Tata Sons News: क्या फिर गहराया टाटा ग्रुप का उत्तराधिकार संकट? चंद्रशेखरन के इस्तीफे से उठे सवाल

Tata Sons News: नई दिल्ली/मुंबई। भारत के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित कारोबारी समूह टाटा में फिर से नेतृत्व संकट गहरा गया है। टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने पिछले सप्ताह यह घोषणा की कि वे फरवरी 2027 में अपना मौजूदा कार्यकाल खत्म होने पर तीसरी बार नियुक्ति नहीं लेंगे। इस फैसले ने न सिर्फ टाटा समूह के अंदर गवर्नेंस और मालिकाना हक बनाम प्रबंधन के रिश्ते को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं, बल्कि पूरे इंडिया इंक में उत्तराधिकार योजना की पुरानी बहस को फिर से जिंदा कर दिया है।

चंद्रशेखरन ने टाटा संस बोर्ड को पत्र लिखकर साफ कर दिया कि फरवरी 2026 की बोर्ड बैठक में उनके तीसरे पांच साल के कार्यकाल का प्रस्ताव एक सदस्य के विरोध के कारण सर्वसम्मति से पास नहीं हो सका। छह महीने तक फैसला अधर में लटका रहने के बाद उन्होंने खुद ही पद छोड़ने का फैसला लिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने एयर इंडिया के बढ़ते नुकसान, डिजिटल व्यवसायों में पूंजी निवेश और सेमीकंडक्टर जैसे लंबी अवधि के प्रोजेक्ट्स पर चिंता जताई थी।

टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं, अब उत्तराधिकारी की सिफारिश के लिए चयन समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने संकल्प पारित कर समिति गठन की प्रक्रिया तेज करने को कहा है, हालांकि सर रतन टाटा ट्रस्ट पर महाराष्ट्र चैरिटी कमिश्नर के कुछ प्रतिबंधों के कारण प्रक्रिया में कानूनी अड़चनें भी बनी हुई हैं।

यह घटनाक्रम 2016 में साइरस मिस्त्री के अपदस्थ होने की याद दिलाता है। तब भी रतन टाटा और ट्रस्ट्स के साथ मतभेदों के कारण नेतृत्व परिवर्तन हुआ था। रतन टाटा के अक्टूबर 2024 में निधन के बाद नोएल टाटा ट्रस्ट्स के प्रमुख बने और समूह में सहमति का पुराना ढांचा टूटता नजर आया। चंद्रशेखरन और नोएल टाटा दोनों ने अलग-अलग सरकार के वरिष्ठ अधिकारियों को समूह के अंदरूनी मतभेदों की जानकारी भी दी थी।

इंडिया इंक में उत्तराधिकार की अलग-अलग राहें

रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, टाटा संकट ने निवेशकों के लिए उत्तराधिकार योजना को चिंता की सूची में ऊपर पहुंचा दिया है। रिलायंस, अडानी और बिड़ला जैसे समूह परिवार के अंदर ही सत्ता हस्तांतरण की तैयारी कर रहे हैं। मुकेश अंबानी अपने तीन बच्चों को बोर्ड और विभिन्न व्यवसायों में नेतृत्व दे चुके हैं। अडानी 2030 के दशक की शुरुआत में चार वारिसों को नियंत्रण सौंपने की योजना बना रहे हैं, जबकि बिड़ला समूह में कुमार मंगलम बिड़ला ने पेशेवर प्रबंधकों के साथ परिवार की परंपरा को आगे बढ़ाया है।

टाटा का मामला अलग है। यहां मालिकाना हक मुख्य रूप से परोपकारी ट्रस्ट्स के पास है, जबकि व्यवसायों का संचालन पेशेवर प्रबंधक करते हैं। यही वजह है कि उत्तराधिकार का सवाल सिर्फ एक व्यक्ति के चयन तक सीमित नहीं, बल्कि बोर्ड की स्वतंत्रता, प्रबंधकों की स्वायत्तता और स्पष्ट संक्रमण प्रक्रिया से जुड़ा है। विशेषज्ञों का कहना है कि सुचारू, नामित और योजनाबद्ध संक्रमण जरूरी है।

आगे की चुनौतियां

अगले चेयरमैन को एयर इंडिया के नुकसान, टाटा डिजिटल और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे पूंजी-intensive व्यवसायों, संभावित लिस्टिंग के दबाव और समूह के रणनीतिक दांव संभालने होंगे। शुरुआती नामों में टाटा स्टील के टी.वी. नरेंद्रन, टाटा पावर के प्रवीर सिन्हा समेत कई वरिष्ठ अधिकारियों और परिवार के सदस्यों का जिक्र हो रहा है। नोएल टाटा की भूमिका निर्णायक मानी जा रही है। टाटा समूह का यह संकट सिर्फ एक कारोबारी घराने का आंतरिक मामला नहीं। यह सवाल उठाता है कि क्या भारतीय पूंजीवाद परिवार आधारित नियंत्रण से संस्थागत नेतृत्व की ओर परिपक्व हो रहा है। निवेशक और बाजार दोनों अगले कुछ महीनों में टाटा संस की उत्तराधिकार प्रक्रिया पर नजर रखे हुए हैं।
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