नई दिल्ली: भारत-ब्रिटेन मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के लागू होने के महज तीन महीने बाद ही पहला बड़ा विवाद सामने आ गया है। शराब कंपनियों Diageo और Pernod Ricard पर बल्क स्कॉच व्हिस्की आयात को लेकर चल रही जांच को इंडस्ट्री ट्रेड ग्रुप ने समझौते के फायदों को कमजोर करने वाला कदम बताया है। इंटरनेशनल स्पिरिट्स एंड वाइन्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (ISWAI) ने वाणिज्य मंत्री को लिखे पत्र में कहा है कि बल्क स्कॉच कॉन्सेंट्रेट को कम टैरिफ से बाहर रखने का कदम “व्यवहार में भारत और यूनाइटेड किंगडम के बीच तय किए गए महत्वपूर्ण बाजार पहुंच लाभ को कमजोर करने का जोखिम पैदा करता है।”
जुलाई 15, 2026 को लागू हुए समझौते के तहत भारत ने कुछ स्कॉच आयात पर आयात शुल्क 150 प्रतिशत से घटाकर तुरंत 75 प्रतिशत कर दिया था। अगले 10 साल में इसे और घटाकर 40 प्रतिशत करने का प्रावधान है। ब्रिटिश सरकार ने इसे “आइकॉनिक यूके प्रोडक्ट्स” जैसे व्हिस्की के लिए बड़ा फायदा बताया था। हालांकि भारतीय जांच एजेंसियों (DRI) का रुख है कि यह रियायत बल्क स्कॉच कॉन्सेंट्रेट पर लागू नहीं होती। ये कॉन्सेंट्रेट कंटेनर में आते हैं और भारत में ब्लेंड करके रॉयल स्टैग, ब्लेंडर्स प्राइड और मैकडॉवेल्स जैसे ब्रांड बनाए जाते हैं। अधिकारियों ने कंपनियों को निजी तौर पर बताया है कि ऐसे आयात पर अभी भी 150 प्रतिशत ड्यूटी लगेगी।
अक्टूबर में DRI ने Pernod Ricard के दिल्ली नजदीक मुख्यालय का दौरा किया और अधिकारियों से पूछताछ की। Diageo की भारतीय इकाई यूनाइटेड स्पिरिट्स के कई दफ्तरों में भी “इंडस्ट्री-वाइड एक्सरसाइज” के तहत सर्च हुई। दोनों कंपनियां जांच में सहयोग कर रही हैं।ISWAI का कहना है कि समझौते में व्हिस्की के संबंधित टैरिफ लाइनों पर तरजीही दर स्पष्ट रूप से दी गई है। अगर बल्क आयात को इससे बाहर रखा गया तो बातचीत में हासिल किया गया लाभ व्यावहारिक रूप से बेकार हो जाएगा। ब्रिटेन भारत के आयातित स्पिरिट्स बाजार का करीब 75 प्रतिशत हिस्सा रखता है, जिसमें स्कॉच व्हिस्की मुख्य भूमिका निभाती है। भारत का अल्कोहल बाजार करीब 65 अरब डॉलर का है। यह विवाद समझौते के क्रियान्वयन पर पहला बड़ा सवालिया निशान है। जांच अभी जारी है और किसी कंपनी के खिलाफ गलत वर्गीकरण साबित नहीं हुआ है। ISWAI ने सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है ताकि समझौते का असली लाभ उद्योग को मिल सके।

