रही हैं। फोनरवा अध्यक्ष योगेंद्र शर्मा, महासचिव केके जैन सहित अनेक RWA प्रतिनिधि UPPCL के मुख्य अभियंता संजय जैन के साथ बैठकें करते आए हैं। बैठक के बाद उम्मीद जताई जाती है कि स्मार्ट मीटर की समस्याओं का जल्द समाधान होगा। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिजली दफ्तरों में भारी भीड़ है, जहां लोग अपनी शिकायतें लेकर लंबी कतारों में लगे इंतजार करते हैं। कभी-कभी RWA के अध्यक्ष अधिकारियों के साथ सामूहिक बैठकें करने के लिए दफ्तरों का दौरा करते हैं। मगर ये बैठकें तस्वीरों तक सीमित होकर रह जाती हैं — अखबारों में बयान छपते हैं, सोशल मीडिया पर पोस्ट होती हैं, और उपभोक्ता अगले महीने फिर उसी भारी बिल के साथ अकेला खड़ा मिलता है। फोनरवा ऊर्जा मंत्री तक भी पहुंची। मंत्री ने मांगों को गंभीरता से सुना और आश्वस्त किया कि विद्युत इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत किया जाएगा, तकनीकी खामियां दूर की जाएंगी और उपभोक्ताओं की शिकायतों के निस्तारण के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएंगे। यह आश्वासन कब अमल में आएगा, इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

अधिकारी देते हैं आश्वासन, उपभोक्ता करते हैं इंतजार

UPPCL के अधिशासी अभियंता मोहित दीक्षित ने बैठक में कहा कि नकारात्मक बैलेंस पर 2000 रुपये तक छूट देने की योजना पर कार्य किया जा रहा है। साथ ही स्मार्ट मीटर की समस्याओं के समाधान के लिए जल्द ही RWA के सहयोग से एक कैंप का आयोजन किया जाएगा। लेकिन उपभोक्ता पूछते हैं — यह कैंप कब लगेगा? इस बीच उनका बिल हर महीने कटता जा रहा है।

जिम्मेदार कौन?

नोएडा जैसे शहर में जहां पढ़े-लिखे, तकनीक-जानकार लोग रहते हैं — वहां भी अगर स्मार्ट मीटर की समस्या इतनी गहरी है, तो प्रदेश के बाकी हिस्सों का हाल समझा जा सकता है। समस्या यह नहीं है कि तकनीक खराब है। समस्या यह है कि जो संगठन उपभोक्ताओं के लिए लड़ने का दावा करते हैं, वे अफसरों से मिलकर फोटो खिंचाने के बाद चुप हो जाते हैं। जो अधिकारी जवाब देने के लिए बैठे हैं, वे “जल्द समाधान होगा” कहकर कई महीनों से समय काट रहे हैं। और जो सरकार है — वह इस पूरे तंत्र को देख रही है, मगर सुन नहीं रही। जब तक उपभोक्ता खुद संगठित होकर, लिखित शिकायतों के जरिए और नियामक मंचों का सहारा लेकर अपनी लड़ाई नहीं लड़ेंगे — तब तक न अफसर जागेंगे, न संगठन, न सरकार।

 

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