खरीफ बुवाई में 23% की गिरावट: जून में मानसून की कमी से किसानों की चिंता बढ़ी

बारिश की देरी से धान, दलहन, तिलहन और कपास की बुवाई पिछड़ी, सरकार ने 200 से ज़्यादा जिलों को किया अलर्ट

देश में खरीफ फसलों की बुवाई इस साल पिछले साल के मुकाबले काफी पीछे चल रही है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के ताज़ा आंकड़ों के मुताबिक, जून में दक्षिण-पश्चिम मानसून के कमजोर रहने और बारिश में बड़े अंतराल के चलते बुवाई की रफ्तार थम-सी गई है। सबसे ज़्यादा असर धान, दलहन, तिलहन और कपास जैसी अहम फसलों पर पड़ा है, जो किसानों की आमदनी और देश की खाद्य सुरक्षा दोनों के लिहाज़ से महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।

मौसम विशेषज्ञों के अनुसार इस साल मानसून पर अल नीनो का साया मंडरा रहा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग ने अपने सीज़न के अनुमान को घटाकर दीर्घकालिक औसत के लगभग 90 प्रतिशत तक कर दिया है, जो सामान्य से कम बारिश की श्रेणी में आता है। जून के मध्य तक देश भर में बारिश की कमी काफी गंभीर रही। जून के अंत तक के आंकड़ों से पता चला कि देश में सीज़न-दर-सीज़न बारिश सामान्य से करीब 41 से 46 प्रतिशत तक कम दर्ज की गई। 

कपास और दलहन की बुवाई में सबसे तेज़ गिरावट

कृषि मंत्रालय द्वारा 12 जून तक जारी आंकड़ों के अनुसार, देश में कुल 84.6 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में खरीफ फसलों की बुवाई हुई, जो पिछले साल की समान अवधि के मुकाबले 3.9 प्रतिशत कम है। हालांकि कुल बुवाई में गिरावट अभी सीमित दिख रही है, लेकिन फसलवार आंकड़े चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। कपास की बुवाई में सबसे तेज़ 27.8 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई और इसका रकबा घटकर 9.53 लाख हेक्टेयर रह गया, जबकि पिछले साल यह 13.19 लाख हेक्टेयर था। दलहन की स्थिति और भी खराब है दलहन की बुवाई में करीब 43 प्रतिशत की भारी कमी आई है और रकबा घटकर 1.55 लाख हेक्टेयर रह गया, जिसमें मूंग की बुवाई में सबसे तेज़ गिरावट देखी गई।  इसके उलट धान की बुवाई ने राहत दी है, जिसमें मानसून के कुछ क्षेत्रों में जल्दी पहुंचने से बढ़ोतरी दर्ज हुई।

किसानों के सामने दोहरी मुसीबत

जमीनी स्तर पर हालात और भी मुश्किल हैं। महाराष्ट्र के नासिक जिले के एक किसान ने बताया कि जुलाई की शुरुआत तक उनके गांव में बारिश ही नहीं हुई थी, जिसके चलते वे मक्का के बजाय कम पानी वाली बाजरा फसल पर विचार कर रहे हैं, लेकिन बहुत से किसान एक साथ ऐसा करने से बाज़ार भाव को लेकर अनिश्चित हैं। किसानों का कहना है कि बीज, खाद और कीटनाशक की बढ़ती महंगाई के बीच मौसम और बाज़ार दोनों ही साथ नहीं दे रहे। कर्नाटक के तटीय इलाकों में भी हालात गंभीर बने हुए हैं। मध्य जून तक संचयी बारिश में कई तालुकों में 20 से 35 प्रतिशत तक की कमी दर्ज की गई है। स्थानीय मौसम विशेषज्ञों का कहना है कि मानसून की रफ्तार सामान्य से कमजोर है और लंबे सूखे दौर के बीच कभी-कभार तेज़ बारिश हो रही है, जो खरीफ की धान खेती के लिए नुकसानदेह साबित हो रही है।

सरकार ने 315 जिलों को किया सतर्क

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार सक्रिय हुई है। कृषि मंत्रालय ने बारिश की कमी के लिहाज़ से संवेदनशील 315 जिलों की पहचान की है, जिनमें कम सिंचाई सुविधा वाले 111 उच्च-प्राथमिकता वाले जिले शामिल हैं। इनमें महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से बार-बार चिन्हित किए गए हैं। इन जिलों में कृषि विभाग ने एहतियाती उपाय और वैकल्पिक योजनाएं तैयार करनी शुरू कर दी हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर जुलाई और अगस्त में मानसून रफ्तार पकड़ता है, तो बुवाई के आंकड़े सुधर सकते हैं जैसा कि पिछले वर्षों में भी देखा गया है, जब शुरुआती देरी के बावजूद जून के अंत तक स्थिति में सुधार आया था। लेकिन फिलहाल असमान और देर से हो रही बारिश ने रबी सीज़न की तर्ज़ पर खरीफ की बुवाई पैटर्न को भी प्रभावित किया है, जिसका सीधा असर आने वाले महीनों में खाद्य महंगाई और ग्रामीण आय पर पड़ सकता है।

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