मुंबई 26/11 आतंकी हमले के प्रमुख साजिशकर्ता तहव्वुर हुसैन राणा का 4 मई को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), दिल्ली में हर्निया का सफल ऑपरेशन हुआ। ऑपरेशन के बाद उसे तिहाड़ जेल वापस भेज दिया गया। यह घटना राजनीतिक, सामाजिक और सोशल मीडिया पर तीखी बहस का केंद्र बन गई है। सवाल उठ रहा है कि क्या 26/11 जैसे हमले के मास्टरमाइंड को देश के शीर्ष सरकारी अस्पताल में करदाताओं के पैसे से उन्नत चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना उचित है। तहव्वुर राणा (65 वर्षीय), पाकिस्तानी सेना के पूर्व डॉक्टर और लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े, 2008 के मुंबई हमलों में डेविड कोलमैन हेडली के साथ साजिश में सक्रिय भूमिका के लिए अमेरिका से अप्रैल 2025 में भारत प्रत्यर्पित किए गए थे। वे तिहाड़ जेल में कैदी नंबर 1784 के रूप में हाई-रिस्क वार्ड में बंद हैं और एनआईए के यूएपीए मामले का सामना कर रहे हैं।
ऑपरेशन की पृष्ठभूमि और सुरक्षा व्यवस्था
अदालती अनुमति के बाद राणा पिछले एक महीने में पांच बार एम्स के आउटपेशेंट विभाग में जांच करवा चुके थे (31 मार्च, 6 अप्रैल, 7 अप्रैल, 20 अप्रैल और 21 अप्रैल)। डॉक्टरों ने हर्निया सर्जरी अनिवार्य बताई। 4 मई को सुबह भर्ती कराए गए राणा का ऑपरेशन सफल रहा। दिल्ली पुलिस की न्यायिक अभिरक्षा वाहिनी (NAV), दक्षिण जिला पुलिस और तिहाड़ सुरक्षा टीम की भारी तैनाती के बीच पूरी प्रक्रिया हुई। एम्स के अलावा कार्डियोलॉजी, जनरल मेडिसिन और नेफ्रोलॉजी विभागों में भी उनकी जांच हुई थी। उम्र से जुड़ी हृदय संबंधी समस्याएं और हाई ब्लड प्रेशर उनकी स्वास्थ्य समस्याओं में शामिल बताए जाते हैं। जेल प्रशासन ने उन्हें 24×7 सुसाइड वॉच पर रखा हुआ है।
सोशल मीडिया और आम जनता की प्रतिक्रियाएं
सोशल मीडिया (विशेषकर एक्स/ट्विटर) पर इस खबर ने तूफान मचा दिया है। कई यूजर्स ने इसे “करदाताओं का अपमान” बताया। एक वायरल पोस्ट में लिखा गया, “जिसके इशारे पर 166 निर्दोष मारे गए, उसे एम्स की लग्जरी सुविधा? सामान्य नागरिक महीनों वेटिंग करते हैं।” पीड़ित परिवारों ने भी आक्रोश जताया है। 26/11 प्रभावितों के प्रतिनिधियों का कहना है कि राणा के लिए यह “सुविधाजनक जीवन” उनके दर्द को बढ़ाता है। कई ने फांसी की सजा की मांग दोहराई और पूछा कि क्या आतंकी को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। दूसरी ओर, कुछ यूजर्स और ह्यूमन राइट्स समूहों ने कानूनी पक्ष रखा। उनका तर्क है कि भारतीय कानून और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के तहत हिरासत में किसी भी व्यक्ति को आवश्यक चिकित्सा से वंचित नहीं किया जा सकता। “अगर इलाज न दिया जाता तो विश्व मीडिया भारत पर अमानवीयता का आरोप लगाता,” एक कमेंट में कहा गया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
विपक्षी दलों के नेताओं ने इसे “संवेदनहीन तरजीह” करार दिया। उन्होंने संसद में सवाल उठाते हुए पूछा कि आम नागरिकों की वेटिंग लिस्ट लंबी होने के बावजूद आरोपी को तुरंत सुविधा क्यों? संसद में इस मुद्दे पर चर्चा की मांग की गई है। सत्तापक्ष और कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि सरकार ने केवल अदालती आदेशों का पालन किया। वरिष्ठ वकीलों ने कहा कि चिकित्सा निर्णय डॉक्टरों का है, न कि राजनीति का। उज्ज्वल निकम जैसे नामों ने राणा के प्रत्यर्पण को “भारत की बड़ी जीत” बताया, लेकिन आगे की प्रक्रिया को मानवाधिकार दायरे में रखने की जरूरत पर जोर दिया।
व्यापक संदर्भ और उप-मुद्दे
राणा के इलाज पर सुरक्षा व्यय भी बहस का विषय है। हाई-लेवल सुरक्षा, एस्कॉर्ट और जेल की विशेष व्यवस्था (अलग कुक, CCTV, अलग वार्ड) का खर्च करदाताओं पर पड़ता है, जबकि कई सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं की कमी है। 26/11 हमले में 166 से ज्यादा लोग मारे गए थे और सैकड़ों घायल हुए। राणा पर आरोप है कि उन्होंने हेडली के साथ मिलकर रेकी और लॉजिस्टिक सपोर्ट दिया। प्रत्यर्पण के समय उन्होंने 33 स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देकर विरोध किया था, लेकिन अब भारत में इलाज हो रहा है। यह मामला न्याय, मानवाधिकार और राष्ट्रीय संवेदनाओं के बीच संतुलन का जटिल सवाल उठाता है। जबकि कानून सभी को बुनियादी स्वास्थ्य अधिकार देता है, पीड़ित परिवारों की भावनाएं और सार्वजनिक आक्रोश को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एनआईए की जांच जारी है और राणा पर मुकदमा चल रहा है। आगे की सुनवाई में इस मुद्दे पर और स्पष्टता आ सकती है।

