जौहर बनाम रेप: रेप और जौहर की तुलना कितनी सही? समझिए इतिहास और तर्क का फर्क

जौहर बनाम रेप: रेप जबरन थोपा जाता है, जौहर एक विवश चुनाव था — स्वरा भास्कर की तुलना में चूक कहां?

बॉलीवुड अभिनेत्री स्वरा भास्कर एक बार फिर 2018 की फिल्म ‘पद्मावत’ को लेकर चर्चा में हैं। फिल्म रिलीज़ होने के समय उन्होंने निर्देशक संजय लीला भंसाली को एक खुला पत्र लिखा था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया था कि फिल्म जौहर का महिमामंडन करती है और साथ ही उन महिलाओं का अपमान करती है जो यौन हिंसा के बाद जीवित रहने का चुनाव करती हैं। उस पत्र का एक हिस्सा उस समय खूब वायरल हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें लगा कि महिलाओं के दशकों के संघर्ष से मिले अधिकार जैसे वोट का अधिकार, संपत्ति का अधिकार, शिक्षा, समान वेतन और विशाखा जजमेंट सब बेमानी हो गए, क्योंकि बात फिर वहीं आ गई जहां से शुरू हुई थी।

हाल ही में स्वरा ने अपने उसी पुराने पत्र को दोबारा सामने रखते हुए इस बहस को फिर हवा दी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि उनका मकसद रानी पद्मावती या जौहर करने वाली महिलाओं को “कायर” कहना नहीं था, बल्कि उनकी चिंता यह थी कि फिल्म का ट्रीटमेंट किसी रेप सर्वाइवर को यह संदेश दे सकता है कि “सम्मानजनक” या “बहादुर” होने का मतलब यौन हिंसा के बाद आत्महत्या कर लेना है। लेकिन क्या जौहर वाला दृश्य वाकई यही कह रहा है? आलोचकों का तर्क है कि यह दो बिल्कुल अलग स्थितियों की तुलना है। एक तरफ रेप है एक ऐसा अपराध जो किसी महिला पर जबरन थोपा जाता है, जिसमें उसकी न कोई सहमति होती है, न पूर्वानुमान। दूसरी तरफ, पद्मावत में दिखाया गया जौहर एक ऐसी स्थिति है जहां राज्य की हार के बाद महिलाएं आसन्न बंदी, दासता और यौन हिंसा की आशंका के बीच मृत्यु को चुनती हैं।

आलोचकों का कहना है कि इस चुनाव को दुखद या भयावह कहा जा सकता है, इस सामाजिक व्यवस्था पर सवाल उठाया जा सकता है जिसने महिलाओं को ऐसी असंभव स्थिति में डाला लेकिन इसे रेप सर्वाइवर के अनुभव के समान नैतिक खांचे में रखना तार्किक रूप से गलत है। रेप में महिला के पास कोई विकल्प नहीं होता, जबकि जौहर की कहानी में महिलाओं को (फिल्म के नैरेटिव के भीतर) आसन्न संकट का सामना करते हुए एक चुनाव करते दिखाया गया है। आलोचना यह भी है कि किसी प्रथा को दिखाना उसका समर्थन करने के बराबर नहीं होता। फिल्में अक्सर युद्ध, दासता, यातना और यौन हिंसा को बिना उनका अनुमोदन किए दिखाती हैं। असली सवाल यह होना चाहिए कि किसी घटना को कैसे दिखाया गया है, उसके इर्द-गिर्द किस तरह का संदर्भ है, और फिल्म आखिरकार क्या संदेश देती है।

इस बहस से जुड़ा एक और अहम सवाल यह भी उठता है कि आखिर राज्यों के पतन के समय महिलाओं के पास इतने कम विकल्प क्यों थे, और महिला की देह को समुदाय के “सम्मान” का प्रतीक क्यों बना दिया गया — यह सवाल जौहर को केवल “प्रतिगामी” करार देकर आगे बढ़ जाने से कहीं अधिक असहज और ज़रूरी है। निष्कर्ष के तौर पर तर्क यह है कि रेप के बाद महिला का जीवन खत्म नहीं होता, उसकी गरिमा नष्ट नहीं होती — यह सच्चाई अपनी जगह कायम है। लेकिन इस सच को बचाने के लिए यह मान लेना ज़रूरी नहीं कि मध्यकालीन युद्ध में बंदी और यौन हिंसा की आशंका से जूझ रही महिला का चुनाव आज के रेप सर्वाइवर के अनुभव जैसा ही था।

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