तेल की कीमतों में 6% की गिरावट, जहाज़ होर्मुज़ से निकले लेकिन ईरान-अमेरिका के बीच अभी भी खाई
होर्मुज़ संकट: अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध को समाप्त करने की दिशा में बातचीत तेज़ हो गई है, लेकिन अनिश्चितता अब भी बरकरार है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने रविवार को साफ़ शब्दों में कहा कि यदि ईरान के साथ कोई ठोस समझौता नहीं हुआ, तो अमेरिका “कोई दूसरा रास्ता” अपनाने पर मजबूर होगा। इस बयान ने जहाँ एक ओर शांति की उम्मीद को बनाए रखा, वहीं दूसरी ओर सैन्य विकल्प की आशंका को भी ज़िंदा रखा।
वार्ता में ‘प्रगति’ लेकिन समझौता अभी दूर
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने शनिवार को कहा था कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोलने का समझौता “काफ़ी हद तक तय हो चुका है” और जल्द घोषणा होगी। लेकिन रविवार को उन्होंने पलटी मारते हुए कहा, “बातचीत व्यवस्थित और रचनात्मक ढंग से आगे बढ़ रही है, मैंने अपने प्रतिनिधियों से कहा है कि जल्दबाजी न करें समय हमारे पक्ष में है।” एक वरिष्ठ अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारी के अनुसार, समझौते पर आज हस्ताक्षर होने की संभावना नहीं है और विस्तृत शर्तों पर बातचीत अभी जारी है। एक क्षेत्रीय सूत्र के अनुसार, यह समझौता दो चरणों में होगा पहले चरण में होर्मुज़ जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा और दूसरे चरण में 30 से 60 दिनों के भीतर परमाणु मुद्दे व अन्य विषयों पर विस्तृत वार्ता होगी। रूबियो ने कहा कि पिछले 48 घंटों में एक रूपरेखा पर प्रगति हुई है, जिसके लिए “ईरान की पूर्ण स्वीकृति और अनुपालन आवश्यक होगा।”
ईरान का कड़ा रुख “अमेरिका का ब्लफ़ मत मानो”
ईरानी संसद की राष्ट्रीय सुरक्षा समिति के प्रवक्ता इब्राहिम रेज़ाई ने सोशल मीडिया पर लिखा, “पराजित राष्ट्रपति के ब्लफ़ पर भरोसा मत करो। समय अमेरिकियों के विरुद्ध काम कर रहा है।” तेहरान ने दोहराया है कि वह दबाव और धमकियों के बल पर कोई रियायत नहीं देगा। रूबियो ने अपनी ओर से स्पष्ट किया है कि किसी भी समझौते में ईरान को यूरेनियम संवर्धन पूरी तरह छोड़नी होगी। उनका कहना है, “अगर ईरान नागरिक परमाणु कार्यक्रम चाहता है, तो वह दूसरे कई देशों की तरह संवर्धित सामग्री आयात कर सकता है।” लेकिन ईरान लंबे समय से यूरेनियम संवर्धन की अपनी क्षमता छोड़ने से इनकार करता रहा है। रूबियो ने यह भी कहा कि ईरान के पास बड़ी संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें हैं जो अमेरिकी हितों के लिए ख़तरा हैं, और ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर चर्चा से इनकार करना “बहुत बड़ी समस्या” है।
युद्ध की पृष्ठभूमि फ़रवरी से अब तक
यह संकट 28 फ़रवरी 2026 को शुरू हुआ जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के विभिन्न सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले किए, जिनमें सर्वोच्च नेता अली ख़ामेनेई की हत्या भी शामिल थी। जवाब में ईरान ने इज़राइल, अमेरिकी सैन्य अड्डों और खाड़ी देशों पर मिसाइल व ड्रोन हमले किए। होर्मुज़ जलडमरूमध्य से सालाना विश्व के करीब 20% पेट्रोलियम और 20% तरलीकृत प्राकृतिक गैस (LNG) गुज़रती है। संकट से पहले हर महीने लगभग 3,000 जहाज़ इस रास्ते से गुज़रते थे, जो अब घटकर मात्र 5% रह गए हैं। चीन, इराक़ और पाकिस्तान जैसे कुछ देशों ने ईरान के साथ कूटनीतिक समझौते कर इस मार्ग का उपयोग जारी रखा है।
तेल की कीमतों में भारी गिरावट
शांति की उम्मीद बंधते ही वैश्विक तेल बाज़ारों में बड़ी हलचल आई। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड 5.2% गिरकर 98.12 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया, जबकि अमेरिकी WTI 92 डॉलर के करीब रहा। ब्रेंट इस सप्ताह 5% से अधिक और अमेरिकी क्रूड 8% से ज़्यादा गिरा। हालाँकि विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि राहत तुरंत नहीं मिलेगी। IEA के कार्यकारी निदेशक फ़तीह बिरोल ने कहा कि होर्मुज़ का पूर्ण और बिना शर्त पुनः खुलना ऊर्जा संकट का सबसे ज़रूरी समाधान है और विकासशील एशियाई व अफ्रीकी देश इस संकट का सबसे अधिक दंश झेल रहे हैं। ऊर्जा अधिकारियों ने आगाह किया है कि मध्य-पूर्व से तेल आपूर्ति का पूर्ण सामान्यीकरण 2027 तक भी नहीं हो सकता।
होर्मुज़ से जहाज़ों की आवाजाही नई उम्मीद की किरण
इस बीच, एक अहम घटनाक्रम में मध्य-पूर्व से तेल और LNG ले जाने वाले कुछ जहाज़ होर्मुज़ जलडमरूमध्य से निकलकर पाकिस्तान और चीन की ओर रवाना हुए हैं जो लंबे ठहराव के बाद एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है। एशियाई देश चीन, भारत, जापान और दक्षिण कोरिया क्षेत्र के 75% तेल और 59% LNG निर्यात के खरीदार हैं।
आगे क्या?
फ़िलहाल दुनिया की निगाहें वार्ता-मेज़ पर टिकी हैं। अमेरिका चाहता है कि ईरान परमाणु कार्यक्रम, बैलिस्टिक मिसाइलें और आतंकवाद का समर्थन — तीनों मुद्दों पर समझौता करे। ईरान परमाणु मुद्दे पर बात तो कर रहा है, लेकिन बाकी मुद्दों पर झुकने को तैयार नहीं। रूबियो ने माना है, “शायद समझौता संभव न हो, यह हम नहीं जानते… लेकिन हम शांतिपूर्ण समाधान चाहते हैं और किसी और विकल्प की तरफ नहीं जाना चाहते।” विश्व की ऊर्जा सुरक्षा, लाखों लोगों की रोज़ी-रोटी और एक बड़े युद्ध की आशंका — सब कुछ इस वार्ता के नतीजे पर निर्भर है।

