नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर 10 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों और उसके बाद की बड़े पैमाने पर पुलिस कार्रवाई ने अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सियासी बहस छेड़ दी है। इस विवाद में हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से जुड़े दो अलग-अलग समूहों के पत्र सामने आए हैं, जो एक-दूसरे के बिल्कुल विपरीत रुख अपनाते हैं। एक तरफ लगभग 100 हार्वर्ड पूर्व छात्रों, फैकल्टी और स्टाफ ने पुलिस कार्रवाई को “असांविधानिक” और “बर्बरता” बताते हुए निंदा की, तो दूसरी तरफ हार्वर्ड क्लब ऑफ इंडिया और एक अन्य समूह ने हार्वर्ड के नाम का दुरुपयोग कर संवैधानिक संस्थाओं को बदनाम करने की कोशिश पर सख्त आपत्ति जताई।
10 अक्टूबर का प्रदर्शन और बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां
इस विवाद की जड़ 10 अक्टूबर को दिल्ली में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) और ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (एआईएसए) द्वारा जंतर मंतर पर बुलाए गए रैली में है। रैली का मकसद ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) प्रक्रिया को रद्द करने की मांग करना था। दिल्ली पुलिस ने अनुमति न मिलने का हवाला देते हुए शहर को लगभग किले में तब्दील कर दिया। करीब 20,000 से अधिक पुलिस और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया, कई मेट्रो स्टेशन बंद किए गए और हजारों लोगों को हिरासत में लिया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, 10 अक्टूबर को ही 7,000 से अधिक लोग हिरासत में लिए गए, जिनमें पूर्व दिल्ली मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जैसे विपक्षी नेता शामिल थे। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दिपके समेत कई नेताओं को एयरपोर्ट पर ही हिरासत में ले लिया गया। अगले दिन भी सैकड़ों अतिरिक्त गिरफ्तारियां हुईं। प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों के साथ कथित रूप से rough handling के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुए, जिससे विपक्ष और नागरिक समाज में आक्रोश फैल गया।
पहला पत्र: 100 हार्वर्ड अफिलिएट्स की निंदा
12 अक्टूबर को हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के करीब 100 पूर्व छात्रों, छात्रों, फैकल्टी और स्टाफ ने एक खुला पत्र जारी कर दिल्ली पुलिस की कार्रवाई की कड़ी निंदा की। पत्र में दिल्ली को “पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा अभूतपूर्व घेराबंदी” बताया गया और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों के खिलाफ “मनमानी, अवैध और असंवैधानिक” कार्रवाई का आरोप लगाया गया।
पत्र में विशेष रूप से दो हार्वर्ड पूर्व छात्रों का जिक्र किया गया। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत (हार्वर्ड लॉ स्कूल, 2009) को शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी की अवैध गिरफ्तारी रोकने के दौरान पुलिस द्वारा “मैनहैंडल” किया गया बताया गया। वहीं, सीजेपी की पॉलिसी हेड मेहर पसरीचा (हार्वर्ड केनेडी स्कूल, 2025) को प्रदर्शन स्थल पर न होने के बावजूद लक्ष्मी नगर बाजार में नाश्ता करते समय घसीटकर 13 घंटे तक हिरासत में रखा गया और कोई कागजात या कारण नहीं बताया गया।
पत्र में सरकार और कानून प्रवर्तन एजेंसियों से संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन तुरंत बंद करने, शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार का सम्मान करने और दोषियों को जवाबदेह ठहराने की मांग की गई।
दूसरा पत्र: हार्वर्ड क्लब ऑफ इंडिया और अन्य अफिलिएट्स का जवाबी रुख
पहले पत्र के 48 घंटे के अंदर हार्वर्ड क्लब ऑफ इंडिया (भारत में हार्वर्ड के आधिकारिक एल्यूम्नी बॉडी) ने स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि यह पत्र क्लब का आधिकारिक रुख नहीं है। क्लब के कार्यकारी समिति सदस्य रजत सेठी ने कहा कि कुछ व्यक्तियों ने व्यक्तिगत रूप से पत्र जारी किया है और यह क्लब या हार्वर्ड यूनिवर्सिटी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। क्लब के चार्टर में राजनीतिक बयान जारी करने की अनुमति नहीं है।
इसके अलावा, हार्वर्ड से जुड़े करीब 44 विद्वानों, वकीलों, नीति निर्माताओं, सिविल सेवकों, वैज्ञानिकों और अकादमिकों के एक अन्य समूह ने भी अलग पत्र जारी किया। उन्होंने भारत की संवैधानिक संस्थाओं—चुनाव आयोग, सुप्रीम कोर्ट, मुख्य न्यायाधीश के कार्यालय और संसद—के खिलाफ “नकारात्मक सार्वजनिक चर्चा और संगठित अभियान” पर गहरी चिंता जताई।
पत्र में कहा गया कि भारत को “घेराबंदी में” बताना और संवैधानिक अधिकारियों को “चोर” या “compromised” कहना लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता के विश्वास को कमजोर करने की मंशा दर्शाता है। हार्वर्ड के नाम का इस्तेमाल बिना उचित अनुमति के राजनीतिक अभियान को वैधता देने के लिए किया जा रहा है, यह चिंता का विषय है। समूह ने जोर दिया कि असहमति लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन बिना सबूत के संस्थाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना नहीं। “संविधान राजनीतिक सुविधा से ऊपर होना चाहिए,” पत्र में कहा गया। भाजपा ने इस दूसरे रुख वाले पत्र को सोशल मीडिया पर व्यापक रूप से साझा किया।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं और व्यापक संदर्भ
इस मुद्दे पर पूर्व विदेश सचिव कनवल सिब्बल जैसे कुछ लोगों ने “विदेशी हाथ” का आरोप भी लगाया। वहीं, विपक्षी दल और छात्र संगठन प्रदर्शन जारी रखने की बात कह रहे हैं। आईएनडीआईए ब्लॉक ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे तक प्रदर्शन जारी रखने का ऐलान किया है।
एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चुनाव आयोग के अंदर भी असहमति की खबरें आई हैं, जहां दो चुनाव आयुक्तों ने कई फैसलों पर आपत्ति दर्ज कराई थी। यह पूरा मामला अब सिर्फ दिल्ली के प्रदर्शनों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि हार्वर्ड जैसे प्रतिष्ठित संस्थान के नाम पर दो अलग-अलग आवाजें भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं और विरोध के अधिकार पर गहरी बहस छेड़ रही हैं।
दोनों पत्रों से साफ है कि हार्वर्ड समुदाय में भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। एक तरफ मानवाधिकार और शांतिपूर्ण विरोध के अधिकार की रक्षा की बात हो रही है, तो दूसरी तरफ संस्थाओं की गरिमा और सबूत आधारित आलोचना पर जोर दिया जा रहा है। यह विवाद आगे भी राजनीतिक और कानूनी हलकों में चर्चा का विषय बना रहेगा।
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